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भोपाल

गुरूवार, 2 अप्रैल 2020

शिवराज सिंह चौहान ने किया दावा, ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हुआ जानलेवा हमले का प्रयास

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मध्यप्रदेश : सीएम पद की दौड़ में हैं तोमर, शिवराज और नरोत्तम के नाम, भाजपा आज ले सकती है फैसला

मध्यप्रदेश से कमलनाथ सरकार की विदाई के बाद राज्य में सरकार की ताजपोशी के सवाल पर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है।  उम्मीद की जा रही है कि भाजपा शनिवार को इस पर फैसला ले लेगी। राज्य के नए सीएम के पद की रेस में पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और नरोत्तम मिश्रा शामिल हैं। अब तक इस पद के लिए शिवराज को सबसे प्रबल दावेदार बताया जा रहा है, हालांकि पार्टी में दूसरे विकल्पों पर भी विचार हो रहा है।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सभी को स्वीकार नेता नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की पहली पसंद केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर हैं। भाजपा के नेता नरोत्तम मिश्रा की भी महत्वाकांक्षा है और उनके शुभ चिंतकों की कमी नहीं है। भाजपा में राज्य के मुख्यमंत्री को लेकर अब हलचल काफी तेज है। अब तक इस पद के लिए शिवराज को सबसे प्रबल दावेदार बताया जा रहा है, हालांकि पार्टी में दूसरे विकल्पों पर भी विचार हो रहा है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया की इस पद के लिए पहली पसंद शिवराज सिंह चौहान हैं। दरअसल वह नहीं चाहते कि ग्वालियर संभाग का कोई नेता सीएम बने। तोमर और मिश्रा इसी संभाग से हैं। चूंकि भाजपा को राज्य में बड़ा बहुमत हासिल नहीं है, इसलिए सिंधिया की राय के उलट फैसला लेना मुश्किल है। हालांकि अगर शिवराज की जगह तोमर या नरोत्तम आलाकमान की पसंद बने तो नेतृत्व इस संबंध में पहले सिंधिया को राजी करेगा।

जहां तक सीएम पद की बात है तो केंद्रीय मंत्री तोमर और नरोत्तम मिश्रा भी इसके मजबूत दावेदार हैं। तोमर पीएम के करीबी हैं तो नरोत्तम गृह मंत्री अमित शाह के। सूत्रों का कहना है कि तोमर या मिश्रा को अगर सीएम बनाने का फैसला होता है तो शिवराज केंद्रीय राजनीति में आएंगे। ऐसी स्थिति में उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी और उन्हें कृषि मंत्रालय दिया जा सकता है।
 

शिवराज के सिवा आखिर कौन?

भाजपा के एक राज्यसभा सांसद का कहना है कि शिवराज को ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए। उनकी जानकारी के मुताबिक तैयारी भी इसी तरह की हैं। बताते हैं मध्यप्रदेश  में सबको स्वीकार तो नहीं लेकिन अधिकतम को स्वीकार नेता शिवराज सिंह ही हैं। राज्य में भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राकेश सिंह, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का रास्ता थोड़ा अलग हैं।

बताते हैं हाल में भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया से अभी स्थानीय स्तर पर नेता कोई राय नहीं ले रहे हैं। हालांकि इसमें ज्योतिरादित्य की राय मायने रखेगी। समझा जा रहा है कि ज्योतिरादित्य इसकी चर्चा केंद्रीय नेतृत्व से कर रहे हैं।

शिवराज के रास्ते में सबसे बड़ा कांटा उनका 13 साल तक राज्य का मुख्यमंत्री रहना है। यह अनुभव के लिहाज से ठीक है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व हमेशा नए नेताओं को अवसर देने और भविष्य का नेता तैयार करने को प्रमुखता देता है।

नरेंद्र तोमर भी क्या बुरे हैं?

केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर अच्छे नेता हैं। जमीनी पकड़ रखते हैं। सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी क्षमता को पसंद करते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को भी तोमर के नाम को लेकर कोई आपत्ति नहीं है।

मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाएं कैलाश विजयवर्गीय भी रखते हैं, लेकिन माना जा रहा है कि तोमर के नाम पर उन्हें या फिर राकेश सिंह को कोई आपत्ति नहीं होगी। शीर्ष नेतृत्व हमेशा नए नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के पक्ष में रहता है। दूसरे, शीर्ष नेतृत्व को हमेशा केंद्र सरकार में अनुभवी लोगों की आवश्यकता रहती है।

नरोत्तम मिश्रा अच्छे उत्साही नेता हैं

नरोत्तम मिश्रा ब्राह्मण चेहरा हैं और राज्य में ब्राह्मण चेहरा लंबे समय से सत्ता में नहीं है। भाजपा का अच्छा जनाधार है, लेकिन नरोत्तम अभी इस दौड़ में पीछे हैं। उनके सहयोगी भी इस बारे में बहुत उत्साह से कुछ नहीं कह पाते।

भिंड, मुरैना में नरोत्तम मिश्रा अपनी पकड़ रखते हैं। नरोत्तम नहीं चाहते ग्वालियर चंबल संभाग से उनका प्रभाव किसी तरह से कम हो पाए। नरोत्तम ज्योतिरादित्य को बहुत पसंद नहीं कर रहे हैं। भाजपा को अभी सबके बीच में एक समीकरण बनाना है।

शनिवार को तय हो जाएगा नेता का नाम

भाजपा के एक वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि राज्य के नए नेता का एलान शनिवार को सुबह तक हो सकता है। बताते हैं अभी राज्य में विधायकों का मन टटोलने की प्रक्रिया चल रही है।

भाजपा नेता मानकर चल रहे हैं कि मध्यप्रदेश में सरकार बनाने का रास्ता तो आसान है, लेकिन सरकार के कार्यकाल को पूरा कर पाने का रास्ता कठिन है। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व भी संभल कर कदम रख रहा है।
 
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क्या भाजपा दे पाएगी मध्यप्रदेश में नई स्थाई सरकार? उपचुनाव के नतीजे कर सकते हैं बड़ा उलटफेर

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के इस्तीफे के बाद भाजपा में अब नई सरकार के गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। 230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में 23 सदस्यों के इस्तीफे और दो की असामयिक निधन के बाद सदस्यों की संख्या घट कर 205 हो गई है। वहीं भाजपा के पास मौजूदा बहुमत से तीन ज्यादा 106 विधायक हैं। अगर उसके विधायकों में कोई टूट नहीं होती है तो वह आसानी से विश्वासमत हासिल कर लेगी।

लेकिन भाजपा इस जीत से निश्चिन्त नहीं हो सकती है क्योंकि जिन 25 सीटों पर अगले छह महीनों में उपचुनाव होने हैं, उसके नतीजे राज्य में एक बार फिर बड़ा उलटफेर कर सकते हैं और राज्य एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के दौर में जा सकता है।

चूंकि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इनमें से ज्यादातर सीटों पर बड़ी जीत हासिल की थी, इसलिए माना जा रहा है कि इस उपचुनाव में भी वह भाजपा को यहां पर कड़ी टक्कर देगी। अपने सहयोगियों के साथ इस समय 99 पर टिकी कांग्रेस को अगर 25 में 16-17 सीटें भी मिल जाती हैं, तो मध्यप्रदेश में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है।

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी इस परिणाम को हासिल करने में अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। वहीं भाजपा कर्नाटक मॉडल पर चलते हुए इनमें से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश कर अपनी सरकार को स्थायित्व देने की कोशिश करेगी, लेकिन उसे भी अपने विधायकों को बचाए रखने की चुनौती से जूझना पड़ सकता है।

इस समय क्या है गणित

मध्यप्रदेश की 230 सदस्यों की विधानसभा में इस समय 23 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और दो सीटें सदस्यों के आकस्मिक निधन से खाली हुई हैं। इस प्रकार मौजूदा विधानसभा में केवल 205 सदस्य रह गये हैं। इसमें भाजपा के सदस्यों की संख्या 106 और कांग्रेस गठबंधन के सदस्यों की संख्या 99 है।

इस समय सदन में बहुमत का आंकड़ा 103 रह गया है जो भाजपा के पास है। लेकिन जिन 25 सीटों पर उपचुनाव होना है, उनमें किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी, उससे यह तय होगा कि मध्यप्रदेश में बनने वाली भाजपा की अगली सरकार सत्ता में कितने दिन टिक पाएगी।

जल्द हो उपचुनाव

कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा है कि इनमें से ज्यादातर सीटों पर कांग्रेस के ही विधायकों ने जीत हासिल की थी और अगले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी इन सीटों पर जीत हासिल करेगी। उन्होंने भरोसा जताया है कि कांग्रेस मध्यप्रदेश में फिर से सरकार बना सकती है। उन्होंने कहा कि अगला उपचुनाव सामान्य नहीं होगा।

जनता के सामने कमलनाथ सरकार के कामकाज और भाजपा की विचारधारा में किसी एक को चुनने का विकल्प होगा। चूंकि जनता ने इन क्षेत्रों में अपने चुने जनप्रतिनिधियों को खरीदे जाते हुए देखा है, वह इस धोखे का बदला अवश्य लेगी और उपचुनाव में कांग्रेस जीत हासिल करेगी।

कांग्रेस नेता ने कहा कि परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग को राज्य में जल्द से जल्द उपचुनाव कराना चाहिए।

कर्नाटक का इतिहास दुहराएंगे

वहीं, मध्यप्रदेश से भाजपा नेता प्रभात झा ने कहा कि अब राज्य में उनकी पार्टी की सरकार बनेगी और राज्य में पिछले 15 माह से चल रहा कुशासन खत्म होगा। झा ने कहा कि कर्नाटक में भी इसी तरह की परिस्थिति बनी थी, लेकिन पार्टी ने 15 सीटों में से 13 सीटों पर जीत हासिल कर अपनी सरकार को मजबूती दी थी।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि  मध्यप्रदेश में भी कर्नाटक की तर्ज पर उपचुनाव में भाजपा बड़ी जीत दर्ज करेगी।

उपचुनाव में कितना काम करेगा सिंधिया फैक्टर

ज्योतिरादित्य सिंधिया का फैक्टर उपचुनाव में कितना असर डालेगा, यह इस मामले का सबसे बड़ा पेंच है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि सिंधिया उपचुनाव में भाजपा को बड़ा फायदा पहुंचाने की स्थिति में नहीं हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ एक जबरदस्त लहर थी, जिसका फायदा कांग्रेस को मिला था।

किसानों का मुद्दा लोगों पर बहुत असर डालने वाला साबित हुआ था। इस क्षेत्र का होने के नाते यह लाभ सिंधिया के खाते में जुड़ गया। अगर सिंधिया इस क्षेत्र में इतने ही प्रभावी होते तो लोकसभा चुनाव में वे खुद अपनी ही सीट क्यों हार जाते। 
 
इस उपचुनाव में भी देश में छाई आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और नागरिकता कानून के खिलाफ जनता में पैदा हुई नाराजगी भाजपा के खिलाफ जा सकती है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश में होने वाले उपचुनाव को अभी से बहुत कड़ा मुकाबला माना जा रहा है और इसमें किसी भी पार्टी के हाथ बाजी लग सकती है।

इसलिए भाजपा इस फौरी खुशी से बेपरवाह नहीं हो सकती है।  
 
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कमलनाथ के इस्तीफे के एलान के बाद भाजपा के लिए आसान नहीं होगी आगे की चुनौतियां

ज्योतिरादित्य सिंधिया का साथ छोड़ना कांग्रेस नहीं संभाल पाई और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट का फ्लोर टेस्ट का निर्णय और सिंधिया समर्थक 16 विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति के मंजूर किए जाने के बाद कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ के इस्तीफा देने की संभावना जता दी थी।


दिग्विजय सिंह ने कह दिया था कि उनके पास बहुमत नहीं है, लेकिन कमलनाथ के इस्तीफा देने के बाद भाजपा और शिवराज सिंह चौहान के लिए राज्य में सरकार बनाना, चलाना बहुत आसान नहीं होगा।

राजनीति में कल और परसों भी आता है : कमलनाथ

कमलनाथ ने इस्तीफा देने से पहले अपनी 40 साल की भरोसे की राजनीति का हवाला दिया और कहा कि राजनीति में आज के बाद कल और परसों भी आता है। उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया के धोखे और सौदेबाजी की राजनीति पर भी निशाना साधा। उन्हें भाजपा के सौदेबाजी की राजनीति को भी आड़े लिया और अंत में राज्यपाल को इस्तीफा देने की घोषणा कर दी।

इससे पहले भाजपा के विधायक शरद कौल ने भी विधानसभा में सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। विधानसभा अध्यक्ष ने कौल का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। कांग्रेस पार्टी के खेमे में कौल समेत करीब तीन-चार विधायकों के कमलनाथ सरकार का साथ देने की उम्मीद थी।

लेकिन सूत्र बताते हैं कि ताजा घटनाक्रम का विश्लेषण करने के बाद कमलनाथ से इस्तीफा देने का मन बना लिया। उन्होंने इसके बाबत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने टेलीफोन पर चर्चा की और इसके बाद प्रेसवार्ता में इसकी घोषणा कर दी।




कहां हुए फेल, कहां हुए पास

कमलनाथ को मध्य प्रदेश में पार्टी की जिम्मेदारी से लेकर मुख्यमंत्री का पद मिलना कांटों भरा था। उनके रास्ते में हर पग पर सबसे बड़ा कांटा ज्योतिरादित्य सिंधिया थे। कमलनाथ के साथ जहां मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और कुछ सीनियर नेताओं का हौसला था।

इसके सहारे कमलनाथ 38 साल की केंद्रीय राजनीति करने के बाद 2018 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए। कमलनाथ के सामानांतर ज्योतिरादित्य सीधे राहुल, प्रियंका तक सीधी पहुंच रखते थे।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक भी उनकी बेधड़क पहुंच थी। कांग्रेस पार्टी के भीतर भी माना जा रहा है कि कमलनाथ ज्योतिरादित्य और दिग्विजय के बीच में समीकरण नहीं बना पाए। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तीनों नेताओं को नहीं संभाल पाया।

लोकसभा चुनाव 2019 हारने के बाद ज्योतिरादित्य लगातार दबाव की राजनीति करते रहे और इससे इतर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह सत्ता में चाल में चल रहे थे। शीर्ष स्तर के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद ज्योतिरादित्य लगातार दबाव बढ़ाते रहे। अक्टूबर-नवंबर 2019 में उन्होंने संकेत देना शुरू किया, जनवरी और फरवरी 2020 में सभी दांव अजमाने के बाद वह भाजपा में चले गए।

बागी विधायकों से एक भेंट पर टिकी थी कांग्रेस की उम्मीद

गुलाम नबी आजाद ने पिछले सप्ताह कहा था कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बच पाई तो केवल कमलनाथ बचा पाएंगे। हालांकि आजाद को इसकी संभावना कम थी। दिग्विजय सिंह कमलनाथ की सरकार गिरने का दाग अपने ऊपर नहीं लेना चाहते थे। हालांकि पार्टी के तमाम नेता इसकी मुख्य वजह उन्हें ही मानते हैं।

इसके सामानांतर कमलनाथ और दिग्विजय दोनों को उम्मीद थी कि बागी विधायकों से एक भेंट के बाद समीकरण बदल जाएगा। इसी उम्मीद में कोरोना वायरस संक्रमण का सहारा लेकर मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष ने 26 मार्च तक विधानसभा की कार्यवाही को स्थगित कर दिया था।

बागी विधायकों से भेंट के लिए कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने हर स्तर पर प्रयास किया, लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों ने ज्योतिरादित्य, शिवराज, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के सहयोग से इसे सफल नहीं होने दिया। सुप्रीम कोर्ट के 20 दिसंबर को फ्लोर टेस्ट के निर्णय ने भी कमलनाथ का हाथ बांध दिया।

ऑपरेशन लोटस सफल लेकिन आसान नहीं होगी राह

कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश में भाजपा का ऑपरेशन लोटस सफल रहा। यहां कर्नाटक की तरह कई बार प्रयास नहीं करने पड़े और राहुल गांधी के दाहिने हाथ कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के सहयोग से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा, नरोत्तम मिश्रा ने इस लक्ष्य को आसानी से साध लिया।

कमलनाथ के इस्तीफा देने के बाद भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। माना जा रहा है कि राज्य के अगला मुख्यमंत्री वही बनेंगे। इस बारे में अंतिम निर्णय शीर्ष नेतृत्व को ही करना है। हालांकि शिवराज को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लेकर भी भाजपा के भीतर काफी अंतर्विरोध है। भाजपा के मुख्यमंत्री को शपथ लेने के बाद सदन में बहुमत भी साबित करना है। माना जा रहा है कि यहां भी भोपाल में राजनीति नया रंग दिखा सकती है।

केंद्र में ज्योतिरादित्य बनेंगे मंत्री और 22 पूर्व विधायक लड़ेंगे चुनाव

ज्योतिरादित्य सिंधिया के राज्यसभा के लिए चुनकर आने के बाद उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बनाए जाने की संभावना है। ज्योतिरादित्य को ऊर्जा मंत्रालय का प्रभार दिया जा सकता है और संसद का बजट सत्र समाप्त होने के बाद कभी केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल, विस्तार संभव है। भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आए विधायकों के साथ कर्नाटक फार्मूले पर आगे बढ़ेगी।

ज्योतिरादित्य समर्थक सभी 22 विधायकों का विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने इस्तीफा मंजूर कर लिया है। सूत्र बताते हैं कि ये सभी विधायक अब भाजपा के टिकट पर उप चुनाव के जरिए विधानसभा में चुनकर आएंगे। चुनकर आने के बाद इनमें से नौ विधायकों को मंत्री पद मिल सकता है।
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