कनपुरिया होली के बारे में सुनेंगे तो चौंक जाएंगे

अरविंद बाजपेयी/ब्यूरो, चंडीगढ़ Updated Fri, 06 Mar 2015 12:42 AM IST
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मथुरा-बनारस की होली के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन कनपुरिया होली के बारे में सुनेंगे तो चौंक जाएंगे। क्योंकि अनजाने लोगों को भी रंग लगाना एक कला है।
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इस कला में महारत की बात करें तो कनपुरिया होली की बरबस याद आती है। पहचान वाले हों या अनजान, सड़क पर निकले तो रंगों से बचना मुश्किल है। लाख मना करेंगे, फिर भी रंगों की बौछार तय है। होली के हुड़दंग में रंग भी डाले जाएंगे और जुमले भी सुनाए जाएंगे, जनाब-आराम से बैठेंगे तो तकलीफ नहीं होगी।
होली का यह खास पल तब तक पूरा नहीं होता, जब तक पानी के टैंक का सीन न आ जाए। पानी में डुबकी लगाकर तैयार होना, रंगों से पॉलिश होना और गुझिया खाना-खिलाना, ये तो यहां की पहचान है। ट्रेन में सफर करते हैं तो बॉगियों पर खड़कने वाले पत्थर और गोबर की बरसात कई दिन पहले से ही संकेत देने लगती है कि भई होली आ गई है।
एक कहावत तो आपने सुनी होगी, ... का लड्डू जिसने खाया, वह भी पछताया, जिसने नहीं खाया, वह भी पछताया। लेकिन, यहां गुझिया पर इसका आधा जुमला ही चरितार्थ होता है। वह भी आखिरी का। यहां एक ही बात कही जाती है, जिसने नहीं खाया, वही पछताया।

खैर...। यह तो प्यार है। प्यार का रंग है, अपनापन का रंग है तो इतनी जल्दी छूटेगी कैसे। चाहे लाख जतन कर लें, ये रंग एक सप्ताह बाद ही आपका दामन छोड़ेंगे। यही तो है कनपुरिया होली की पहचान...।
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