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18 अप्रैल 2021

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Digital Edition

अनंत में लीन मिल्खा सिंह: कोरोना ने देश से छीना फ्लाइंग सिख, 91 साल की उम्र में चंडीगढ़ में ली आखिरी सांस

कोरोना संक्रमित होने के बाद करीब एक महीने से जूझ रहे पूर्व ओलंपियन पद्मश्री मिल्खा सिंह (91) का शुक्रवार देर रात पीजीआई चंडीगढ़ में निधन हो गया। फ्लाइंग सिख के नाम से दुनिया भर मे मशहूर मिल्खा सिंह 19 मई को कोरोना संक्रमित मिले थे। इसके बाद फोर्टिस मोहाली में भर्ती रहे। बाद में परिजनों के आग्रह पर अस्पताल में छुट्टी लेकर सेक्टर-8 स्थित आवास पर ही इलाज करा रहे थे। 

बीते तीन जून को हालत बिगड़ने पर उन्हें पीजीआई में भर्ती कराया गया था। बीते बुधवार को उनकी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आई थी लेकिन संक्रमण के कारण वह बेहद कमजोर हो गए थे। शुक्रवार दोपहर अचानक उनकी तबीयत गंभीर हो गई। बुखार के साथ उनका ऑक्सीजन स्तर नीचे गिरने लगा। पीजीआई के डॉक्टरों की सीनियर टीम उन पर नजर बनाए हुए थी, लेकिन देर रात उनकी हालत बिगड़ गई और रात 11.40 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय खेल के एक युग का अंत हो गया। इस दुखद सूचना से देश और दुनिया के खेल प्रेमियों में शोक की लहर फैल गई। 

पांच दिन पहले हुई थी पत्नी की मौत
मिल्खा सिंह के साथ उनकी पत्नी निर्मल कौर भी कोरोना संक्रमित हो गईं थीं। हालत गंभीर होने पर उन्हें मोहाली के निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया था। उनकी भी हालत कई दिनों तक स्थिर बनी हुई थी, लेकिन 13 जून की शाम को उनका निधन हो गया। मिल्खा सिंह और उनकी पत्नी के बीच काफी जुड़ाव था। 
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मिल्खा सिंह। मिल्खा सिंह।

उड़न सिख: जब मिल्खा सिंह बोले- मेरे जाने के बाद मेरा पुतला दिलाएगा याद, जादुई जूतों को इसलिए कर दिया था नीलाम

मैडम तुसाद म्यूजियम में भी उड़न सिख को जगह मिली है। यहां दुनियाभर की हस्तियों के साथ मिल्खा सिंह का भी मोम का पुतला लगा है। जब मिल्खा ने अपने मोम के पुतले को देखा था तब वे भी दंग रह गए थे। पुतले को देखकर मिल्खा सिंह ने कहा था कि मेरे जाने के बाद लोगों को मेरा पुतला मेरी याद दिलाता रहेगा। पुतला बनाने से पहले कंपनी के प्रतिनिधियों ने उनकी हजारों तस्वीरें खीचीं थीं। खासकर जिस तरह से वह जवानी में दौड़ते थे। उनकी छोटी से छोटी मूवमेंट पर बारीकी से गौर किया गया। कपड़ों के माप के लिए विशेष दर्जी बुलाए गए थे। जब उनका पुतला तैयार हुआ तो मिल्खा सिंह का पूरा परिवार हैरान रह गया था। सबने मैडम तुसाद की टीम को इसके लिए दिल से धन्यवाद किया था।
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चंडीगढ़: एथलेटिक्स के बाद गोल्फ था मिल्खा सिंह का दूसरा प्यार, बेटे जीव ने इसी खेल में कमाया नाम

एथलेटिक्स के बाद गोल्फ मिल्खा सिंह का दूसरा प्यार था। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने गोल्फ खेलकर अपना ज्यदातर समय बिताया। मिल्खा सिंह चंडीगढ़ गोल्फ क्लब के सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक थे। उनके साथ समय बिताने वाले गोल्फ के वरिष्ठ खिलाड़ी कहते हैं कि चंडीगढ़ गोल्फ क्लब ही उनका दूसरा घर था। वह यहां घंटों समय बिताते थे। न तो थकते थे और न ही जल्दी हार मानते थे। 

गोल्फ में दिलचस्पी के चलते ही उनके बेटे जीव मिल्खा सिंह आज अंतरराष्ट्रीय स्तर के गोल्फर हैं। पौत्र हरजय मिल्खा सिंह भी रोजाना गोल्फ का अभ्यास करते हैं। वर्षों तक उनके साथ गोल्फ खेलने वाले दोस्तों से लेकर गोल्फ कोर्स के कैडी भी मिल्खा सिंह के मुरीद रहे।

‘अब दिल नहीं करता क्लब जाने का’
पिछले 12 वर्षों से मिल्खा सिंह के साथ रोजाना सुबह गोल्फ खेलने वाले उनके खास मित्र आलमगीर ग्रेवाल ने बताया कि अखबारों के जरिए उनके बीमार होने की सूचना मिली थी। गोल्फ कोर्स पर उनके साथ 5 घंटे खेलते हुए पता नहीं चलता था कि समय कैसे बीत गया। खेलते समय में वह हमेशा हंसी मजाक के साथ जीत का जज्बा लेकर आगे बढ़ते थे और सबको प्रोत्साहित करते थे। 
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महान मिल्खा सिंह: भारत में नहीं पाकिस्तान में मिला था 'उड़न सिख' का खिताब, रोचक है लाहौर का ये किस्सा

मिल्खा सिंह को उड़न सिख का खिताब पाकिस्तान में मिला था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने उन्हें उड़न सिख (फ्लाइंग सिख) की पदवी से नवाजा था। साल 1960 में मिल्खा को पाकिस्तान की ओर से लाहौर में दौड़ने का आमंत्रण मिला लेकिन भारत-पाक बंटवारे के बाद हुए दंगों से दुखी मिल्खा सिंह ने निमंत्रण ठुकरा दिया। उनकी आंखों के सामने दंगों में मारे गए लोगों की लाशों के दृश्य घूम रहे थे। पाकिस्तान न जाने की खबर अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मिल्खा को बुलाया और समझाया कि पुरानी बातें भूलकर लाहौर जाओ। इसके बाद मिल्खा बाघा बार्डर के रास्ते पाकिस्तान पहुंचे। उन्हें खुली जीप में लाहौर ले जाया गया। बताया जाता है कि रास्ते भर सड़क के दोनों तरफ भारी भीड़ थी और उनके हाथों में भारत और पाकिस्तान के झंडे लहरा रहे थे। इसमें उनका मुकाबला एशिया का तूफान नाम से मशहूर पाकिस्तानी धावक अब्दुल खालिक से था। पूरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था।
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मिल्खा सिंह की दरियादिली: जीवनी पर फिल्म बनी तो लिया था सिर्फ एक रुपया, बेहद खास था ये नोट, भावुक हो गए थे 'फ्लाइंग सिख'

मिल्खा सिंह की फाइल फोटो।
मिल्खा सिंह की बेटी सोनिया सांवलका ने अपने पिता के जीवन पर रेस ऑफ माई लाइफ नाम से किताब लिखी, जो साल 2013 में प्रकाशित हुई थी। इस किताब के प्रकाशित होने के बाद फिल्म निर्माता राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने उनके जीवन पर फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ बनाने का निर्णय लिया। फिल्म बनाने की अनुमति देने के बदले निर्माता राकेश ओम प्रकाश मेहरा से मिल्खा सिंह ने मात्र एक रुपये का नोट लिया था। इस एक रुपये की खास बात यह थी कि एक रुपये का यह नोट साल 1958 का था, जब मिल्खा ने राष्ट्रमंडल खेलों में पहली बार स्वतंत्र भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था।एक रुपये का यह नोट पाकर मिल्खा भावुक हो गए थे। यह नोट उनके लिए एक कीमती याद की तरह था। इस फिल्म में अभिनेता फरहान अख्तर ने मिल्खा की भूमिका निभाई थी। फिल्म को देखकर मिल्खा सिंह ने कहा था कि इससे युवाओं को खेलों में देश के लिए मेडल जीतने की प्रेरणा मिलेगी।
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अलविदा फ्लाइंग सिख : बंटवारे से बुलंदियों तक ...आसान नहीं था मिल्खा सिंह बनना

पाकिस्तान के गोविंदपुरा में जन्मे मिल्खा सिंह का जीवन संघर्षों से भरा रहा। बचपन में ही भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दर्द और अपनों को खोने का गम उन्हें उम्र भर सालता रहा। बंटवारे के दौरान ट्रेन की महिला बोगी में सीट के नीचे छिपकर दिल्ली पहुंचने, शरणार्थी शिविर में रहने और ढाबों पर बर्तन साफ कर उन्होंने जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की। फिर सेना में भर्ती होकर एक धावक के रूप में पहचान बनाई। अपनी 80 अंतरराष्ट्रीय दौड़ों में उन्होंने 77 दौड़ें जीतीं लेकिन रोम ओलंपिक का मेडल हाथ से जाने का गम उन्हें जीवन भर रहा। उनकी आखिरी इच्छा थी कि वह अपने जीते जी किसी भारतीय खिलाड़ी के हाथों में ओलंपिक मेडल देखें लेकिन अफसोस उनकी अंतिम इच्छा उनके जीते जी पूरी न हो सकी। हालांकि मिल्खा सिंह की हर उपलब्धि इतिहास में दर्ज रहेगी और वह हमेशा हमारे लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे। 
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यादें: पंजाब के मुख्यमंत्री ने पूरी कराई थी मिल्खा सिंह की प्रेम कहानी, कुछ यूं परवान चढ़ा था प्यार

महान धावक और फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह का पीजीआई चंडीगढ़ में निधन हो गया है। 91 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली।13 जून को उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा ने इस दुनिया को अलविदा कहा था। दो महान खिलाड़ियों के निधन से खेल जगत में शोक की लहर है। मिल्खा सिंह और निर्मल कौर की मुलाकात साल 1955 में श्रीलंका के कोलंबो में हुई थी। मिल्खा सिंह को पहली नजर में निर्मल कौर से प्यार हो गया।

प्यार परवान चढ़ा लेकिन निर्मल कौर के परिवार को मिल्खा सिंह पसंद नहीं थे। शादी में अड़चनें आईं तो पंजाब के मुख्यमंत्री को इनकी प्रेम कहानी पूरी करवाने के लिए आगे आना पड़ा था। एक इंटरव्यू में मिल्खा सिंह ने कहा था कि हर खिलाड़ी और एथलीट की जिंदगी में प्यार आता है, उसे हर स्टेशन पर एक प्रेम कहानी मिलती है। मिल्खा सिंह की जिंदगी में तीन लड़कियां आईं। तीनों से प्यार हुआ, लेकिन शादी उन्होंने निर्मल कौर से की। 
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आखिरी वक्त की कहानी: परिवार नहीं चाहता था मिल्खा सिंह को अंतिम समय में कष्ट हो, इसलिए नहीं भेजा वेंटिलेटर पर

शुक्रवार को जब मिल्खा सिंह की हालत बिगड़ने लगी तो पीजीआई के डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखना होगा। परिजनों ने मिल्खा सिंह को वेंटिलेटर पर रखने से मना कर दिया था। परिजनों को आभास हो गया था कि निर्मल मिल्खा सिंह के जाने के बाद वे ज्यादा दिन तक जी नहीं पाएंगे। 

वेंटिलेटर पर उनके जीवन को खींचना ठीक नहीं होगा। पत्नी के साथ उनका जबरदस्त बंधन था। दो दिन से उनकी याद आने लगी थी। परिजन अंतिम समय पर चाहते थे कि वे बिना किसी कष्ट के ही शांतिपूर्ण अंतिम यात्रा पर जाएं। हालांकि पीजीआई के डॉक्टर और परिजन लगातार उनकी देखरेख में लगे रहे।

पीजीआई से घर लाया गया पार्थिव शरीर
निधन के बाद परिजन उनके पार्थिव शरीर को चंडीगढ़ सेक्टर आठ स्थित घर पर ले आए थे। घर पर सन्नाटा पसरा हुआ था। घर पर जीव मिल्खा सिंह के साथ उनकी पत्नी कुदरत मिल्खा सिंह, बेटा हरजय मिल्खा सिंह और मिल्खा की बेटी मोना और सोनिया मौजूद थीं। मिल्खा सिंह का संस्कार शनिवार को दोपहर बाद सेक्टर-25 में किया जाएगा। इससे पहले उनके पार्थिव शरीर को लोगों के दर्शन के लिए रखा जाएगा।

मां के बाद पिता नहीं रहे
मिल्खा सिंह के निधन के बाद उनके बेटे व अंतरराष्ट्रीय स्तर के गोल्फर जीव मिल्खा सिंह ने कहा कि मेरे पिता का निधन रात 11.30 बजे के करीब हुआ। शुक्रवार को उन्होंने अपनी जिंदगी के लिए काफी संघर्ष किया था लेकिन भगवान के अपने तरीके हैं। यह सच्चा प्यार और साथ था कि पांच दिन में मां और पिता दोनों चले गए। हम पीजीआई के डॉक्टरों के उनके साहसिक प्रयासों और दुनिया भर से मिले प्यार और प्रार्थना के लिए आभारी हैं।
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पंजाब: निजी कॉलेजों को पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के बकाये का 40 फीसदी देगी कैप्टन सरकार

पंजाब सरकार द्वारा एससी विद्यार्थियों के लिए पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम के वर्ष 2017-18 से 2019-20 तक अवधि के लिए निजी शिक्षण संस्थानों के 200 करोड़ रुपये के बकाये का 40 प्रतिशत हिस्सा अदा करने का एलान किया है। यह फैसला शुक्रवार को मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल की वर्चुअल मीटिंग में लिया गया। मीटिंग में यह भी फैसला किया गया कि मुख्यमंत्री द्वारा बाकी 60 प्रतिशत बकाया राशि का मुद्दा प्रधानमंत्री के समक्ष उठाया जाएगा। 

मंत्रिमंडल द्वारा स्थापित मंत्री समूह, जिसे एससी विद्यार्थियों के लिए पोस्ट मैट्रिक वजीफा स्कीम को सुचारु ढंग से चलाने में पेश आ रही कठिनाइयों पर विचार करने का काम सौंपा गया था, की रिपोर्ट को मंजूरी देने के अलावा यह फैसला भी किया गया कि सरकार द्वारा निजी संस्थानों को साल 2021-22 के लिए बकाया का भुगतान तीन एक समान तिमाही किस्तों में किया जाएगा। 

मंत्री समूह में वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल, अल्पसंख्यक मंत्री साधु सिंह धर्मसोत, उच्च शिक्षा मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा और तकनीकी शिक्षा मंत्री चरनजीत सिंह चन्नी शामिल थे। यह समूह 14 जनवरी, 2021 को कायम किया गया था। एससी विद्यार्थियों के लिए पोस्ट मैट्रिक वजीफा स्कीम केंद्रीय सहायता द्वारा लागू की जा रही है लेकिन वर्ष 2017-18 से लेकर 2019-20 तक कोई भी फंड जारी नहीं किए गए। 

मंत्री समूह ने यह भी सिफारिश की है कि निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा एससी विद्यार्थियों के रोल नंबर, सर्टिफिकेट और डिग्रियां नहीं रोकी जाएंगी और इसके अलावा 2017-18 से लेकर 2019-20 के सत्र के लिए फीस की वसूली को लेकर पंजाब सरकार के खिलाफ अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया जाएगा और न ही कोई दावा किया जाएगा। 
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