निर्भया को इंसाफ: हम करुणा से रिक्त नहीं हैं, पर ये अपराध घिनौना था

Yogita Yadavयोगिता यादव Updated Fri, 20 Mar 2020 11:00 AM IST
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निर्भया का मामला ऐसा ही मामला था। जिसने सारे देश की आत्मा को छलनी कर दिया था।
निर्भया का मामला ऐसा ही मामला था। जिसने सारे देश की आत्मा को छलनी कर दिया था। - फोटो : अमर उजाला
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कानून व्यवस्था से भी पहले हमारे मन की एक अदालत होती है। कुछ भी करने से पहले हम उस पर एक बार खुद को जरूर तौलते हैं। पर क्या ऐेसा अमानवीय और घिनौना कृत्य करते हुए इनके मन की अदालत ने इन्हें एक बार भी टोका होगा? अगर नहीं तो फिर इनके लिए किसी भी तरह की करुणा बेमानी है। 
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फांसी के फंदे पर लटकते हुए गर्दन का खिंचकर टूटना और फिर प्राण निकलना निश्चित ही अमानवीय है। इसके बारे में सोचकर ही रूह कांप जाती है। सजा-ए-मौत का फैसला लिखने के बाद न्यायाधीश अपनी कलम तोड़ देते हैं। दुनिया भर में फांसी की सजा पर बहस जारी है। वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र संघ में भी इस आशय का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था। पर फांसी की सजा जरूरी हो जाती है, उन जघन्यतम् और घृणित अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधियों के लिए जो मानवता को लहुलुहान कर देते हैं।
निर्भया का मामला ऐसा ही मामला था। जिसने सारे देश की आत्मा को छलनी कर दिया था। हम करुणा से रिक्त नहीं हुए हैं पर वह अपराध इतना घिनौना और नृशंसता की सीमा पार कर जाने वाला था कि उसके लिए फांसी सर्वथा उपयुक्त सजा है। अगर हम स्त्री सुरक्षा की बात करते हैं, बेटियों को बलात्कारियों से बचाना चाहते हैं, तो जरूरी है कि हम इन बलात्कारियों के बारे में सोचते हुए थोड़े निष्ठुर हो जाएं।
भारतीय कानून एवं नियमों के अनुसार फांसी अलसुबह ही दी जाती है। अब तक जितने भी लोगों को फांसी हुई है, उनके बारे में कहा गया है कि फांसी से पहले उन्हें रात भर नींद नहीं आती। कुछ अपराधी तो इतने बेचैन हो जाते हैं कि फांसी से पहले वाली रात को खाना भी ठीक से नहीं खा पाते। 19 और 20 मार्च की रात ऐसी ही थी। जब उन चार गुनाहगारों को नींद नहीं आई होगी जिन्होंने निर्भया के साथ जघन्यतम अपराध किया था। पर यह केवल उन्हीं के लिए बेचैनी भरी रात नहीं थी, बल्कि और भी कई लोग थे जो इस रात सो नहीं सके। इन दोषियों के परिवार इनसे ज्यादा गहन पीड़ा से गुजरे होंगे।
 
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