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अलविदा जब्बार भाई: हमारी लापरवाही और उपेक्षा के लिए मुआफ़ कर दीजिएगा

Sachin Kumar jainसचिन कुमार जैन Updated Sat, 16 Nov 2019 11:58 AM IST
जब्बार भाई ने भोपाल गैस त्रासदी में अपनी मां, पिता और भाई को खो दिया था।
जब्बार भाई ने भोपाल गैस त्रासदी में अपनी मां, पिता और भाई को खो दिया था। - फोटो : Social Media
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जब्बार भाई बात मुआफ़ी के लायक तो नहीं है, पर फिर भी कहना चाहता हूं मुआफ़ कर दीजिएगा। हमने बहुत देर कर दी। यह तो नहीं ही कहा जा सकता है कि आपने हमें वक्त नहीं दिया, खूब वक्त दिया समझने के लिए और कुछ कर पाने के लिए। हमने लापरवाही और उपेक्षा का बहुत बड़ा अपराध कर दिया। हमें पता भी था कि आप कौन हैं? आप अब्दुल जब्बार थे, वही अब्दुल जब्बार जिसने भोपाल गैस त्रासदी को देखा और उसका आक्रमण झेला था। वह आक्रमण कईयों ने झेला था। मैंने भी झेला था।
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मैंने भी उस जहर की जलन को महसूस किया था अपनी आंखों में, अपने सीने में किन्तु आपने उस जलन के दर्द को इतना महसूस किया कि समाज के दर्द को दूर करने में यह भूल ही गए कि आपकी खुद की स्थिति क्या है? पिछले चार दिन हमें यह बता रहे थे कि हम क्या क्या नहीं जान पाए? आप समाज का ध्यान रख रहे थे, हम आपका ध्यान नहीं रख रहे थे। कुछ दोस्तों ने ध्यान रखा, किन्तु हमने तो नहीं!

जब्बार भाई ने भोपाल गैस त्रासदी में अपनी मां, पिता और भाई को खो दिया था। उनकी आंखों की 50 फ़ीसदी रोशनी भी चली गई थी। उन्हें लंग फाइब्रोसिस भी हो गया था। खुद को भीतर से बीमार करते हुए आप आन्दोलन को, जन संघर्ष को, संगठन को मज़बूत करने में जुटे रहे। एक निर्माण मजदूर ने जहरीली गैस से ऐसी लड़ाई लड़ी कि वह अब्दुल जब्बार से भोपाल के लोगों के लिए जब्बार भाई बन गया।

हज़ारों लोगों की जान लेने और लाखों लोगों को बीमार करने वाली इस औद्योगिक घटना को राजनैतिक और आर्थिक अपराध भी घोषित किया जाना चाहिए, जिसमें तत्कालीन सत्ताओं और न्यायपालिका ने भयंकर उपेक्षा और अमानवीयता का खुला प्रदर्शन किया। जब्बार भाई व्यवस्था से जूझ रहे थे। वे लगातार लड़ रहे थे, पर हमारा हिस्सा उनके संघर्ष में कम से कम होता जा रहा था। 

जब्बार भाई, आपको बताऊं कि हम सहयोग का कार्यकाल भी तय कर देते हैं। सोचते हैं, चलो आप इतना काम कर रहे हैं, तो कुछ हाथ हम भी लगा दें पर कुछ महीनों या सालों में वह हाथ हट जाता है। हम विद्वान् भी बन जाते हैं और विशेषज्ञ भी। फिर दुनिया में घूम-घूम के व्याख्यान देने लगते हैं। विज्ञान की व्याख्या भी करने लगते हैं और राजनैतिक अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद की भी। उस व्याख्या में जब्बार भाई धीरे-धीरे ओझल होते जाते हैं और फिर पूरी तरह से गुम हो जाते हैं। किताबें लिख ली गईं, प्रचार हो गए; लेकिन जब्बार भाई का क्या हुआ?
 
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