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बजट 2020: क्या अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने में कामयाब होगी मोदी सरकार?

Sanjiv Pandeyसंजीव पांडेय Updated Mon, 27 Jan 2020 01:47 PM IST
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बजट पेश करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। लोगों को उम्मीद है कि सरकार अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने की कोशिश करेगी।
बजट पेश करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। लोगों को उम्मीद है कि सरकार अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने की कोशिश करेगी।
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बजट पेश करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। लोगों को उम्मीद है कि सरकार अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने की कोशिश करेगी। सरकार जहां आयकर में छूट दे सकती है, वहीं अपने खर्च को बढ़ा सकती है। इस बीच तरह-तरह के सवाल भी उठ रहे है। क्योंकि मंदी के कारण जहां आम लोगों की आय घटी है, वहीं सरकार के अपने खर्च पर भी कैंची चलानी पड़ रही है। सलाह दी जा रही है कि सरकार असंगठित क्षेत्र को मजबूत करें जो नोटबंदी के कारण बर्बाद हो गया। चुकिं देश में उपलब्ध कुल रोजगार का 90 प्रतिशत रोजगार असंगठित क्षेत्र ही देता है। वहीं अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए किसानों की सलाना न्यूनतम आय बढ़ाने की सलाह भी सरकार को दी गई है। क्योंकि देश की बड़ी आबादी कृषि क्षेत्र में लगी है। दरअसल कारपोरेट सेक्टर के उत्पादों का बड़ी संख्या में इस्तेमाल इस देश का ग्रामीण और छोटे कस्बाई इलाका करता है। इसमें बहुत बड़ी संख्या किसानों की है। अगर किसान भूखे होंगे तो कंपनियां भी बंद होगी। सरकार को बेरोजगारों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी देने की सलाह भी दी जा रही है, ताकि लोगों में बाजार में खर्च करे की क्षमता बढ़े।
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मंदी से अर्थव्यवस्था को निकालने में सरकार कितनी समक्ष होगी
अगले बजट में अर्थव्यस्था को मंदी से निकालना सबसे बड़ी चुनौती अब सरकार को है। मंदी का प्रभाव कंपनियों पर ही नहीं दिख रहा है, बल्कि आम जनता पर भी दिख रहा है। क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था में सारा कुछ बाजार में एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। लोगों के पास पैसे होंगे तो लोग सामान खरीदेंगे। सामान खरीदेंगे तो कंपनियां उत्पाद बढ़ाएंगी। कंपनियां उत्पादन बढाएंगी तो उनका लाभ बढ़ेगा। इस लाभ का फायदा तीन फ्रंट पर होगा। कंपनियां अपना मुनाफा भी कमांएगी, सरकार को टैक्स रूपी आय भी बढ़ेगी, वहीं बैंकों के एनपीए भी कम होंगे। क्योंकि कंपनियां बैंकों का लोन तभी वसूलेंगी जब उन्हें बाजार में लाभ होगा। लोगों के आय पर ही नहीं रोजगार पर भी पड़ा है। वैसे में अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए सरकार को खर्च बढ़ाना होगा। लेकिन सरकार खर्च कैसे बढाएगी?  सरकारी की चुनौती एक तरफ राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना है। दूसरी तरफ विकास की योजनाओं को भी चलाना है। लेकिन सरकार को खर्च के पैसे भी जुटाने में दिक्कत हो रहे है। केंद्र सरकार लगातार रिजर्व बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लाभांश मांग कर रही है।

तेल कंपनियों से 19 हजार करोड़ रुपये मांगा
दरअसल केंद्र सरकार की आर्थिक हालात इस कदर खराब है कि अब सरकार रिजर्व बैंक से पैसे तो मांग ही रही है, वहीं तेल कंपनियों से भी सरकार अपने खराब होते बजट को देख पैसे मांग रही है। सरकार ने ओएनजीसी, इंडियन ऑयल समेत कई तेल कंपनियों से 19 हजार करोड़ रुपये का लाभांश मांगा है। सरकार ने ओएनजीसी से 6500 करोड़ रुपये लाभांश मांगा है, वहीं  इंडियन ऑयल से 5500 करोड़ और बीपीसीएल से 2500 करोड़ रुपये का लाभांश मांगा है। ये वहीं कंपनियां है जो सार्वजनिक क्षेत्र की है औऱ समय-समय पर सरकार को आर्थिक मुसीबतों से निकालती रही है। जब भी सरकार आर्थिक संकट में आयी है ये कंपनियां सरकार को मदद के लिए आगे आयी है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की जो कंपनियां सोने की अंडे देने वाली मुर्गी है, उन्हे भी सरकार बेचना चाहती है। सरकार अंधाधुंध निजीकरण कर रही है।
 
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