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बाल दिवस विशेष: बचपन पर गहराते संकट के बादल

Devendra Sutharदेवेंद्र सुथार Updated Thu, 14 Nov 2019 10:55 AM IST
भारत में प्रतिवर्ष 14 नवंबर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भारत में प्रतिवर्ष 14 नवंबर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
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ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
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भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी ...

भारत में प्रतिवर्ष 14 नवंबर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। जो सपने चाचा नेहरू ने बच्चों के खुशहाल जीवन को लेकर देखे थे, उनमें से आज कई धूमिल होते नजर आ रहे हैं। आज भी देश के करोड़ों बच्चे दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में स्कूल जाने के लिए किताबों से भरा बस्ता होना चाहिए, उस उम्र में वे मजदूरी करने को मजबूर हैं। ये विषम हालात ही हैं जो बच्चों को उम्र से पहले बड़ा बना रहे हैं। नि:संदेह बच्चे किसी देश का वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य भी होते हैं। अत: जिस देश के बच्चे वर्तमान में जितने महफूज व सुविधा-संपन्न होंगे, जाहिर है कि उस देश का भविष्य भी उतना ही उज्ज्वल होगा। लेकिन इसके विपरीत भारत में बाल का हाल किसी से छिपा नहीं है। देश में बाल श्रम अधिनियम (14 वर्ष से कम बच्चों से मजदूरी व जोखिम वाला काम करवाना अपराध है) व बाल मजदूरी कानून होने के बाद भी कोई न कोई छोटू किसी न किसी होटल या ढाबे पर बर्तन धोता या टेबल पर चाय परोसता मिल ही जाएगा।

गौरतलब है कि भारत में 60 मिलियन बच्चे बाल मजदूरी में संलग्न हैं। देश की सड़कों पर आए दिन कोई न कोई बच्चा फटे कपड़ों में भीख मांगता, 26 जनवरी व 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर झंडे बेचता और ट्रैफिक सिग्नल पर सलाम करता मिल ही जाएगा। यूनिसेफ ने तो इन बच्चों को स्ट्रीट चिल्ड्रन के नाम पर 2 भागों में वर्गीकृत किया है। एक तो वे बच्चे जो सड़कों पर भीख मांगते हैं और दूसरे वे जो सामान बेचते हैं। मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 1 करोड़ बच्चे सड़कों पर रहते हैं और काम करते हैं। ऐसे में जिस देश के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं, उस देश के विकसित होने का सपना देखना बेमानी ही होगा।

हालांकि देश में सर्वशिक्षा अभियान के तहत हर बच्चे को शिक्षा देने का दावा सरकार करती है लेकिन सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता न के बराबर है। यही कारण है कि सरकारी स्कूल के बच्चों व निजी स्कूलों के बच्चों की शिक्षा के स्तर में रात-दिन का अंतर नजर आता है। सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए मिड-डे मील, नि:शुल्क किताबें व कम फीस का ऑफर देकर सरकार केवल खानापूर्ति ही कर रही है। यह भी सच है कि आज संपन्न अभिभावक तो अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढऩे के लिए भेज ही रहे हैं, साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावक भी अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उनका दाखिला निजी स्कूलों में करवा रहे हैं, फिर भले ही इसके लिए उन्हें रात को भूखा ही क्यों न सोना पड़े। वहीं दूसरी ओर देश में हर दिन किसी न किसी बच्चे को यौन शोषण का शिकार होना पड़ रहा है। रिपोर्ट तो यह कहती है कि हर 3 घंटे में एक बच्चे को बाल यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है। सच्चाई यह भी है कि बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाने वाले अधिकतर इनके परिजन ही होते हैं।

 
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