कोरोना संग जीना है : क्या कोराना का मुकाबला हर्ड इम्यूूनिटी से होगा? कितना काम करेगी रोग प्रतिरोधक क्षमता?

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Wed, 27 May 2020 12:20 PM IST
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सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने का खयाल विश्व पटल पर उभरने लगा है!
सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने का खयाल विश्व पटल पर उभरने लगा है! - फोटो : अमर उजाला

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सार

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन लंबी जद्दोजहद के बाद यह मानने के लिए विवश हो गया है कि शायद कोरोना महामारी कभी दुनिया से नहीं जाएगी।
  • हर्ड इम्यूूनिटी से होगा कोरोना का मुकाबला।
  • शरीर के अंदर ही होते हैं शरीर के रक्षक।

विस्तार

कोरोना महामारी के मोर्चें पर विश्व बिरादरी की अगुवाई कर रहा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) लंबी जद्दोजहद के बाद यह मानने के लिए विवश हो गया है कि शायद कोरोना महामारी कभी दुनिया से नहीं जाएगी और यह स्थानिक (एन्डेमिक) बीमारी के रूप में इस धरती पर कहीं-कहीं अपना स्थाई निवास बना लेगी।
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ऐसी एन्डेमिक बीमारियां एक नहीं बल्कि अनेक हैं। ऐसी स्थिति में एक बार फिर हर्ड इम्यूूनिटी या सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने का खयाल विश्व पटल पर उभरने लगा है। इस विचार के पीछे तर्क यह है कि बीमारी को हो जाने दो जिससे प्रकृति ने जीवधारियों के अंदर जो प्रतिरक्षण क्षमता दी हुई है समूह में विकसित हो जाएगी जिससे महामारी की चेन स्वतः ही टूट जाएगी।
खसरा इसका एक उदाहरण है, जिसमें एक बार बीमारी लगने के बाद एक ही व्यक्ति पर दुबारा कभी वह बीमारी नहीं लगती, क्योंकि शरीर स्वतः ही उस बीमारी से लड़ने के लिए प्रतिरक्षण क्षमता हासिल कर लेता है।
  • कोरोना के साथ ही अब जीना होगा
लाॅकडाउन- 4 से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना था कि हमें अब मास्क पहने रहने और एक दूसरे से दो गज की दूरी बनाए रखने का पालन करने के साथ ही इन नियमों के साथ जीने की आदत डालनी होगी। इस सलाह या चेतावनी के पीछे प्रधानमंत्री का स्पष्ट संदेश है कि कोरोना फिलहाल कहीं नहीं जा रहा है और आगे भी जाने की उम्मीद नहीं है।
प्रधानमंत्री की यह आशंका बेबुनियाद नहीं है। दुनिया के अधिकांश वैज्ञानिक अब मानने लगे हैं कि शायद आने वाले कुछ समय तक हमें टीके की उम्मीद करने के बजाए इस वायरस के साथ जीने की आदत डालनी होगी। कई वैज्ञानिकों का कहना है कि एड्स और डेंगू जैसी बीमारियों का भी अब तक इलाज नहीं मिल पाया है।

हाल ही में ऑल इंडिया इंस्टिट्युट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना भी था कि हमें अब कोरोना वायरस के साथ ही जीने की आदत डालनी होगी।

अब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन के आपातकालीन सेवाओं के निदेशक डाॅॅ. माइक रियान ने भी जेनेवा में एक प्रेस कान्फ्रेंस में कह दिया कि कोविड-19 वायरस संभवतः कभी समाप्त नहीं होगा और विश्व में कहीं-कहीं एन्डेमिक या स्थानिक बीमारी के तौर पर स्थाई रूप से मौजूद रहेगा।

जाहिर है कि अगर बीमारी ने जाना ही नहीं है तो उसी के साथ जीने की आदत तो डालनी ही पड़ेगी। मगर जीवित रहने के लिए मानव समाज को अपने अंदर की प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत करनी होगी जो कि इस वायरस को शरीर के अंदर टिकने ही न दे। इसीलिए अब एक बार फिर ‘‘हर्ड इम्यूनिटी’’ ( झुंड प्रतिरक्षण) या सामूहिक प्रतिरक्षण क्षमता विकसित करने का खयाल चिकित्सा विज्ञानिकों को आ रहा है।
 
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शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए इम्यूनाइजेशन या टीकाकरण का सहारा भी लिया जा सकता है....

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