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मजदूर संकट: क्या राज्यों ने नहीं समझी अपनी जिम्मेदारी? आखिर कितनी है केंद्र की जवाबदेही?

Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Thu, 21 May 2020 05:07 PM IST
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40 दिनों से ऊपर के लॉकडाउन में राज्य मजदूरों की व्यवस्था करने में विफल रहे हैंं।
40 दिनों से ऊपर के लॉकडाउन में राज्य मजदूरों की व्यवस्था करने में विफल रहे हैंं। - फोटो : ANI

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महाबंदी के तीसरा दौर खत्म हो चुका है। राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से जान और जहान – दोनों को बचाने पर फोकस किया, उससे स्पष्ट रहा की महाबंदी का चौथा चरण उस तरह से लागू नहीं हुुुुआ, जैसे पिछले तीन चरण लागू हुए हैं।

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जाहिर है केंंद्र नेे राज्यों को अपने-अपने हिसाब से चीजों को खोलने और बंद करने का अधिकार दे दिया। दिल्ली में बहुत सी चीजें पटरी पर लौटी हैं जबकि वहीं कुछ जगह तालाबंदी है। 


बहरहाल, लॉकडाउन-4 तक आते-आते यह बात तो स्पष्ट है कि मजदूर रुकते और अपने काम पर जाने के अवसर का इंतजार करते। लेकिन राज्य सरकारों और उनके अधीन आने वाले प्रशासन ने जैसा रवैया इन मजदूरों के लिए अख्तियार किया है, उससे उन्हें कम से कम फिलहाल सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं रह गया है।

यकीनन उन्हें गांव की उस टूटी खपरैल या झोपड़ी में ही उम्मीद नजर आने लगी है, जिसे छोड़कर सिर्फ पेट पालने और तन ढंकने के लिए वे हजारों किलोमीटर दूर पहुंच गए।

श्रमिक रेल चल रही है, लेकिन सड़कों पर मजदूरों का हुजूम अब भी पैदल ही हजारों किलोमीटर की यात्रा करने को मजबूर है। मजदूरों की इस हालत ने साबित किया है कि औद्योगीकृत राज्य अपनी जिम्मेदारी निभाने और खुद के प्रति भरोसा बनाए रखने में नाकाम साबित हुए हैं।

24 मार्च को महाबंदी की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने मजदूरों के नियोक्ताओं और मकान मालिकों से अपील की थी कि बंदी के दौरान वे ना सिर्फ मजदूरों को उनकी तनख्वाह तो दे हीं, मकान मालिक किराया भी ना लें।

प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मजदूरों से अपील की कि वे दिल्ली ना छोड़ें और उन्हें उनके घरों पर ही खाना मुहैया कराया जाएगा।

उन्होंने मकान मालिकों से भी अपील की कि वे दो-एक महीने किराया ना लें। सांस्कृतिक परंपराओं वाले भारत में ऐसे सदिच्छु हर जगह नहीं हैं।

अब हालत यह है कि मजदूरों से मकान मालिक किराया मांगने लगे हैं और ना देने की स्थिति में घर खाली कराने की धमकी देने लगे हैं। इसी तरह कुछ नियोक्ताओं ने एक महीने तो तनख्वाह दे दी, लेकिन दूसरे महीने का वेतन देने से इनकार करने लगे हैं।

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