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कोरोना के संकट काल में अफवाहें: घबराने का नहीं यह मनुष्यता के लिए तैयार होने का समय है

Yogita Yadav योगिता यादव
Updated Wed, 25 Mar 2020 10:28 AM IST
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प्रधानमंत्री ने कोरोना के योद्धाओं के लिए ताली और थाली बजाने का आह्वान किया तो लोगों ने अपने-अपने अंदाज में इसके भाष्य रच डाले।
प्रधानमंत्री ने कोरोना के योद्धाओं के लिए ताली और थाली बजाने का आह्वान किया तो लोगों ने अपने-अपने अंदाज में इसके भाष्य रच डाले। - फोटो : PTI

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ये कोरोना का समय है। बेहद भयावह और उससे भी ज्यादा खतरनाक। सब अपने-अपने तरीके से इससे निपटने के गुर बता रहे हैं। चीन, ईरान और अब इटली में बढ़ती मौतों की गिनती के दहशतजदा माहौल में लोग खुद के जिंदा रहने की प्रार्थनाएं कर रहे हैं। पर भारतीय जनमानस यहां भी कमाल है। प्रधानमंत्री ने कोरोना के योद्धाओं के लिए ताली और थाली बजाने का आह्वान किया तो लोगों ने अपने-अपने अंदाज में इसके भाष्य रच डाले। सपेरों, टोटकों और गंडे-ताबीजों वाले अपने देश में किसी भी भले-बुरे समय में अफवाह न उड़े यह कैसे हो सकता है। तो इस बार यानी कोरोना के समय में लोग हल्दी, कुमकुम से आगे बढ़कर इटली के प्रधानमंत्री के आंसुओं को भी अफवाहों में शामिल कर लिया। 
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कोरोना संक्रमण के इस भयावह काल में प्रधानमंत्री ने देशवासियों से जनता कर्फ्यू की अपील की। रविवार को किए गए इस जनता कर्फ्यू में खुद को लॉकडाउन करने के साथ ही शाम को पांच बजे पांच मिनट के लिए प्रधानमंत्री ने ताली, थाली, शंख, घंटी आदि बजाकर उन लोगों के प्रत आभार व्यक्त करने की अपील की, जो अपनी जान जोखिम में डालकर इस खतरनाक वायरस से मुकाबला कर रहे हैं। इनमें डॉक्टर, नर्स साहित तमाम मेडिकल स्टाफ के साथ ही उन लोगों का भी आभार जताना था पुलिसकर्मियों, सफाई कर्मचारी जैसे काम में हैं, जिनके बिना हमारा काम एक दिन भी नहीं चल सकता। 


जनता ने प्रधानमंत्री की अपील पर न केवल जनता के, जनता द्वारा, जनता के लिए किए गए कर्फ्यू को सफल बनाया, शाम पांच बजे का सामुहिक स्वर भी यह बता रहा था कि यह देश किस तरह एकजुट है। पर यहीं से अफवाहों ने भी अपनी रफ्तार पकड़ी। मेडिकल स्टाफ और अन्य अपरिहार्य कर्मियों के त्याग और आभार को भूलकर वाट्सएप, फेसबुक और अन्य माध्यमों पर यह प्रसारित किया जाने लगा कि इस सामूहिक नाद से कोरोना वायरस परास्त हो जाएगा। कुछ लोगों ने अपनी विश्लेषण क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करते हुए इसे कॉस्मिक एयर और उसके प्रभाव से भी जोड़ दिया। 

अफवाहें यहीं थमने वाली नहीं थीं। दिन ढलते-ढलते दोस्तों–रिश्तेदारों के फोन आने शुरू हो गए कि आज की रात सोना नहीं है। जो सोएगा वह पत्थर का हो जाएगा। अफवाहकारों ने हरदोई, बांदा, उड़ीसा जैसे न जाने किस-किस जगह पर लोगों के पत्थर का हो जाने के दावे किए। जो बेचारे शाम को थाली और ताली बजा रहे थे उन्होंने इन अफवाहों में रात्रि जागरण किया। अभी कुछ दिन पहले ही एक स्वामीजी ने गौमूत्र पार्टी की थी, तो कुछ मारवाड़ी महिलाओं का वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें वे 'कोरोना भाग जा तू' का कीर्तन कर रहीं थीं।

इस बार महिलाओं की मंडली में हल्दी-कुमकुम का टोटका फिर से घूमना लगा। कहा गया कि अगर कोरोना से बचना है तो घर के बाहर गौमूत्र छिड़कें, गोबर से लीपें। बालकों की सलामती के लिए घर के दरवाजे के बाहर काजल के स्वास्तिक बनाएं, बच्चों के नाम पर हल्दी और कुमकुम के टीके लगाएं। पतियों के शुभ की कामना में मांग कर चूडि़यां पहनें और न जानें ऐसी कितनी ही अवफाहों ने इस स्वास्थ्य आपातकाल एक नए किस्म के मूर्खताकाल में बदल दिया। 
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