अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 2020: "व्यापक जैव विविधता से भरपूर है चंबल बेसिन"

Dr.Prabhat Kumar Singhalडॉ. प्रभात कुमार सिंघल Updated Fri, 22 May 2020 12:53 PM IST
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वन्यजीवों  को हमारे जंगलों और अभयारण्यों में देखा जा सकता है
वन्यजीवों  को हमारे जंगलों और अभयारण्यों में देखा जा सकता है - फोटो : अमर उजाला
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सार

  • चंबल नदी के बेसिन के अभयरण्यों एवं जंगलों में बबूल, बेर, सालर, खिरनी, लेबुरम,अर्जुन,धोक,बेल,महुआ,बेलानाइटिस आदि वनस्पतियां पाई जाती हैं।
  • चंबल नदी पर बांधों के बन जाने से नदी में रहने वाले जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया।

विस्तार

देश की जैव विविधता में वनस्पति के साथ-साथ वन्यजीवों का विशेष महत्व है। वन्यजीवों को हमारे जंगलों और अभयारण्यों में देखा जा सकता है। वन्य जीवों को बचाने एवं संरक्षित करने के लिए देश में अभयारण्यों का विकास किया गया एवं कई जगह चिड़ियाघर विकसित किए गए।
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अनेक जीवों का अस्तित्व समाप्त होने के कगार तक पहुंच गया जिन्हें संरक्षित करने के लिए उनके संरक्षण की विशेष योजनाएं संचालित की गई।
प्रारंभ में स्थापित अभयारण्यों में से अनेक को देश में राष्ट्रीय प्राणी पार्क बनाया गया। देश का प्रथम कॉर्बेट राष्ट्रीय प्राणी उद्यान 1936 में उत्तराखंड (पूर्व में उत्तर-प्रदेश में शामिल) में स्थापित किया गया।
जम्मू एवं कश्मीर का हेमिसा, राजस्थान का मरुभूमि,उत्तराखंड का गंगोत्री, अरुणाचल प्रदेश का नमदाफा, सिक्किम खांगचेगंडोंगा, छत्तीसगढ़ के गुरु घासीदास एवं इंद्रावती, गुजरात का गिर एवं पश्चिम बंगाल का सुन्दरबन देश के प्रमुख  विख्यात  राष्ट्रीय प्राणी पार्क हैं। ये नेशनल पार्क लुप्त होते वन्य जीवों का संरक्षण तो करते ही हैं वहीं इन्हें  देखने के लिए पूरे विश्व से सैलानी आते हैं।

वन्यजीवों के संरक्षण की इस सक्षिप्त रूपरेखा के साथ इस वर्ष के विश्व जैवविविधता दिवस पर हम चर्चा करते हैं व्यापक जैवविविधता से भरपूर चम्बल नदी के बेसिन में पाई जाने वाली जैव विविधता के की व्यापकता के बारे में।

चम्बल नदी भारत की पहली ऐसी नदी है जो दक्षिण से उत्तर की और मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में बहते हुए उत्तर प्रदेश के इटावा के समीप यमुना नदी की गोद में समा जाती है।
         
चम्बल नदी पर बांधों के बन जाने से देश को बिजली,सिंचाई और पेयजल सुविधा तो मिली किंतु नदी में रहने वाले जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया।

इस नदी के रेतीले तट गहरे जल में समा गए तथा कल-कल बहती हुई नदी विशाल जलाशय में बदल गई। अनेक प्रकार की मछलियां जो कल-कल बहने वाली नदी में ही रहना पसन्द करती हैं, वे नष्ट हो गई।

नदी के बीच में द्वीप क्षेत्रों पर तथा नदी के रेतीले तटों पर ऊदबिलाव, मगरमच्छ तथा घड़ियाल प्रजनन करते थे, अण्डे देते थे तथा रेत स्नान एवं धूप का आनन्द लेते थे। जब रेतीले तट और द्वीप क्षेत्र नष्ट हो गये तो इन जन्तुओं का प्रजनन करना बहुत कठिन हो गया और ये भी नष्ट होने के कगार पर आ गए।

आदमी द्वारा इन जलचरों का लगातार शिकार किए जाने के कारण भी ये प्रजातियां तेजी से नष्ट होने की तरफ बढ़ीं। 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि घडि़याल (गैवियलिस गैगेटिकस) चम्बल से लुप्त होता जा रहा है।

चम्बल नदी के बेसिन के अभयरण्यों एवं जंगलों में बबूल, बेर, सालर, खिरनी, लेबुरम,अर्जुन,धोक,बेल,महुआ,बेलानाइटिस आदि वनस्पतियां पाई जाती हैं। मुख्य घाटियों में धोक ही ज्यादा मिलता है। 

चम्बल नदी के किनारे कराइयों में चैसिंगा,जरख, काले हिरण,चिंकारा,चितकबरा हिरन, लोमड़ी, नीलगाय, भालू, पैंथर,टाइगर, साम्भर, नेवला, खरगोश, सियघोष,जंगली लंगूर, लाल मुह के बंदर,बिल्ली,सियार, भालू, जंगली बिल्ली, नेवला, खरगोश आदि वन्यजीव पाए जाते हैं।

यहां एवियन जाती के पक्षियों की विविधता असाधारण है। चम्बल के किनारे एवं जलाशयों में स्थानीय एवं ग्रीष्म-पथ प्रवास वाले पक्षियों में सारस,टिकड़ी, नकटा,छोटी डूबडूबी, सींगपर,जाँघिल, घोंघिल,चमचा,लोहरजंग, हाजी लगलग होता है।

इसके अलावा सफेद हवासील,गिर्री बतख,गुगलर बतख, छोटी सिलही बतख,सफेद बुज्जा, कौआरी बुज्जा, कला बुज्जा, सिलेटी अंजन, नरी अंजन, गजपाँव, बड़ा हंंसावर,टिटहरी,जर्द टिटहरी, अंधा बगुला,करछीया बगुला, गाय बगुला,गुडेरा,यूरेशियाई करवान,बड़ा करवान,छोटा पनकोवा, जल कूकरी,जीरा बटन,मोर, हीरामन तोता, कांटीवाल तोता, टुईयां तोता पाया जाता हैैै। 

इसके अलावा सामान्य पपीहा,हरा पतरंग, अबलक चातक, कबूतर, धवर फाखता, चितरोया फाखता, ईट कोहरी फाखता, टूटरुं, कुहार भटतीतर,कोयल,करेल उल्लू,हुदहुद, नीलकंठ, मैना, अबलकी मैना, गुलाबी मैना, अबाबील,रामगंगरा, सफेद भौंह खंजन, बैंगनी शक्कर खोरा, मुनिया, बयां, चित्रित तीतर, सफेद तीतर, सिलेटी दुम फुदकी, गौरैया आदि प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। मोर भी बड़ी संख्या में देखे जाते हैं। 

शीत ऋतु के दौरान अनेक प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में देखने को मिलते हैं। राजहंस, सरपट्टी सवन, नीलसर,छोटी मुर्गाबी, छोटी लालसिर बतख, तिधलरी बतख,  पियासन बतख ,अबलख बतख, सुर्खाब, गेड़वाल, जमुनी जलमुर्गी, जल पीपी, जलमुर्गी, पीहो, छोटी सुरमा चैबाहा, चुटकन्ना उल्लू,कला शिरशिरा एवं सफेद खंजन आदि प्रमुख प्रवासी पक्षी देखे जाते हैं।  चम्बल नदी क्षेत्र में लगभग 150 प्रकार की पक्षी प्रजातियां पायी जाती हैं। कीटों की भी कई प्रजातियां पाई जाती हैं। 
  • चम्बल घडियाल अभयारण्य
घड़ियाल पूरे विश्व में केवल गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, सिन्ध तथा चम्बल में ही पाए जाते थे। वर्ष 1974 में सिन्ध नदी में लगभग 70 घडियाल थे किन्तु अस्सी के दशक में सिन्ध नदी में एक भी घड़ियाल शेष नहीं रहा।

वैज्ञानिकों ने बताया कि इन जलचरों की प्रजातियों के समाप्त होते जाने का प्रमुख कारण उनके नैसर्गिक निवास स्थलों का नष्ट होना, चमड़े के लिए शिकार किया जाना तथा मछली पकड़ने के जालों में फंस जाने के कारण डूबने से मर जाना बताया।

अत: भारत सरकार ने घड़ियाल के पुनर्वास की व्यापक योजना बनाई जिसके तहत घडियालों एवं मगरमच्छों के अण्डों से बच्चे तैयार कर उन्हें फिर से नदियों में छोड़ा जाना सम्मिलित था। चम्बल नदी घडियालों के लिए बेहतर प्राकृतिक आवास है। इसके अतिरिक्त अन्य लुप्तप्राय: जीव जैसे ऊदबिलाव, गांगेय सूंस (डाल्फिन) तथा मगर मच्छ भी इसमें पाए जाते हैं।
 
लुप्त होते घड़ियालों के संरक्षण के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा 30 सितम्बर 1978 को रास्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य के लिए प्रशासनिक स्वीकृति जारी की गई। यह अभयारण्य तीन राज्यों की सीमा क्षेत्र में आने से मध्य प्रदेश राज्य क्षेत्र की अधिसूचना 20 दिसम्बर 1978 को की गई।

इसी प्रकार की अधिसूचना उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा  20 जनवरी 1979 को एवं राजस्थान राज्य द्वारा 7 दिसम्बर 1979 को जारी की गई। लगभग 600 किलोमीटर लम्बे तथा नदी तट के दोनों ओर 1000 मीटर चैड़े क्षेत्र को अभयारण्य घोषित कर दिया। चम्बल घड़ियाल अभयारण्य का दक्षिणी छोर कोटा शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर जवाहर सागर बांध से प्रारम्भ होता है।

कोटा बैराज के केशोरायपाटन तक के 18 किलोमीटर के मुक्त क्षेत्र को छोड़कर यह अभयारण्य पालीघाट, बटेसुरा होते हुए पंचनदा में चम्बल, पहूंज, कुंवारी और सिंध नदियों के यमुना में मिलन स्थल तक फैला हुआ है।

अभयारण्य की देखरेख एवं प्रशासनिक कार्य के लिए वन विभाग के अधीन परियोजना अधिकारी का कार्यालय मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थापित किया गया।

चम्बल नदी में घड़ियाल संरक्षण परियोजना 1979 से प्रारंभ की गई और 1980 में इसकी स्थापना की गई। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्य मगरमच्छ प्रजातियों  के संरक्षण का दुनिया में सब से बड़ा अभयारण्य है।
 
चम्बल नदी में 1979 से 1987 के मध्य अलग-अलग स्थानों पर तीन से चार वर्ष की आयु के लगभग एक से दो मीटर तक की लम्बाई वाले 1287 शिशु घडियाल छोड़े गए। ये घडियाल शिशु मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के देवरी घडियाल प्रजनन केन्द्र से लाए गए थे।

घड़ियाल प्रजनन के लिए राजस्थान में कोटा के निकट गुड़ला में बेहतर साइट है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश की इटावा रेंज में खेड़ा अजब सिंह, कसऊआ,पिनाहट रेंज के रेहा घाट, विप्रवली, चम्बल की रेतिया, बाह केन्जरा, हरलालपुरा एवं नंदगवां में घड़ियाल की प्रजनन साइटस है। इनका प्रजनन काल 15 जून तक होता है जब अंडों से बच्चे निकलते हैं।

एक मादा घड़ियाल एक समय में अपने घोंसले जिसे बिल भी कहते है 40 से 60 अंडे देती हैं। अक्सर 15 जून के बाद मानसून का मौसम शुरू हो जाता है। बरसात से और नदी में पानी के तेज वेग से काफी अंडे बह कर नष्ट हो जाते हैं और 10 प्रतिशत बच्चे ही बच पाते हैं।

रेत का अवैध खनन भी इनके जीवन को प्रभावित करता है। इन जगहों पर घड़ियालों को प्रजनन करते, अंडों से नन्हे-नन्हे बच्चे निकलते,उनकी  अठखेलियां देख खास कर विदेशी सैलानी आनन्दित होते हैं।
 

घड़ियाल अभयारण्य को देखने के के लिए उपवन संरक्षक (वन्य जीव) मुरैना  से अनुमति लेनी होती है। जवाहर सागर से कोटा बैराज तक या तो नदी में नाव के माध्यम से या फिर नदी के तट पर जीप के द्वारा यात्रा की जा सकती है।

चम्बल घड़ियाल अभयारण्य को नजदीक से देखने के लिए अनेक स्थानों पर व्यू पॉइंट्स बनाये गए हैं। कई व्यू पॉइंट से कोटा में उपलब्ध गाइड के साथ जलचर, किनारे के पक्षी एवं लैंड्सकैप का आनन्द और फोटोग्राफी के लिए बोट सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

पिनाहट,नंदगांव घाट,सेहसों एवं भरच तक वाहन से भी जाया जा सकता है। वन्यजीव संरक्षण अधिकारी के माध्यम से बोटिंग की व्यवस्था की जा सकती है। अभयारण्य परियोजना क्षेत्र में नदी की गहराई में गेपरनाथ महादेव का स्थल है।

केशोरायपाटन में भगवान कृष्ण के प्राचीन मंदिर हैं, जहाँ पर्यटक ग्रामीण मेलों का आनन्द उठा सकते हैं। पालीघाट से रणथम्भौर का ऐतिहासिक किला, बाघ परियोजना क्षेत्र और अभयारण्य अधिक दूर नहीं हैं। 
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