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International Men's Day 2019: क्या महिला विकास मंत्रालय की तरह ही बन पाएगा पुरुष विकास मंत्रालय?

Devendra Sutharदेवेंद्र सुथार Updated Tue, 19 Nov 2019 12:29 PM IST
पुरुष पहाड़ के भांति परिवार पर आने वाली हरेक विपदा से टकराता है और रक्षा के लिए मर मिट जाता है।
पुरुष पहाड़ के भांति परिवार पर आने वाली हरेक विपदा से टकराता है और रक्षा के लिए मर मिट जाता है। - फोटो : free pic
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जी हां, मैं पुरुष हूं ! मां के पेट से जब मैं दुनिया में आता हूं, परिवार के सपने पूरे करने का जरिया बन जाता हूं, कोई मुझे बुढ़ापे का सहारा कहता है, तो किसी की आंखों का तारा बन जाता हूं। लेकिन फिर भी मैं अत्याचारी कहलाता हूं। जी हां, मैं पुरुष हूं ! वैसे तो जीवन रूपी गाड़ी के पुरुष और महिला दोनों ही पहिये हैं लेकिन हमारे समाज में जितना मान और सम्मान महिलाओं को दिया जाता है शायद उतना पुरुषों को नहीं मिलता। पुरुष नेपथ्य में रहते हुए अपनी जिम्मेदारियों व दायित्वों का भलीभांति निर्वहन करता जाता है।
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पुरुष पहाड़ के भांति परिवार पर आने वाली हरेक विपदा से टकराता है और रक्षा के लिए मर मिट जाता है। लेकिन इन सबके बाद भी पुरुषों को हमारे समाज में एक बलात्कारी, अत्याचारी छवि के रूप में देखने का चलन बदस्तूर जारी है। क्योंकि पुरुष अपनी विनम्रता और सहनशक्ति के कारण हर जख्म को हंसते-हंसते सह जाता है। 'मर्द को दर्द नहीं होता' कहने वाले हकीकत से दूर ही रहते हैं कि मर्द को भी दर्द होता है। लेकिन वह कभी भी अपने दर्द का प्रदर्शित नहीं करता। 

दुनिया भर में महिला दिवस की जितनी चर्चा होती है, उतनी पुरुष दिवस की हो ही नहीं पाती। हम यह भूलते जा रहे हैं कि दिवस केवल विडंबनाओं का परिचायक नहीं है, बल्कि यह किसी विशेष वर्ग के उल्लेखनीय कार्यों को समाज के समक्ष प्रदर्शित करने का माध्यम है। यही कारण है कि हम महिला दिवस पर महिलाओं की दयनीय दशा का रोना तो रो देते हैं लेकिन पुरुष दिवस पर हमारा यह रुदन मौन साध लेता है। आज 19 नवंबर को इंटरनेशनल मेन्स डे है, यानी पुरुषों का दिन। जानकारी के अनुसार अमेरिका के मिसौर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थॉमस योस्टर की कोशिशों के बाद पहली बार 7 फरवरी 1992 को पुरुष दिवस मनाया था।

अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कुछ देशों ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस का जश्न मनाया था। लेकिन साल 1995 से कई देशों ने फरवरी महीने में पुरुष दिवस मनाना बंद कर दिया। हालांकि कई देश इस दौरान भी अपने-अपने हिसाब से पुरुष दिवस का जश्न मनाते रहे हैं। 1998 में त्रिनिदाद एंड टोबेगो में पहली बार 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया गया और इसका सारा श्रेय डॉ. जीरोम तिलकसिंह को जाता है। यूनेस्को ने इस प्रयास के लिए जीरोम की काफी सराहना की थी।
 
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