विज्ञापन
विज्ञापन

Gandhi Jayanti 2019: कहानी गांधी जी के टूटे दांत की

Rajshekhar Vyasराजशेखर व्यास Updated Wed, 02 Oct 2019 11:22 AM IST
डाॅक्टर ने बापू का दांत निकाल दिया। गांधीजी डाॅक्टर की पीछे मोटर की ओर धीरे-धीरे चलने लगे।
डाॅक्टर ने बापू का दांत निकाल दिया। गांधीजी डाॅक्टर की पीछे मोटर की ओर धीरे-धीरे चलने लगे। - फोटो : Social Media

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
महात्मा गांधी अंधश्रद्धा के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि सिद्धांत की पूजा सर्वत्र की जानी चाहिए मगर सिद्धांतवादी की पूजा सुखदायी नहीं है। ऐसे में जब एक आश्रमवासी द्वारा उनके टूटे हुए दांत की पूजा-प्रतिष्ठा का पता उन्हें चला तो उन्होंने इसका विरोध किया और आश्रमवासियों को कड़ा पत्र लिखा।
विज्ञापन

यह गांधीजी के जीवन की सत्य घटना है। गांधीजी उन दिनों दिल्ली में थे। राजनीतिक कार्यों के भारी बोझ से दबे हुए थे, तभी उन्हें सहसा ऐसा मालूम हुआ कि उनका एक दांत हिल गया है और वह गिरना चाहता है। गांधी जी  ने डॉक्टर के यहां जाने का निश्चय किया। एक आश्रमवासी गांधीजी के साथ जाने के लिए तैयार हो गए। ज्यों ही गांधीजी ने इस आश्रमवासी से साथ चलने के लिए कहा उसे विचार आया कि डाॅक्टर बापू का यह दांत निकालकर फेंक देगा।

परंतु डॉक्टर के यहां जाते समय गड़बड़ी हो गई। ज्यों ही गांधीजी कार में बैठे उनसे मिलने आए एक प्रसिद्ध साहित्यकार भी साथ बैठ गए। कार में अब कोई जगह नहीं थी, बेचारे आश्रमवासी बंधु ठगे-से रह गए। वह कुछ न कर सके। उन्होंने साहित्यकार बंधु से कहा, ’’एक प्रार्थना है गांधीजी के साथ आप जा ही रहे है। तो मेरा इतना-सा काम कर दें कि बापू को जो दांत डाॅक्टर निकाले, वह लाकर मुझे दे दीजिए। उसके लिए इसका कोई मूल्य नहीं है पर मेरे लिए तो वह अधिक मूल्यवान है।’’
साहित्यकार ने सोचा कि यह आश्रमवासी इस बेकाम दांत का क्या करेगा? फिर उन्होंने दांत लाकर देने का वचन दिया। कार चली और साहित्यकार बंधु गांधीजी के दांत के बारे में सोचने लगे। उन्होंने सोचा कि यह आश्रमवासी दूरदर्शी है जब गांधीजी नहीं रहेंगे उस समय यह कितना मूल्यवान होगा। संभव है उस समय इसकी विश्व की अमूल्य निधि में गणना हो। कार रुक गई। डाॅक्टर के घर के सामने कार के रुकते ही साहित्यकार के विचारों की गति भी रुक गई। गांधीजी कार से उतरकर साहित्यकार बंधु के साथ दवाखाने में चले गए।

दांत निकल गया
डाॅक्टर ने बापू का दांत निकाल दिया। गांधीजी डाॅक्टर की पीछे मोटर की ओर धीरे-धीरे चलने लगे। इधर साहित्यकार बंधु बड़े असमंजस में थे कि क्या करूं फिर वह कंपाउंडर के पास पहुंचे और उनसे दांत मांगने लगे परंतु कंपाउंडर भी कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं था। वह स्वयं उस दांत को सुरक्षित रखने का विचार रखता था, इसलिए उसने कहा कि बापू का दांत डॉक्टर साहब से ही मांग लेना, मैं उनकी आज्ञा के बिना किसी को नहीं दे सकता।

साहित्यकार बंधु को लगा कि बाजी हाथ से जा रही है इसलिए उन्होंने अंतिम पासा फेका। बोले, ’’ भाई इसमें डॉक्टर से पूछने की क्या आवश्यकता है जबकि बापू ने स्वयं इसे लाने के लिए कहा है। बापू कार में बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। ’’ इस तरह गांधीजी के नाम की दुहाई देकर वह चुप हो गए। ’’ बापू स्वयं मांग रहे हैं फिर भी डाक्टर साहब को तो आने दीजिए।’’ कंपाउंडर ने कहा। इतने में गांधीजी को कार में बिठाकर डॉक्टर साहब इधर आने लगे।

कई प्रसिद्ध महापुरुषों के दांत इन्होंने ही निकाले थे परंतु इतना आनंद और प्रसन्नता इन्होंने इससे पूर्व कभी महसूस नहीं की थी। इन्होंने विचार किया कि इस महापुरुष के दांत को गंगाजल से धोकर रजत पात्र में रखूंगा पर ज्यों ही लौटे कि पता चला कि बापू अपना दांत मंगवा रहे हैं।

तू चोर है, मेरे दांत का
एक प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉक्टर साहब के सामने खड़े थे। उनके कथन पर शंका करने को कोई कारण नहीं था। डॉक्टर ने निःश्वास लिया और लीजिए कहकर दांत दे दिया और आरामकुर्सी पर सुस्त पड़ गए, जैसे कि उनका घनिष्ठ संबंधी आज उनसे खो गया हो। साहित्यकार बंधु ने बापू के दांत को बहुत गंभीरतापूर्वक रुमाल में लपेटकर कार की ओर अपने पैर बढ़ाए।

कार में गांधीजी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वह बोले,’’इतना समय कैसे हो गया, क्या तुम्हें भी अपना दांत निकलवाना था?’’ गांधीजी ने उपहास किया। नहीं बापू, मेरे दांत इतने निर्बल नहीं हुए है।’’ कहते हुए साहित्यकार बंधु कार में जा बैठे।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us