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असमः समझौते के बाद बोडो राजनीति में हलचल

Ravishankar Ravi रविशंकर रवि
Updated Fri, 14 Feb 2020 04:08 PM IST
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अब हाग्रामा से असंतुष्ठ अन्य बोडो तबका एकजुट हो रहा है।
अब हाग्रामा से असंतुष्ठ अन्य बोडो तबका एकजुट हो रहा है। - फोटो : अमर उजाला

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नए बोडो समझौते के बाद से बोडोलैंड की राजनीति में हलचल है। अब तक वहां पर हाग्रामा मोहिलारी की अगुवाई में बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट का दबदबा था, लेकिन अब हाग्रामा से असंतुष्ठ अन्य बोडो तबका एकजुट हो रहा है।

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बता दें कि हाग्रामा ने लगातार 15 वर्षों तक बोडोलैंड पर राज किया है। ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (आब्सू) के साथ उनकी कभी नहीं बनी, इसलिए आब्सू ने हाग्रामा से नाराज होकर अलग दल यूनाईटेड प्रोग्रेसिव पार्टी (लिबरल) के नेताओं का हर चुनाव में समर्थन किया, लेकिन हाग्रामा की चालाकी और पैसे की ताकत की वजह से किसी और की नहीं चली।


आब्सू आरंभ से ही अलग बोडो राज्य की मांग करता रहा था। जबकि हाग्रामा क्षेत्रीय परिषद के गठन से संतुष्ठ थे। अब नए बोडो समझौते में बीटीसी की जगह बीटीआर (बोडोलैंड टेटोरियल रीजन) का गठन हो गया है।

अब आब्सू के निर्वतमान अध्यक्ष प्रमोद बोडो हाग्रामा को टक्कर देने के लिए नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के नेताओं को साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड तथा ऑल बोडो छात्रसंघ (आब्सू) के साथ केंद्र और राज्य सरकार का नए बोडो समझौता होने के बाद से बोडोलैंड की राजनीति में हलचल है।

बोडोलैंड लिबरेशन टाईगर्स के साथ 2003 में समझौता होने के बाद बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) का गठन हुआ और  बोडो राजनीति पर उग्रवादी से राजनेता बने हाग्रामा मोहिलारी का वर्चस्व रहा है।
 

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