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National Voters' Day 2020: समझनी होगी मतदान की अहमियत

Devendra Suthar देवेंद्र सुथार
Updated Sat, 25 Jan 2020 01:23 PM IST
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ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में मतदान नहीं करने पर सजा का भी प्रावधान है।
ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में मतदान नहीं करने पर सजा का भी प्रावधान है। - फोटो : अमर उजाला

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किसी भी लोकतांत्रिक देश में मतदान जनता का सबसे अहम अधिकार होता है। जनता का मत ही तय करता है कि सत्ता की डोर किसके हाथ में रहेगी। लेकिन विडंबना है कि हमारे देश में वोट देने के दिन लोगों को जरूरी काम याद आने लग जाते हैं। कई लोग तो वोट देने के दिन अवकाश का फायदा उठाकर परिवार के साथ घूमने चले जाते हैं।
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कुछ लोग ऐसे भी हैं जो घर पर होने के बावजूद भी वोट देने के लिए वोटिंग बूथ तक जाने में आलस करते हैं, इसलिए हमारे किसी भी चुनाव में शत-प्रतिशत मतदान का लक्ष्य पूर्ण नहीं हो पाता। साथ ही, एक तबका ऐसा भी है जो प्रत्याक्षी के गुणों को नहीं बल्कि धर्म, मजहब व जाति देखकर अपने वोट का प्रयोग करता है। वहीं वोट की खरीद-फरोख्त से भी हमारा मतदाता वर्ग अछूता नहीं है।


यह हमारे लोकतंत्र की खामी ही है कि नेक और योग्य व्यक्ति जो व्यवस्था परिवर्तन करने का जज्बा रखते हैं, वे इस अव्यवस्था के आगे हाथ मलते रह जाते हैं। अतः हम तब तक अच्छी व्यवस्था खड़ी नहीं कर पाएंगे, जब तक हम मतदाता होने के फर्ज को पूरी निष्ठा व जिम्मेदारी के साथ निभा नहीं देते। 

आज विश्व के 30 से अधिक देशों में अनिवार्य मतदान का कानून मौजूद है। इन देशों में ऑस्ट्रिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, बोलीविया, ब्राजील, चिली, कोस्टा रिका, साइप्रस, डोमिनिकन गणराज्य आदि शामिल है। इनमें से अधिकतर देशों ने मतदान को नागरिक का अधिकार माना है तो वहीं कुछ देशों ने मतदान को राष्ट्रीय कर्तव्य की संज्ञा से जोड़ दिया है।

ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में मतदान नहीं करने पर सजा का भी प्रावधान है। अनिवार्य मतदान को सबसे पहले लागू करने वाला देश बेल्जियम है जहां यह कानून 1892 से लागू है। उसके बाद अर्जेंटीना ने साल 1914 में और ऑस्ट्रेलिया ने 1924 में इसको अपनाया।

कानून के तहत मतदान के दिन उपस्थित न होने वाले मतदाता को नियत जुर्माना अदा करना पड़ता है और ऐसा न करने पर जेल भी जाना पड़ता है। बीमार, असमर्थ परिस्थितियों में इससे छूट तो है, लेकिन जुर्माना देय है। देखा गया है कि 1924 से पूर्व जब वहां अनिवार्य मतदान नहीं था तब महज 47 फीसद के आस-पास वोट पड़ते थे लेकिन इसके बाद वहां 96 फीसद तक वोट पड़ते हैं।
 
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