भारत के लिए जनभागीदारी और जागरूकता के बिना संभव नहीं है प्लास्टिक से मुक्ति

Neelam Mahendraडॉ. नीलम महेंद्र Updated Thu, 26 Sep 2019 07:30 PM IST
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भारत में प्लास्टिक से हो रहा प्रदूषण तेजी से बढ़ता जा रहा है।
भारत में प्लास्टिक से हो रहा प्रदूषण तेजी से बढ़ता जा रहा है। - फोटो : File
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वैसे तो विज्ञान के सहारे मनुष्य ने पाषाण युग से लेकर आज तक मानव जीवन सरल और सुगम करने के लिए एक बहुत लंबा सफर तय किया है। इस दौरान उसने एक से एक वो उपलब्धियां हासिल कीं जो अस्तित्व में आने से पहले केवल कल्पना लगती थीं फिर चाहे वो बिजली से चलने वाला बल्ब हो या टीवी फोन रेल हवाईजहाज कंप्यूटर इंटरनेट कुछ भी हो। ये सभी अविष्कार वर्तमान सभ्यता को एक नई ऊंचाई, एक नया आकाश देकर मानव के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव का कारण बने। 

प्लास्टिक की खोज और उसका प्रसार 

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1907 में जब पहली बार प्रयोगशाला में कृत्रिम "प्लास्टिक" की खोज हुई तो इसके आविष्कारक बकलैंड ने कहा था, "अगर मैं गलत नहीं हूं तो मेरा ये अविष्कार एक नए भविष्य की रचना करेगा।" और ऐसा हुआ भी, उस वक्त प्रसिद्ध पत्रिका टाइम ने अपने मुख्य पृष्ठ पर लियो बकलैंड की तस्वीर छापी थी और उनकी फोटो के साथ लिखा था, "ये ना जलेगा और ना पिघलेगा।"
समय बढ़ता रहा और जब 80 के दशक में धीरे-धीरे पॉलीथिन की थैलियों ने कपड़े के थैलों, जूट के बैग, कागज के लिफाफों की जगह लेनी शुरू की हर आदमी मंत्र मुग्ध था। हर रंग में, हर नाप में, इससे बनी थैलियों में चाहे जितने वजन का सामान डाल लो फटने का टेंशन नहीं इनसे बने कप कटोरियों में जितनी गरम चाय कॉफी या सब्जी डाल लो हाथ जलने या फैलने का डर नहीं।
कैसे नुकसानदेह बनता गया प्लास्टिक 
सामान ढोना है, खराब होने या भीगने से से बचाना है, पन्नी है ना! बिजली के तार को छूना है लेकिन बिजली के झटके से बचना है प्लास्टिक की इंसुलेशन है ना! खुद वजन में बेहद हल्की परंतु वजन सहने की बेजोड़ क्षमता वाली एक ऐसी चीज हमारे हाथ लग गई थी जो लगभग हमारी हर मुश्किल का समाधान थी, हमारे हर सवाल का जवाब थी, यही नहीं, वो सस्ती सुंदर और टिकाऊ भी थी,यानी कुल मिलाकर लाजवाब थी।

लेकिन किसे पता था कि आधुनिक विज्ञान के एक वरदान के रूप में हमारे जीवन का हिस्सा बन जाने वाला यह प्लास्टिक एक दिन मानव जीवन ही नहीं सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए भी बहुत बड़ा अभिशाप बन जाएगा। "यह न जलेगा न पिघलेगा" जो इसका सबसे बड़ा गुण था, वही इसका सबसे बड़ा अवगुण बन जाएगा।

जी हां आज जिन प्लास्टिक की थैलियों में हम बाजार से सामान लाकर आधे घंटे के इस्तेमाल के बाद ही फेंक देते हैं उन्हें नष्ट होने में हज़ारों साल लग जाते हैं। इतना ही नहीं इस दौरान वो जहां भी रहें मिट्टी में या पानी में अपने विषैले तत्व आसपास के वातावरण में छोड़ती रहती हैं।
 

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