मृत्यु से पहले काफ्का ने की थी अपने साहित्य को आग में जलाने की विनती

Dayashankar shuklaदयाशंकर शुक्ल सागर Updated Mon, 07 Oct 2019 09:40 AM IST
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वही, फ्रेंज काफ्का, जो केवल इकतालिस साल की उम्र में एक बंद अंधेरे कमरे में गले के 'वायस बाक्स' के तपेदिक से खांसते हुए मर गया।
वही, फ्रेंज काफ्का, जो केवल इकतालिस साल की उम्र में एक बंद अंधेरे कमरे में गले के 'वायस बाक्स' के तपेदिक से खांसते हुए मर गया। - फोटो : सोशल मीडिया

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लाल घपरैल की छत के घर के बाहर आपको अंग्रेजी अक्षर का लकड़ी के लॉकेट की तरह बने निशान पर 'के' लिखा है। यानी आप काफ्का के म्यूजिम पहुंच गए। मैं सोचता हूं ये लकड़ी, उसी डॉगवुड ट्री से बनी है, जिस दरख्त की लकड़ी से बनी सूली पर ईसा मसीह को लटकाया गया होगा। 'के' यानी काफ्का। काफ्का यानी विचित्र कथानक और रहस्यमय शब्दों का जादूगर। जो कहता था- हमें ऐसी किताबें पढ़नी चाहिए, जो कुल्हाड़ी की तरह हमारे अंदर के जमे बर्फ के समंदर को चीरती चली जाए, हमें चोट पहुंचाए, हमें भीतर तक घायल कर दे। हम ऐसी किताबें पढ़े, जिसे पढ़ने के बाद हम बिल्कुल वैसे न रहें जैसे हम किताब पढ़ने से पहले थे।
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मरने से पहले काफ्का ने की थी अपने साहित्य को आग में जलाने की विनती

वही, फ्रेंज काफ्का, जो केवल इकतालिस साल की उम्र में एक बंद अंधेरे कमरे में गले के 'वायस बाक्स' के तपेदिक से खांसते हुए मर गया। वही काफ्का, जिसने मरने से पहले अपने दोस्त और अपनी प्रेमिका से वादा लिया कि वह उसके अब तक लिखे सारे साहित्य को आग में जला दे क्योंकि वो सब कचरे के अलावा और कुछ नहीं। लेकिन उनके दोनों करीबी दोस्त ये हिम्मत नहीं जुटा सके।
भाप बनकर उड़ जाती है हर क्रांति
उसका लिखा छपा और पूरी दुनिया में तहलका मच गया। उसकी कलम में जादू था। एक तरह का अति-यर्थातवाद। वह रातों रात एक इंसान से एक कीड़े में तब्दील होकर उसकी तरह सोच सकता था। गंदे कीड़े की तरह खुद को रेंगता हुआ महसूस कर सकता था। वो काफ्का, जो नौकरशाही से बेतरह नफरत करता था और कहा करता था कि 'हर क्रान्ति आखिरकार भाप बन कर उड़ जाती है, और अपने पीछे नई नौकरशाही का कीचड़ छोड़ जाती है।'

वो काफ्का, जो कहता था-"मैं आपको समझा नहीं सकता। मैं किसी को भी ये समझा नहीं सकता कि मेरे भीतर क्या चल रहा है। और हैरत की बात है कि इसे मैं खुद को समझा भी नहीं सकता कि मेरे अंदर क्या चल रहा है।” वो काफ्का, जो प्राग के शानदार महल (प्राग कासैल) के चट्टानी पत्थरों से छोटे से सर्वेंट क्वाटर नम्बर-22 में आकर अपने अंदर का सारा जहर कागजों पर उतार देता था। वह काफ्का, जो खून की उल्टियां करते हुए लिखता रहा, लिखता रहा जब तक कि वह मर नहीं गया।
 
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