मुख्य धारा से दूर भारत का एक मात्र गांधी पंथी अहिंसक समुदाय है टाना भगत

Gautam Chaudharyगौतम चौधरी Updated Sun, 06 Oct 2019 10:33 AM IST
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जब टाना भगत आंदोलन प्रारंभ हुआ था तो इस आंदोलन को दबाने के लिए ब्रितानी हुकूमत ने इनकी जमीन को बलात नीलाम कर दी थी।
जब टाना भगत आंदोलन प्रारंभ हुआ था तो इस आंदोलन को दबाने के लिए ब्रितानी हुकूमत ने इनकी जमीन को बलात नीलाम कर दी थी। - फोटो : सोशल मीडिया

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टाना से टाना टोन टाना,
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कांसा-पीतल माना,
दोना-पत्तल खाना,
टाना से टाना टोन टाना,
हड़िया-दारू माना,
मूला भट-भूटल खाना,
टाना से टाना टोन टाना!


यह घोष वाक्य जतरा टाना भगत का है। गांधी आज दुनिया में पूजे जाते हैं। हर जगह गांधी की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है लेकिन गांधी को जीने वाला कोई समूह है तो वह टाना भगतों का समूह है। यह समूह गांधी के बताए रास्ते सत्य और अहिंसा के साथ आज भी जी रहे हैं। हिंसा से भरी इस दुनिया में झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र का टाना भगतों का समाज सचमुच अभिनव है।

जब हम उनके संघर्ष और सहिष्णुता के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालेंगे तो लगता है सचमुच गांधी इस धरती पर आज भी जीवित हैं और वह टाना भगतों के भौतिक शरीर में देखे जा सकते हैं। कोई आडंवर नहीं, कोई उठा-पटक नहीं, विगत लगभग 100 वर्षों से ये शालीनता से अपना जीवन जीए जा रहे हैं।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब टाना भगत आंदोलन प्रारंभ हुआ था तो इस आंदोलन को दबाने के लिए ब्रितानी हुकूमत ने इनकी जमीन को बलात नीलाम कर दी थी। स्वतंत्र भारत की सरकार भी इन्हें वो जमीन वापस नहीं दिला पाई। टाना भगत आज भी उस मांग को लेकर अहिंसक आंदोलन करते रहते हैं। टाना भगतों की अपनी दुनिया है और अपना पंथ है। गांधी की 150वीं जयंती पर टाना भगतों को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि वे आज भी गांधी के बताए अहिंसक रास्ते पर चल रहे हैं। उनका जीवन बेहद सरह है और कम से कम संसाधनों में अपना निर्वहन करते हैं।
 
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