विश्व डाक दिवस 2019 : आपके घर में आखिरी चिट्ठी कब आई थी?

Devendra Sutharदेवेंद्र सुथार Updated Wed, 09 Oct 2019 01:26 PM IST
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याद है मां का दरवाजे पर टकटकी लगाए देखना, साइकिल पर थैला लगाए डाकिया अंकल का इंतजार
याद है मां का दरवाजे पर टकटकी लगाए देखना, साइकिल पर थैला लगाए डाकिया अंकल का इंतजार - फोटो : pixabay

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उम्मीद है कि आप खुश होंगे! प्रेम में महक कर मुश्क होंगे। वैसे यहां सब कुशल है। बस आपकी दुआओं का फल है। जी हां, कुछ ऐसी ही पंक्तियों के साथ चिट्ठी लिखने का श्रीगणेश होता था। वह दौर जब चिट्ठियां लोगों की भावनाओं से जुड़ी हुईं थीं, बातचीत का जरिया सिर्फ चिट्ठियां हुआ करती थीं। याद है मां का दरवाजे पर टकटकी लगाए देखना, साइकिल पर थैला लगाए डाकिया अंकल का इंतजार, वो कत्थई थैले में सैकड़ों के ढेर में किसी अपने का अहसास।
सीमा पर देश की रक्षा कर रहे जवानों के लिए जीने का जरिया। ये चिट्ठी बड़ी कमाल की चीज है। पैगाम अपनों का, अहसास अपनों का। अपनों के दिल का हाल बताने वाली चिट्ठी। वह चिट्ठी जिसे पढ़कर चेहरे पर मुस्कान आ जाए। वह चिट्ठी जो दूर बैठे अपनों का अहसास दिलाती है। वह चिट्ठी जो जरिया बनी दिलों को जोड़ने का। आज का ये दौर जब कागजों के ढेर में भी उस भावना, उस अहसास को ढूंढ़ नहीं पाता। अगर आपसे पूछा जाए कि आखिरी बार आपको चिट्ठी कब मिली थी? मामा, चाचा या बुआ, दीदी या दूर के रिश्तेदारों की आखिरी चिट्ठी कब आई थी? तो यकीकन आप कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाएंगे ! और पूछेंगे कि आज के जमाने में चिट्ठी लिखता कौन है? 
 
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