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भारत के नक्शे को लेकर नेपाल की आपत्ति को उसके चीन से रिश्तों के संदर्भ में देखने की जरूरत

K S Tomarकेएस तोमर Updated Thu, 21 Nov 2019 07:27 AM IST
केएस तोमर, वरिष्ठ पत्रकार
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प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने के बावजूद नेपाली प्रधानमंत्री द्वारा कालापानी को लेकर छेड़े गए नए विवाद तथा श्रीलंका में चीन समर्थक नंदसेना गोतबाया राजपक्षे राष्ट्रपति चुने जाने से इस क्षेत्र में भारत के अलग-थलग पड़ने की आशंका है, जिसका असर देश के लोगों के हितों पर पड़ सकता है। विदेशी विश्लेषक गोतबाया के निर्वाचन को भारतीय विदेश नीति के लिए धक्का बता रहे हैं, क्योंकि भारतीय सरकार ने 2015 के चुनाव में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के बड़े भाई महिंदा राजपक्षे की हार सुनिश्चित करने के लिए एक गोपनीय अभियान की मदद की थी। यह अब श्रीलंका की भारत की भावी विदेश नीति के लिहाज से नकारात्मक हो सकता है। इसी तरह से नेपाल भी चीन से मिल रही गोपनीय मदद के चलते अपनी बांहे फड़का रहा है।
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नेपाली प्रधानमंत्री के पी ओली ने कालापानी क्षेत्र को नेपाल में बताकर कहा है कि भारत को इस क्षेत्र से तुरंत अपनी सेना हटा लेनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित क्षेत्रों बांटने के बाद भारत ने दो नवंबर को अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया है, जिसमें कालापानी को शामिल किया गया है। ओली की कम्युनिस्ट सरकार का झुकाव चीन की ओर है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले महीने नेपाल यात्रा के दौरान पूरी उदारता से ढांचागत विकास के लिए 3,430 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद को मंजूरी दी थी, जिससे उनके द्विपक्षीय संबंध को तो मजबूती मिलेगी ही, इससे भारत विरोधी भावनाओं को भी हवा मिलेगी।

चीनी राष्ट्रपति ने लंबी अवधि की योजना के आधार पर हमारे पड़ोसी नेपाल को धीरे-धीरे अलग करने की नींव रखी है, इसे हमारी विदेश नीति के थिंक टैंक को खतरनाक संकेतक की तरह लेना चाहिए। विदेशी नीति के विशेषज्ञ नेपाल की विदेश नीति में चीन की ओर झुकाव के साथ आमूलचूल बदलाव से इनकार नहीं करते हैं, जो मुख्य रूप से भूमि से घिरे देश में शासन कर रहे कम्युनिस्टों के भारत विरोधी रवैये से निर्देशित होगा। खासतौर से इसलिए भी क्योंकि नेपाल के शासक खुद को वैचारिक रूप से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के करीब पाते हैं।

जिनपिंग की यात्रा के दौरान नेपाली मीडिया उनके देश की चीन समर्थक भावनाओं से अटे पड़े थे, जैसा कि पिछले कई दशकों से देखा जा रहा है। नेपाली अखबारों ने जिनपिंग के हवाले से एक चीनी कहावत का जिक्र किया, 'ज्वाला तभी तेज होती है, जब उसमें हर कोई लकड़ी डालता है। अब इसमें सहयोग करने की नेपाल की बारी है।' नेपाली राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने जोर कहा कि हम वन चीन पॉलिसी पर यकीन करते हैं और हमारी जमीन से किसी को चीन विरोधी गतिविधि चलाने की इजाजत नहीं देंगे।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल, प्रचंड ने कहा कि जिनपिंग की नेपाल यात्रा दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों में एक निर्णायक क्षण है और इसने भारत को शामिल करते हुए त्रिकोणीय साझेदारी की नींव रखी है। दशकों पुरानी विदेश नीति पर निगाह डालने से पता चलता है कि पहले कांग्रेस की क्रमिक सरकारों और अब एनडीए की सरकार के समय भारत के पास नेपाल से निपटने के लिए कोई व्यावहारिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण नहीं रहा है। नेपाल में हमेशा भारत के बड़े भाई वाले रवैया का विरोध रहा है और इसी से वहां भारत विरोधी भावनाएं पनपी हैं।

विरोधाभासी तरीके से नेपाल में जब जब नेपाली कांग्रेस की सत्ता रही उसका भारत के साथ रिश्ता सहज रहा और बिहार की सीमा से सटे तराई के लोग खुद को सांस्कृतिक और पारंपरिक रूप से भारतीयों के करीब पाते हैं, जबकि पूर्व राणा शासकों के समय रिश्ता सहज नहीं था। इस परिदृश्य में भारतीय सैन्य बलों में कार्यरत लाखों गोरखा और पूर्व सैनिक दोनों देशों के बीच मजबूत पुल की तरह काम किया है।

कूटनीतिक विशेषज्ञों की राय है कि चीन तीन कारणों से दक्षिण एशिया में भारत के छोटे पड़ोसियों को लुभाने की कोशिश रहा है। पहला, कुछ सामरिक कारणों से महत्वपूर्ण है। नेपाल की सीमाएं चीन के तिब्बत स्वशासी क्षेत्र को छूती है। तिब्बत अपेक्षाकृत शांत है, लेकिन चीन को हमेशा यह आशंका रहती है कि तिब्बती राष्ट्रवाद कभी भी जोर मार सकता है। दूसरा, नेपाल इस क्षेत्र में भारत के साथ संतुलन स्थापित करने का मौका देता है। नेपाल के भारत के साथ उतार-चढ़ाव भरे रिश्ते हैं, जिससे काठमांडू को बीजिंग एक साझेदार के रूप में देखता है।

इसमें कुछ भी अजीब नहीं है, क्योंकि इसी वजह से बीजिंग भारत के सारे छोटे पड़ोसियों तक पहुंचना चाहता है। और बदले में भारत भी चीन के छोटे सहयोगी वियतनाम के साथ साझेदारी के लिए प्रयासरत है। तीसरा, बेल्ट और रोड परियोजना के कारण चीन के हित नेपाल से जुड़े हुए हैं, जहां उसने श्रम और पूंजी का निर्यात किया है। चीन नेपाल के साथ कई परियोजनाओं पर बात कर रहा है, जिनमें ल्हासा और काठमांडू को जोड़ने वाली रेल लाइन, संसद भवन का निर्माण और एक नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी की स्थापना शामिल हैं। चीन के साथ साझेदारी बढ़ाने में नेपाल के अपने हित हैं।

पहला, इससे भारत नेपाली हितों की ओर कहीं अधिक ध्यान देगा। विश्लेषकों का कहना है कि भारत द्वारा की गई 2015 की नाकाबंदी ने नेपाल में आम लोगों के बीच भारत विरोधी भावनाओं को प्रबल कर दिया है, जो हमारे देश पर नमक, पेट्रोलियम जैसी आवश्यक वस्तुओं, शैक्षिक संस्थानों में शिक्षा प्रदान करने आदि के लिए निर्भर है। चीन के राष्ट्रपति ने जो बीज बोए हैं, वह भविष्य में बढ़कर भारत के लिए सुरक्षा संबंधी बड़ी चिंता पैदा कर सकता है। इसलिए भारत की विदेश नीति में बदलाव करते हुए लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने और नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं को कम करने की जरूरत है।
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