सुस्ती के बीच बड़ा विनिवेश लक्ष्य, फिर आगे बढ़ा दस साल से रुका निजीकरण कार्यक्रम

Jayantilal Bhandariजयंतीलाल भंडारी Updated Tue, 26 Nov 2019 07:07 AM IST
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बढ़ती हुई आर्थिक सुस्ती को रोकने और राजकोषीय घाटे की चुनौती के मद्देनजर केंद्र सरकार ने विनिवेश यानी निजीकरण का अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल), कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (कॉनकॉर), टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड (टीएचडीसीआईएल), शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई) और नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (नीपको) में अपनी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है। सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय भी बहुत महत्वपूर्ण है कि अब वह चुनिंदा सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम करेगी। हालांकि उसके इस फैसले की आलोचना भी हो रही है। सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष में 1.05 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य रखा है। हालांकि विगत अक्तूबर तक विनिवेश के तहत उसे महज 17,400 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं। लेकिन यह उम्मीद करनी चाहिए कि पांच बड़े सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश कर वह अपने महत्वाकांक्षी विनिवेश लक्ष्य पूरे कर लेगी।
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वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीति लागू किए जाने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी घटाते हुए विनिवेश की शुरुआत की गई। इसकी वजह इन उपक्रमों का लंबे समय से घाटे में जाना रहा है। सरकार अपने दम पर इन उपक्रमों पर किया जाने वाला खर्च वहन नहीं कर सकती। इससे बजट घाटा बढ़ता है, जिसका सीधा बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली एनडीए सरकार ने रणनीतिक विनिवेश के तहत कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का मालिकाना हक निजी कंपनियों को दे दिया था। लेकिन उसके बाद आई यूपीए सरकार रणनीतिक विनिवेश कार्यक्रम को अधिक आगे नहीं बढ़ा सकी। मोदी सरकार ने दस साल से रुके हुए विनिवेश कार्यक्रम को फिर से आगे बढ़ाया है।
विनिवेश के जरिये सरकार घाटे वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी कम करना चाहती है,  ताकि उन उपक्रमों का घाटा कम कर उन्हें फायदे में लाया जा सके। मौजूदा विनिवेश नीति के अनुसार सरकार इस फंड की रकम से लगभग 75 फीसदी का इस्तेमाल सामाजिक क्षेत्र और विकास के कामों में करती है। लेकिन विनिवेश की प्रक्रिया के तहत सरकार 51 फीसदी हिस्सेदारी अपने पास ही रखती है। मौजूदा आर्थिक सुस्ती ने जिस तरह देश का राजस्व गणित बिगाड़ा है, उसके कारण सरकार ने विनिवेश का अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया है। इस समय राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ रहा है। इस कारण भी विनिवेश महत्वपूर्ण हो गया है।
दरअसल सरकार ने इस वित्त वर्ष में कर संग्रह का लक्ष्य 24.6 लाख करोड़ रुपये रखा है, लेकिन उसमें दो लाख करोड़ रुपये की कमी की आशंका है। ऐसे में, विनिवेश के बड़े कदम से सरकार को पर्याप्त मात्रा में कर्जमुक्त पूंजी उपलब्ध हो सकेगी। इससे राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 फीसदी तक सीमित रखा जा सकेगा। ऐसा होने पर वित्तीय स्थिरता दिखाई देगी, आर्थिक सुस्ती नियंत्रित होगी, अर्थव्यवस्था की विकास दर बढ़ेगी, देश में विदेशी निवेश में वृद्धि होगी तथा रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। आगामी 31 मार्च तक विनिवेश के 1.05 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार को विनिवेश लक्ष्य और बेहतर मूल्य हासिल करने के बीच उपयुक्त संतुलन बनाना होगा।
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