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असम पर टिकी है भाजपा की उम्मीद

subir bhowmikसुबीर भौमिक Updated Fri, 18 Apr 2014 07:31 PM IST
BJP hopes in assam now
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नरेंद्र मोदी बेशक विकास पुरुष्ा की अपनी छवि पेश कर रहे हैं, मगर असम में उन्होंने हिंदुत्व कार्ड खेला है। राज्य में अपनी चुनावी रैलियों के दौरान बांग्लादेश के मुद्दे पर बोलते वक्त उन्होंने धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की भाजपा की पुरानी नीति को मजबूती से दोहराया। यह मोदी की मजबूरी भी है, क्योंकि असम में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर कर पाने का उनके पास यही तरीका है। बीती सदी के आठवें दशक की शुरुआत में असम में विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन प्रारंभ हुआ, और तभी से बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थी, बल्कि घुसपैठिये, असम की विभिन्न जनजातियों के निशाने पर हैं। असम की रैलियों में मोदी ने बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिमों को तो निशाना बनाया, पर हिंदू शरणार्थियों के प्रति रहमदिली की जरूरत बताई।
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भाजपा की रणनीति के लिहाज से यह ठीक है, पर उसकी पूर्व सहयोगी असम गण परिषद इससे नाराज है। इस बार भाजपा का न अगप से गठबंधन हो पाया, न ही आसू (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) से। आसू के सलाहकार समुज्ज्वल भट्टाचार्जी कहते हैं, हम ऐसे किसी शख्स को स्वीकार नहीं कर सकते, जो अवैध शरणार्थियों की समस्या को मजहब के चश्मे से देखता हो।

असम की राजनीति के बजाय वहां की जनसांख्यिकी को वरीयता देने के कारण ही मोदी वह कह पाए, जिससे वह देश के दूसरे हिस्से में बचते आए थे। स्थानीय विश्लेषक उत्तम साहा कहते हैं, मोदी असमियों, बंगालियों और जनजातीयों के वोट बटोरना चाह रहे हैं, क्योंकि यही वह तरीका है, जिससे असम में मुस्लिम वोट बैंक से निपटा जा सकता है। दूसरे विश्लेषक अनिर्बान राय कहते हैं, भाजपा हिंदुत्व कार्ड खेल रही है, ताकि स्थानीय हिंदू क्षेत्रीय दलों के बजाय उसे वोट करें।

दूसरी ओर, कांग्रेस कुप्रशासन और अंदरूनी मतभेदों की वजह से पैदा हुई सत्ता विरोधी लहर से परेशान्ा है। 2006 में असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बनने वाले 'ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट' का लगातार मजबूत होना भी उसकी चिंता बढ़ा रहा है। 2011 में इसने न केवल विधानसभा में सीटें बढ़ाईं, बल्कि भाजपा और अगप को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी दल के तौर पर भी उभरा है। पश्चिमी असम में 2012 की सांप्रदायिक हिंसा के बाद एयूडीएफ ने मुस्लिमों में भी पैठ बनाई है। इस कारण आगामी विधानसभा चुनाव में यह 25 से 30 सीटें जीतने की उम्मीद कर रहा है।

राय कहते हैं, लोकसभा चुनाव में फ्रंट भले दो-तीन सीटों पर सिमट जाए, पर कई सीटों पर यह कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगा। अगर भाजपा धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में सफल होती है, तो उसकी जीत पक्की हो सकती है। अगर राज्य का 35 फीसदी मुस्लिम वोट कांग्रेस और एयूडीएफ के बीच बंटता है, तो भाजपा के लिए जीत आसान हो जाएगी।

सिक्किम समेत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की कुल 25 लोकसभा सीटों में से 14 असम के पास हैं। मणिपुर, मेघालय और मिजोरम में कांग्रेस को अपनी सीटें बचा लेने की उम्मीद है, जबकि त्रिपुरा की दो सीटों पर माकपा का कब्जा तय है। ऐसे में, भाजपा की सारी उम्मीदें असम पर टिकी हैं। पिछले चुनाव में असम की 14 सीटों में से सात कांग्रेस ने और चार भाजपा ने जीती थीं।

मोदी के रुख पर पड़ोस की अवामी लीग के नेतृत्व वाली बांग्लादेश की सरकार चिंतित है। उसके एक नेता की अनौपचारिक टिप्पणी है, जब हम अपने यहां मुस्लिम कट्टरपंथियों पर नियंत्रण रखने की कोशिश कर रहे हैं, तो मोदी सीमा पर धार्मिक भावनाएं क्यों उछाल रहे हैं? अवामी लीग चिंतित इसलिए भी है, क्योंकि पिछली राजग सरकार ने उसके बजाय बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को तरजीह दी थी।
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