अमानवीय ताकतों से पार पाने और उनको हराने के पराक्रम और संयम का उत्सव है विजयादशमी

प्रयाग शुक्ल Updated Tue, 08 Oct 2019 07:04 AM IST
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विजयादशमी सदियों से विनाशकारी शक्तियों के विनाश की सूचक रही हैं, और आज भी उसका मूल रूप वही है। उसी रूप में मनाई जाती है विजयादशमी-रावण का पुतला जलाकर। पर इस प्रतीक रूप से आगे, उसके कुछ और गहरे अर्थ हैं।
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वह मुक्ति का संदेश भी देती है-ऐसी ताकतों से मुक्ति का संदेश, जो मानवीय मूल्यों की धज्जियां उड़ाने से नहीं हिचकिचातीं। तो एक ओर विजयादशमी जहां बुराई की ताकतों के दमन का उत्सव मनाती है, वहीं यह आग्रह भी रखती है कि उन्हें पनपने न दिया जाए। यह मानो एक संकल्प दिवस भी है-अमानवीय ताकतों से पार पाने का, उनसे संघर्ष करने का, आतंकी शक्तियों को हराने का। हम जानते हैं कि विजयादशमी का त्योहार अपने साथ और भी बहुत कुछ लेकर आता है।
दुर्गा पूजा की ऋतु भी यही है। रामलीलाएं होती ही हैं। और इन सबसे एक ऐसा सामाजिक-सांस्कृतिक फलक बनता है, जो जीवन में उजास भरने का यत्न करता है। और इसमें भला क्या संदेह कि इससे जुड़े मेले-ठेले हमारे यहां एक भाईचारे के रूप में संपन्न होते रहे हैं। उत्सव अपने-आप में सद्भाव के प्रेरक हो जाते हैं। आज जब हम विजयादशमी का त्योहार मना रहे हैं, तो यह बात सहज ही ध्यान में आती है कि मानवीय मूल्यों की रक्षा जिस रूप में होनी चाहिए, वह हो नहीं पाई है।
उस दिशा में करने को बहुत कुछ शेष है। स्त्रियों की सुरक्षा के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। हम अब भी मिलावटी चीजों से जूझ रहे हैं, मिलावटी मिठाइयों से लेकर मिलावटी सीमेंट तक की खबरें आती हैं। 'रोड रेज' की घटनाएं होती ही हैं। रिश्वतखोरी बिल्कुल समाप्त हो चुकी है-ऐसा दावा नहीं किया जा सकता है। कई तरह की सामाजिक विषमताएं अब भी मौजूद हैं। और ऐसी हृदय विदारक घटनाएं हो रही हैं, जहां किसी मामूली शक-शुबहे में लोगों को तरह-तरह से दंडित-प्रताड़ित किया जाता है।
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