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हताश दीदी का गुस्सा

subir bhowmikसुबीर भौमिक Updated Fri, 09 Dec 2016 07:33 PM IST
सुबीर भौमिक
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अचानक नोटबंदी के फैसले को लेकर बिफरी हुई हैं! यह पहली बार नहीं है कि उन्होंने नरेंद्र मोदी पर इतने तीखे प्रहार किए हैं। 2014 के चुनाव से पहले जब मोदी ने अवैध बांग्लादेशियों के निष्काषन का वायदा किया था, तो ममता बनर्जी ने धमकी दी थी कि लोगों को 'सांप्रदायिक रूप से भड़काने' के आरोप में वह उन्हें जेल भिजवा देंगी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि 'अगर एक भी वास्तविक भारतीय मोदी की इस बांग्लादेशी विरोधी मुहिम से प्रभावित होता है, वह उन्हें नहीं बख्शेंगी।'
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इसलिए यह समझने में किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि पश्चिम बंगाल में वाम दल और कांग्रेस के घटते प्रभाव के बाद ममता बनर्जी भाजपा को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मान रही हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि वोट शेयर के मामले में भाजपा वहां दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है, बल्कि राज्य में उसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। हाल के उप-चुनाव के दौरान उत्तरी बंगाल के कूचबिहार में भाजपा 28 फीसदी वोट हासिल करके तृणमूल के बाद दूसरे स्थान पर रही।

भाजपा बंगाली हिंदुओं, खासकर बांग्लादेश के शरणार्थियों, जो धार्मिक उत्पीड़न की शिकायत करते हैं, को लुभाने के लिए ममता के 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' की नीति का इस्तेमाल करती है। राजनीतिक विश्लेषक जयंत राय कहते हैं कि इन पूर्वी बंगालियों की आबादी पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों का एक बड़ा हिस्सा है और लगता है कि बांग्लादेश से आने वाले हिंदुओं को रिफ्यूजी स्टेटस और नागरिकता का वायदा करके मोदी ने उनका दिल जीत लिया है। यह ममता के अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति पर कड़ा प्रहार है।

ममता की चिंता तबसे और बढ़ गई है, जब असम में भाजपा हिंदू मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने में सफल रही। राज्य भाजपा ईकाई के पूर्व अध्यक्ष और अब त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय कहते हैं कि 'बंगाली हिंदुओं की पूरी पीढ़ी उन्हें पुनर्वास देने में कांग्रेस की विफलता के खिलाफ वाम दलों की तरफ मुड़ गई थी। तीस वर्षों से ज्यादा समय तक राज्य में शासन करने के बाद जब वाम दलों का प्रभाव घटा, तो वह भाजपा ही है, जो शरणार्थियों को आकर्षित कर रही है और इसी कारण ममता परेशान है, क्योंकि इससे उसका समीकरण गड़बड़ा रहा है और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण उन पर भारी पड़ सकता है।'

अन्य विश्लेषकों का कहना है कि ममता एक चतुर राजनीतिक मस्तिष्क वाली महिला हैं, इसलिए वह भाजपा के खतरे और जिस तरह से मोदी व उनके समर्थक उनके खिलाफ आतंकवाद का कार्ड खेल रहे हैं, उससे वाकिफ हैं। बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार के साथ करीबी रिश्ता बनाकर, ममता पर सीमापार आतंकी संगठनों से निपटने का भारी दबाव बनाकर, जिनमें से अनेक को ममता के करीबी मुस्लिम नेताओं से समर्थन और शरण मिल रही है तथा बंगाल के जरिये पाकिस्तान में बने जाली नोट भारत में आने का मुद्दा उठाकर भाजपा ममता बनर्जी को घेरने की कोशिश कर रही है।

एक स्थानीय संपादक आशीष विश्वास का कहना है कि इन सब मोर्चों पर ममता पर भारी दबाव है और उन्हें लगता है कि लोगों को रोजगार खोने का भारी भय दिखाकर तथा नोटबंदी से हो रही असुविधा के मुद्दे को उठाकर वह भाजपा पर पलटवार कर सकती हैं। ममता चतुर राजनीतिज्ञ हैं और वह यह भी महसूस करती हैं कि विपक्षी दलों को जोड़कर अपने नेतृत्व में संघीय मोर्चा या तीसरा मोर्चा बनाने के उनके लंबे समय से पोषित सपने को साकार करने का यही क्षण है।

ममता के इस इस सपने में असली समस्या वाम दल थे, जो किसी भी गैर-भाजपा, गैर कांग्रेस गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन ममता के लिए समस्या थे। विश्वास कहते हैं कि बंगाल में वाम दलों को नष्ट कर दिया गया है और ममता को उन्हें उस गठबंधन का हिस्सा बनाने में कोई समस्या नहीं है। इसलिए उन्होंने नोटबंदी के खिलाफ लड़ने के लिए वामदलों को प्रस्ताव दिया, तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

ममता किसी विचारधार से कम से कम बंधी हुई हैं, वह एक ठेठ क्षेत्रीय राजनीतिज्ञ हैं, जो हमेशा चतुराई से काम लेती हैं। केजरीवाल को कांग्रेस या शिवसेना के साथ समस्या हो सकती है, लेकिन ममता को किसी के साथ होने में कोई समस्या नहीं है। वह राजग और संप्रग, दोनों गठबंधनों का हिस्सा रही हैं और अब अगर कोई नया भाजपा विरोधी मोर्चा उनके लिए फायदेमंद होगा, तो वह उसकी कोशिश कर सकती हैं।

दूसरे लोगों का कहना है कि ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां, जिन्होंने अपने नकद को छिपाया होगा, तो उनमें तृणमूल कांग्रेस शीर्ष सूची मे होगी। राजस्व खुफिया अधिकारियों का कहना है कि सबसे ज्यादा जन-धन खाते में पैसा पश्चिम बंगाल में ही जमा हुआ है, 21 हजार करोड़ रुपये का लगभग एक तिहाई। इन खातों से निकासी बंद करने के मोदी के फैसले से उन तमाम लोगों को निराशा हुई है, जिन्होंने बेहिसाब धन जमा किया। चुनाव लड़ने के लिए रखे गए पार्टी फंड के एक ही झटके में खोने की वजह से ही ममता ने मोदी के खिलाफ इतने कटु भाषा का इस्तेमाल किया कि उनका एकमात्र इरादा मोदी को सत्ता से हटाना है।

विमान लैंडिंग में देरी को 'हत्या की साजिश' या सेना की नियमित वार्षिक आपदा प्रबंधन अभ्यास को 'तख्तापलट का खतरा' बताना मोदी के खिलाफ लड़ाई में उनके किसी भी हद तक उतरने की मंशा को बताता है। और इन सबसे भारत-बांग्लादेश के रिश्ते खराब होने वाले हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे पर विश्वसनीय सहयोगी हैं। वह अगले महीने की अपनी प्रस्तावित दिल्ली यात्रा के दौरान तीस्ता जल बंटवारे के मुद्दे पर सकारात्मक पहल की उम्मीद कर रही हैं। लेकिन अब मोदी के साथ ममता के रिश्ते खराब हैं। वह बांग्लादेश के साथ बेहतर रिश्ते बनाने के उत्सुक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उपकृत नहीं करेंगी। स्पष्ट है कि यह भारत की क्षेत्रीय कूटनीति पर नोटबंदी का प्रतिकूल प्रभाव होगा, खासकर तब, जब हम बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे सहयोगियों को परेशान नहीं कर सकते।
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