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केंद्र में बेहतर जगह तलाशतीं ममता

subir bhowmikसुबीर भौमिक Updated Thu, 10 Apr 2014 07:27 PM IST
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ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर को नजदीक से देखने वालों के लिए न तो उनके तौर-तरीके नए हैं, और न ही उनका लोकप्रिय उत्साही व्यवहार या एकाएक फैसले लेकर विराधियों और समर्थकों को हतप्रभ करने की आदत। हालांकि उनकी तुलना उस 'मतवाले बंगाली' किरदार से बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, जिसे दिवंगत अभिनेता उत्पल दत्त ने शानदार ढंग से मृणाल सेन की यादगार फिल्म भुवन शोम में जिया था।
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हाई कमान के फैसलों को चुनौती देने में बंगाल कांग्रेस का इतिहास रहा है। सुभाष चंद्र बोस, बिधान चंद्र रॉय, अजोय मुखर्जी और यहां तक कि प्रणब मुखर्जी जैसे नेताओं की अपने-अपने समय पर पार्टी नेतृत्व के साथ कहासुनी हुई है। यही वजह थी कि इनमें से बिधान चंद्र रॉय के अलावे बाकी सारे दिग्गज नेताओं ने कांग्रेस को छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाई। हालांकि केवल प्रणब मुखर्जी ने फिर से कांग्रेस में वापसी कर ली। आज उनकी जगह को देखते हुए, यह समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि उन्होंने उस वक्त कितना सही फैसला लिया था। कम शब्दों में कहें, तो कांग्रेस को छोड़ने वाले इन तमाम नेताओं में से किसी की भी पार्टी अपना मुकाम हासिल नहीं कर  पाई। मगर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस मामले में अपवाद है।

ममता ने क्रांति का मार्ग अपनाते हुए गुस्से में पार्टी को छोड़ने का फैसला किया। लेकिन जल्दी ही अपना अस्तित्व बचाने के लिए केंद्रीय सत्ता पर नियंत्रण रखने वाले किसी ताकतवर राष्ट्रीय दल से गठबंधन करने की जरूरत उन्हें समझ में आ गई। इसके बिना वह कैडर वाली  माकपा के जमे-जमाये गढ़ को चुनौती नहीं दे सकती थीं। लिहाजा उन्होंने भाजपा का रुख किया, ताकि वह दिल्ली का सहारा लेकर लेफ्ट पर निशाना साध सकें। मगर 2002 के गुजरात दंगों से पहले ही जब भाजपा की राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द सिमटने लगी, तो पश्चिम बंगाल में लेफ्ट को मात देने के लिए राज्य की जनसंख्या में एक-चौथाई से भी ज्यादा हिस्सा रखने वाले मुस्लिमों का भरोसा जीतना ममता के लिए चुनौती बनने लगा। आखिरकार उन्होंने एनडीए का साथ्ा छोड़ने का फैसला किया।

लेकिन तब तक ममता सत्ता की सीढ़ी पर कुछ पायदान ऊपर चढ़ चुकी थीं। वह संदेश दे चुकी थीं कि मामला बराबरी का है। अगर दिल्ली में वह कांग्रेस की जूनियर हैं, तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल के सहयोगी की भूमिका में कांग्रेस होगी। हालांकि कांग्रेस का साथ छोड़ने का समय भी जल्द ही आ गया। मगर इस बार भी उन्होंने अपने लोगों से जुड़े होने की छवि का संदेश देने में चूक नहीं की। दरअसल लोकप्रिय फैसले लेना, उनकी विचारधारा नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी है।

आज की बात करें, तो ज्यादातर ओपिनियन पोल मानते हैं कि  लोकसभा चुनाव के बाद उनकी पार्टी चौथे सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह के तौर पर उभर सकती है। इससे उनमें क्षेत्रीय दलों के गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई फ्रंट पर काम करने का आत्मविश्वास आया है। माकपा महासचिव प्रकाश करात पहले ही छोटे क्षेत्रीय और पिछड़े समूहों के दलों से तीसरे मोर्चे की बातचीत शुरू कर चुके हैं। इसलिए ममता के सामने न केवल माकपा, कांग्रेस और भाजपा को पश्चिम बंगाल में कमतर करने की चुनौती है, बल्कि उन्हें तीसरे मोर्चे की राजनीति से करात और येचुरी को भी बाहर करना है।

दरअसल ममता बनर्जी जैसी नेत्री के लिए, जिनके पास न तो राष्ट्रीय दल की ताकत है, और न ही सर्वस्वीकार्यता रखने वाली शख्सियत, राजनीतिक बिसात पर टिकने के लिए चुनावी चौसर पर पैनी चालें चलना बेहद जरूरी है। खासकर तब, जबकि वह राष्ट्रीय राजनीति में बेहतर भूमिका की तलाश में हैं।
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