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इस दश्त में इक शहर था...

शंकर अय्यर Updated Wed, 04 Dec 2019 08:07 AM IST
भारतीय मुद्रा
भारतीय मुद्रा - फोटो : a
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यह बहुत पहले की बात नहीं है, जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था था। लेकिन अब नहीं है। जुलाई और सितंबर के बीच जीडीपी की वृद्धि दर छह साल के निचले स्तर 4.5 फीसदी पर पहुंच गई, यहां तक कि अप्रैल और जून के बीच पांच फीसदी की दर से भी नीचे। ऐसे में स्वाभाविक है कि भारत के लोग शायर की तरह आश्चर्यचकित होकर कहें-'इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ...।'
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अच्छी खबर यह है कि अगली तिमाही यानी चौथी तिमाही में जीडीपी की विकास दर थोड़ी ऊंची रह सकती है। लोकप्रिय सिद्धांत है कि पिछले वर्ष के निचले आधार को देखते हुए विकास सांख्यिकीय रूप से अधिक हो सकता है-जैसे छह फीट दो इंच के कद वाले अमिताभ बच्चने के बगल में खड़े होने के बाद पांच फीट छह इंच के आमिर खान के बगल में खड़े होने पर महसूस होता है। बुरी खबर यह है कि मंदी जल्दी दूर होने वाली नहीं है। तो यह मंदी कितनी गहरी है? जीडीपी को नॉमिनल और वास्तविक अर्थों में मापा जाता है-नॉमिनल रूप में जीडीपी मूलतः बाजार मूल्य पर आधारित होता है, जिसमें मुद्रास्फीति समाहित होती है और वास्तविक जीडीपी मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद प्राप्त होता है। वर्ष 2018–19 की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर सात फीसदी थी, जिसमें मुद्रास्फीति समाहित थी। 2019–20 की दूसरी तिमाही में विकास दर मुद्रास्फीति समेत छह फीसदी है। स्पष्टीकरण यह है कि कम नॉमिनल वृद्धि दर मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने का नतीजा है, जैसे कि कम मुद्रास्फीति के लिए भुगतान की जाने वाली कीमत कम वृद्धि है। चीन ने भी मुद्रास्फीति को कम किया है, फिर भी बेहतर वास्तविक विकास दर दर्ज की है। भले ही चीन में मंदी की बात सुर्खियों में है,  पर दूसरी तिमाही में चीन की वास्तविक वृद्धि दर मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद 6.2 फीसदी थी और तीसरी तिमाही में छह फीसदी है।

शुक्रवार को सरकार ने दो तरह के आंकड़े जारी किए-दूसरी तिमाही के जीडीपी के आंकड़े और कोर सेक्टर की विकास दर। सकल मूल्यवर्धन के संदर्भ में कृषि क्षेत्र की विकास दर नीचे है, खनन की विकास दर मुश्किल से सकारात्मक है और मैन्यूफैक्चरिंग की विकास दर ऋणात्मक है। यानी जीडीपी चार्ट से तस्वीर अलग नहीं है। कोर सेक्टर से जो बुरी खबरें आई हैं, वे आठ महत्वपूर्ण बुनियादी क्षेत्रों का योग हैं। उर्वरक और रिफाइनरी उत्पादों को छोड़कर हर क्षेत्र में उत्पादन घटा है और कोर सेक्टर में 5.8 फीसदी की कमी आई है। और यह उत्पादन घटने का लगातार दूसरा महीना है।

मांग और खपत में कमी को देखते हुए ज्यादा सरकारी प्रोत्साहन की मांग हो रही है। सवाल यह है कि सरकारी खर्च का भुगतान कौन करेगा। वर्ष 2009-10 और 2018-19 के बीच केंद्र और राज्यों द्वारा लिया गया सकल कर्ज 6.2 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 12.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है और केंद्र एवं राज्यों के कर संग्रह 9.8 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 34.9 लाख करोड़ रुपये हो गए। सरकारी खर्च मुफ्त में नहीं होता है-इसके लिए या तो सरकार को लोगों पर कर लगाने की जरूरत होगी या कर्ज लेना होगा, जिसके ब्याज का भुगतान भी करदाताओं को ही करना होगा। आर्थिक विकास का सिद्धांत इस कहावत से बना है कि जितना गुड़ डालेंगे, उतना मीठा होगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। 31 अक्तूबर तक सरकार ने पूरे वर्ष के लिए आवंटित 27.86 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 16.54 लाख करोड़ रुपये खर्च कर लिए थे। खर्च राजस्व पर निर्भर करता है। अक्तूबर के अंत तक राजस्व संग्रह 9.07 लाख करोड़ रुपये था और वर्ष भर का लक्ष्य 19.62 लाख करोड़ रुपये है। याद रखिए कि यह लक्ष्य 12 फीसदी की नॉमिनल विकास दर पर आधारित है, जबकि वर्ष की पहली छमाही में नॉमिनल वृद्धि दर मुश्किल से सात फीसदी रही है।

क्या नॉमिनल विकास दर उच्च राजस्व प्रदान कर सकती है? क्या खर्च और राजस्व बराबर हो जाएगा? अतीत के तथ्य तो भरोसा नहीं जगाते। वर्ष 2018–19 में सरकार ने 24.42 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का वादा किया था, पर 21.41 लाख करोड़ रुपये ही खर्च किए, क्योंकि राजस्व संग्रह 17.25 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से घटकर 14.30 लाख करोड़ रुपये ही रह गया। ध्यान रहे कि वर्ष 2018-19 में विकास दर अब से बेहतर थी। भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. (बीपीसीएल) के विनिवेश और निजीकरण के रूप में उम्मीद का गुब्बारा हवा में छोड़ा गया है कि इससे सरकार को अप्रत्याशित आमदनी होगी और एयर इंडिया की बिक्री से लागत में बचत होगी। हम जानते हैं कि एयर इंडिया की बिक्री नियत प्रक्रिया पर निर्भर है। अभी सरकार को इसका मूल्यांकन करना बाकी है कि वह क्या बेचने की योजना बना रही है। बीपीसीएल की बिक्री के लिए घोषणा, जरूरी परिश्रम, बोली लगाने वालों की तलाश और वैश्विक नीलामी की जरूरत होगी और इस बात की संभावना नहीं लगती कि यह सौदा इस वित्तीय वर्ष में होगा। 'खर्च करने पर विकास' की परिकल्पना के समर्थकों का तर्क है कि राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.4 से 3.8 हो जाए या यहां तक कि चार फीसदी हो जाए, तब भी विकास दर बढ़ेगी। तथ्य यह है कि सरकार ने अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग किया था, भले ही यह बजट में परिलक्षित नहीं हो। इसने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निगमों के लेखा खर्च को अपने खाते से कंपनी के खाते में डाल दिया, उदाहरण के लिए, 1.9 लाख करोड़ की खाद्य सब्सिडी एफसीआई पर बकाया है। राज्यों को जीएसटी मुआवजे जैसे भुगतान स्थगित कर दिए गए। कलाबाजी के बिना राजकोषीय घाटे की सीमा तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होगी। फिर भी विकास दर 4.5 फीसदी है।

सरकारी खर्च की प्रभावकारिता इस बात पर निर्भर करती है कि खर्च को कैसे वित्त पोषित किया जाता है-और ज्यादा कर लगाकर, कर्ज से या संपत्ति के मुद्रीकरण से और इसके लिए क्या खर्च किया जाता है। सरकार के लिए आदर्श स्थिति है कि वह अपनी संपत्ति का मौद्रीकरण करे और इसका एक बेहतर रास्ता तैयार करे कि धन का उपयोग कैसे किया जाएगा। इन मुद्दों के समाधान के लिए खर्च की रूपरेखा तैयार करना उपयोगी मंत्र होगा। कठोर वास्तविकता यह है कि जब तक उद्देश्यों के साथ खर्च की रूपरेखा तैयार नहीं की जाती, तब तक सरकारी खर्च प्रभावी नहीं होगा । 
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