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कानून की भावना का सही पालन कर पेश की जाए पारदर्शी न्याय व्यवस्था की मिसाल

virag guptaविराग गुप्ता Updated Mon, 18 Nov 2019 07:10 AM IST
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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भारतीय लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई सरकार जनता के लिए जवाबदेह होती है, इसीलिए संविधान में आम लोगों के मूल-अधिकारों को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया. सरकारों को उत्तरदायी बनाने के लिए समय-समय पर अनेक कानून बनाए गए, जिनमें आरटीआई या सूचना के अधिकार का कानून सबसे महत्वपूर्ण है। 14 साल पहले 2005 में बनाए गए इस कानून से जनता को सरकार के निर्णय की जानकारी मिलने का हक हासिल हुआ, जिससे पारदर्शिता बढ़ने के साथ भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगी। राष्ट्रहित में खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों की गोपनीय सूचनाओं को आरटीआई यानी सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। पर कानून में दी गई इस बारीक छूट का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग शुरू करने के खेल में सभी विभागों ने इस कानून को कुंद बना दिया। भारत  में अदालतों की खुली व्यवस्था बनी है, जिसमें जनता को सभी जानकारी मिलने का स्वाभाविक हक है।
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कायदे से न्यायाधीशों और शासक वर्ग को कानून की भावना का सही पालन करके जनता के सामने एक भली मिसाल पेश करनी चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय के तीन जजों की बड़ी बेंच ने 2010 में सर्वोच्च न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई के तहत सूचनाएं देने का आदेश दिया। उच्च न्यायालय के कानूनसम्मत फैसले पर अमल करने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय के महासचिव द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में ही अपील दायर करने से एक हितों के विरोधाभास का अजीब मामला देखने को मिला।

अनेक प्रधान न्यायाधीशों के दौर में यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। तीन साल पहले न्यायमूर्ति गोगोई ने इस मामले को संविधान पीठ के सम्मुख भेजा था, जिस पर प्रधान न्यायाधीश बनने के बाद उन्होंने ही सुनवाई की और फैसला देने में सात महीने का लंबा वक्त लग गया। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद देश में सभी उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय भी अब आरटीआई के दायरे में आ गए। संविधान पीठ के पांच जजों की पीठ में शामिल वरिष्ठ जज न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि सांविधानिक लोकतंत्र में जज कानून से ऊपर नहीं हो सकते और जजों के चयन और नियुक्ति का आधार परिभाषित होकर सार्वजनिक होना चाहिए।

पर दूसरे वरिष्ठ जज न्यायमूर्ति रमना ने कहा कि पारदर्शिता के नाम पर न्यायपालिका को बर्बाद नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार आरटीआई में सूचना देने से पहले उसे निजता और न्यायिक अनुशासन में अनेक पहलुओं पर परखने की जरूरत है। इसके पहले भी यह बात सामने आई थी कि जजों के बारे में नकारात्मक प्रचार और नियुक्ति के पहले विवाद पैदा करने के बढ़ते प्रचलन से अनेक अच्छे लोग जज बनने से बच रहे हैं। इसलिए इस फैसले का व्यापक सबब यह है कि निजी हितों और ब्लैकमेलिंग के लिए आरटीआई के दुरुपयोग को रोककर इसका इस्तेमाल व्यापक सार्वजनिक हित के लिए ही होना चाहिए।

साल 1997 में न्यायपालिका द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार, जजों को अपनी संपत्तियों की जानकारी प्रधान न्यायाधीश को देकर उसे सार्वजनिक तौर पर घोषित किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय में इस समय 35 जज हैं, जिनमें से आधे से कम ने अपनी संपत्तियों की सार्वजनिक घोषणा की है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार ही नेता और अधिकारी अपनी संपत्तियों की घोषणा करते हैं। ऐसे में जजों को पारदर्शिता से परहेज नहीं करना चाहिए।

संविधान पीठ द्वारा वर्ष 2015 में दिए गए अन्य फैसले के अनुसार जजों की नियुक्ति के लिए बनाई गई कॉलेजियम प्रणाली में अनेक खामियां हैं, जिन्हें पारदर्शी व्यवस्था से ही ठीक किया जा सकता है। पिछले पांच साल में अनेक जजों की नियुक्ति हुई, पर व्यवस्था को ठीक करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कदम उठाया जाना अभी बाकी है। जजों की नियुक्ति, सरकार से संवाद और पत्राचार तथा संपत्ति के मामलों में पारदर्शी तरीके से सूचनाएं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सार्वजनिक कर दी जाएं, तो फिर जनता को आरटीआई के हथियार के इस्तेमाल की जरूरत ही न पड़े।

लोकसभा और राज्यसभा के विशेषाधिकार होते हैं, इसके बावजूद दोनों सदनों की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण होता है। दूसरी और सर्वोच्च न्यायालय जनता के लिए खुली अदालत है, फिर भी अदालतों की कार्रवाई की न तो रिकॉर्डिंग होती है और न ही प्रसारण। गौरतलब है कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने रिटायरमेंट से पहले फैसले में कहा था कि अदालतों में महत्वपूर्ण मामलों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होना चाहिए। अभी तक उस फैसले पर अमल करने के बारे में कोई सुगबुगाहट नहीं है।

आरटीआई के अनेक प्रावधानों को कमजोर करने के आरोप के साथ इससे संबंधित लंबित मामलों की भारी संख्या की वजह से लोगों का अब इस कानून के परिपालन से भरोसा कम हो रहा है। विश्व के 80 देशों में आरटीआई की व्यवस्था है, परंतु पारदर्शी देशों की सूची में भारत 51वें स्थान पर है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद राजनीतिक दलों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

सरकार से अनेक सुविधाएं ऑफिस और टैक्स छूट हासिल करने के बावजूद राजनीतिक दल आरटीआई के दायरे मैं आने से क्यों और कैसे बच रहे हैं? वीआईपी कल्चर से इनकार करते हुए नेता लोग खुद को जनसेवक बताने के बावजूद पारदर्शिता से परहेज करने से लोगों का राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास कम हो रहा है। अदालतों के अनेक आदेशों के बावजूद आरटीआई के तहत जानकारी न देकर राजनीतिक दलों द्वारा कानून के शासन की अवहेलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ नहीं है।

राम मंदिर के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के सर्वसम्मत फैसले के बाद देश में खुशहाली का माहौल है। भगवान राम ने समाज में मर्यादा के अनेक प्रतिमान स्थापित करने के साथ, उत्तरदायी शासन व्यवस्था को बढाते हुए कहा था कि जौ अनीति कछु भाखौ भाई, तौ मोहि बरजेऊ भय बिसराई। आरटीआई पर सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद शासन और न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और जनकल्याण के एक नए युग की शुरुआत लोकतंत्र के लिए शुभकारी होगी।
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