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भारत को ‘बारोधान’ कहती थी उसकी दादी

कैलाश्ा बाजपेयी Updated Mon, 23 Dec 2013 01:52 PM IST
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बीती सदी में अपनी कई शामें सिगिरड काहले के पृथ्वीराज रोड स्थित आवास पर बीतती थी। सिगिरड भारत में जर्मनी के राजदूत डॉ. काहले की पत्नी थीं। उनकी रुचि भारतीय संस्कृति के अतीत और नए लिखे जाने वाले काव्य में इतनी गहरी थी कि दिल्ली में रहने वाले नए रचनाकारों को वे समय-समय पर अपने यहां आमंत्रित करती रहती थीं।
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श्री नीरद सी. चौधरी से अपनी मुलाकात उन्हीं के आवास पर हुई। एक शाम उन्हें जब यह ज्ञात हुआ कि सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम के अंतर्गत भारत सरकार हमें बाहर भेज रही है, तब उन्होंने इसरार किया कि हम एक छोटा-सा उपहार स्वीडन स्थित उनके पिता के आवास पर ले जाकर उनसे जरूर मिलें।
कई देशों की यात्रा करते, अनेक दर्शनीय स्थलों को मन की आंखों से पीते, कई कवि-कलाकारों से मिलते-बिछुड़ते अंत में जब हम स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के अरलाण्डा हवाई अड्डे पर उतरे तब हमारा स्वागत एक बाईस वर्षीया दुभाषिनी ने किया, उसने अपना नाम बताया ‘रानो’ सरकारी वाहन पर नगर की ओर ले जाते हुए रानो ने सूचित किया कि स्टॉकहोम के सर्वप्रिय होटल ‘भालमेन’ में हमारे लिए एक कमरा सुरक्षित है। क्योंकि रानो नाम में कुछ भारतीय नामों जैसे खनक थी, हमने हल्के संकोच के साथ पूछ ही लिया व्युत्पति के बारे में।
रानो ने कहा, ‘आपका सोचना शायद ठीक ही हो, क्योंकि मेरी दादी अक्सर हिंदुस्तान को ‘बारोधान’ कहकर बुलाती है (बारोधान अर्थात बड़ा स्थान शब्द रोमा संस्कृति के लोगों में प्रचलित है)। मेरे पूर्वज उस यायावर संस्कृति के थे, जिसे हम रोमा नाम से अभिहित करते हैं। हमने रानो से फिर पूछा, रोमा लोग योरप के देशों में तो गए, यायावरी करते-करते क्या वे यहां भी आ पहुंचे थे? रानो बोली, मेरी दादी बताती है मेरे दादा जी जलयान में नौकरी करते थे और उन्हें हाम्बुर्ग के समुद्र तट पर उनसे प्रेम हुआ था।

यही नहीं उसे दुभाषिनी जैसा उबाऊ कार्य इसलिए करना पड़ता है, क्योंकि दादी को अपने पास रखने के कारण उसे दूना आयकर देना पड़ता है। रानो ने हमें बोनियर्स लितरारा मैग्जीन के संपादक से मिलवाया जिसने कालांतर में हमारी कविताओं के अनुवाद स्वीडिश भाषा में छापे। रानो ही हमें नोबल प्राइज देने वाली संस्था के कार्यालय ले गई, जिसका ग्रंथागार, अंग्रेजी, साहानी, फ्रांसीसी, जर्मन और इताल्वी भाषा की पुस्तकों से भरा पड़ा था। हमने जब रानो से, सिगिरड काहले के पिता श्री प्रोफेसर नीबर्ग से मिलने की बात कही तो रानो ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया।

अगले दिन रानो जब आई तो उसने बताया कि प्राच्यविद्याविद् प्रो.नीबर्ग को स्वीडन के कानूनों के तहत वरिष्ठ नागरिक होने के कारण स्टॉकहोम से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर उप्पसला नामक नगर में बसा दिया गया है। स्वीडन के सभी बूढ़े उप्पसला में रहते हैं। हम अवाक, फिर चुप्पी तोड़ते हुए रानो ने ही समस्या का समाधान देते हुए कहा, 'मैंने उप्पसला में रहने वाली अपनी एक सहेली से बात की है। कानूनन तो आपको उनसे मिलने की मनाही है। फिर भी शनिवार की शाम अगर आप चाहें तो मैं आपके लिए एक रेल टिकट ला दूं। आप आठ बजे रात उप्पसला पहुंचेंगे।

मेरी सहेली आपको स्टेशन से अपनी कार में ले जाकर प्रो. नीबर्ग के आवास पर छोड़ देगी और दो घंटे बाद रात दस बजे वहां से ले जाकर रात्रिभोज का आयोजन कर रात को बारह बजे रेल में बैठा देगी। रेल आपको रात के दो बजे यहीं वापस ले आएगी।' हमने बिना झिझके हामी भरी ही थी कि वह होटल भालमेन के भूतल से टिकट ले आयी। होटल के ठीक नीचे रेल जंक्शन था। रानो टिकट लाई तो, पर यह क्या? सिर्फ इकतरफा टिकट। हमारे प्रश्न करने पर रानो बोली, 'मेरी सहेली ने कहा है, 'क्या मैं मेहमान को जाने ही दूं सुबह तक' (हालांकि सफेद रातों  की ऋतु उतर चुकी थी तब तक उत्तरी ध्रुव वाले क्षेत्र पर) रात आठ बजे रानो की सहेली की कृपा से हम उप्पसला के उस इलाके में पहुंचे जहां तमाम बूढ़े सारी सुविधाओं के साथ जिंदा धड़कते हुए मुर्दों की जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त थे, हमने एक घर की घंटी बजाई। एक लंबे, कुम्हलाए चेहरे वाले वृद्ध ने दरवाजा खोला। हमारे परिचय देने से पहले ही प्रो. नीबर्ग ने हमें तेजी से भीतर घसीट कर द्वार बंद कर लिया।

इसके बाद प्रो. नीबर्ग हमें गले लगाकर भर्राई आवाज में बोले, 'सिर्फ भारत जैसे देश का नौजवान ही इस बूढ़े के पास उसकी बेटी का प्रेमपूर्ण संदेश ला सकता था।' हमने सिगिरड द्वारा भेजा गया उपहार, जिसके विषय में उनकी बेटी ने शायद उन्हें पहले से ही सूचित कर रखा था, तत्काल उन्हें समर्पित कर दिया। हमें पास बैठाकर प्रो. नीबर्ग कुछ देर रोए फिर उन्होंने टूटती आवाज में बताना शुरू किया, 'उप्पसला में मेरे जैसे सैकड़ों बूढ़े-बुजुर्ग इसी तरह के घरों में रहते हैं। फ्रिज खाने की चीजों से भरा रहे, सरकार इसका ध्यान रखती है। सप्ताह में दो बार डॉक्टर आकर पड़ताल कर जाता है कि रक्तचाप ठीक है, हृदय की धड़कन सही ढंग से चल रही है या नहीं आदि-आदि।

जवान चेहरे और किलकारी मारते बच्चे सिर्फ टीवी पर दिखाई देते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि किलकारी मारकर भागती हुई किसी छरहरी किशोरी को देखकर मुझे लगता है कि यह मेरी सिगिरड है, जिसे अध्ययन-अध्यापन करने वाले अपने युवा वर्षों में मैंने क्या-क्या नहीं सिखाया। सिगिरड प्रतिभावान थी। शुरू के चौबीस वर्ष जब तक वह मेरे सान्निध्य में रही। मगर ज्ञान को लेकर उसमें एक अदम्य कभी न बुझने वाली प्यास थी। उच्चतर शिक्षा के लिए उसे एक छात्रवृत्ति मिली और वह विदेश चली गई। बीच-बीच में मेरे पास आती रही फिर जैसा कि होता है जिंदगी के किसी कालमान पर उसे एक जीवनसाथी मिल गया। सिगिरड ने घर बसा लिया और मैं बूढ़ा हो गया। अब सिर्फ मैं हूं उप्पसला की इस मुर्दा बस्ती में, जैन साधकों की तरह कायोत्सर्ग करता हुआ।'
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