मदीबा, यह आपके आराम का वक्त है!

कुमार प्रशांत / राजनीतिक विचारक Updated Sat, 07 Dec 2013 10:30 PM IST
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Madiba, It is time of your rest!
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गिन नहीं पा रहा हूं कि कितने शब्द, कितने विशेषण और कितनी उपमाएं मन में घुमड़ रही हैं! चाहता हूं वह सब उड़ेल दूं ... लेकिन जानता हूं कि वे सब मिल कर भी वह नहीं कह पाएंगे जो मैं महसूस कर रहा हूं। जिसे कभी देखा नहीं, जिससे हमेशा हजारों मील दूर रहा, खुद को उसके इतना करीब पाने का यह अहसास क्यों है?
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वे कभी मेरे विचार-जगत के या मेरे कार्य-संसार के नेता नहीं रहे फिर भी ऐसा क्यों लग रहा है जैसे दिशा भी थोड़ी धुंधला गई है और रास्ते भी कुछ कम दिखाई दे रहे हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि आंखें आंसुओं से भरी हैं। ऐसा इसलिए है शायद कि इस गुरुवार को जो गया, वह कहीं-न-कहीं, अपनी भारतीय परंपरा में जिसे गुरु कहते हैं, वह जगह घेरता था।
उस जगह का खाली होना कहीं गहरे हमें भी अकेला और अधूरा छोड़ जाता है। नेल्सन मंडेला मुझ जैसे कितने ही लोगों के लिए गुरु थे। ऐसा इसलिए नहीं कि वे जिसे अपना गुरु कहते व मानते थे, उस महात्मा गांधी से कुछ अपनी भी रसाई है! ऐसे लोग तो दूसरे भी कई हैं, लेकिन उनमें से कोई वह भाव तो नहीं जगाता है जो इस अनदेखे और अनपहचाने आदमी ने हमारे जीवन में जगाया था।
मंडेला से नया ही परिचय हुआ था। मैं वह सब जान-पढ़ चुका था, जो किसी बड़े आदमी के बारे में जरूरी होता है और फिर किसी दिन मैं बंदी मंडेला के संस्मरण पढ़ने बैठा था- 27 साल लंबी कैद के बाद की यादें! पढ़ने से पहले भी मैंने याद किया था कि कभी गांधी नहीं रहे इतनी लंबी जेल में, लेकिन यह आदमी रहा; और गांधी की तरह अहिंसा, सत्य, संयम कि कहूं अभिनव क्रांति की ऊष्मा से दीपित कोई कवच भी नहीं था उसके पास!

हिंसा और बदले की भावना से भरा, आतंकवादी रास्तों का राही था वह, जब जेल पहुंचा। इसलिए मैं उसकी यादों में कुछ दूसरा ही खोज रहा था या कहूं कि मेरी अपेक्षा कुछ दूसरी ही थी कि मैंने पढ़ा- वे लिख रहे हैं - ''रोबेन द्वीप की जेल की उस एकांत सेल में इतने साल बिताने के बाद भी, जहां मुझे पूरे साल में एक ही आदमी से मिल सकने की और छह माह में मात्र एक पत्र ही पाने की इजाजत थी, मनुष्य स्वभाव की अच्छाइयों पर से मेरा भरोसा कभी कमजोर नहीं पड़ा !'' ... मैंने पढ़ा और मैं रुक गया, फिर से पढ़ा कि कहीं मैंने पढ़ने में या समझने में गलती तो नहीं की, लेकिन जो लिखा था वह इतनी पवित्रता से लिखा था कि न लिखने में और न समझने में कोई चूक संभव ही थी। मैंने अपने भीतर इस वाक्य की सनसनाहट सुनी!

जिसके साथ कभी किसी ने अच्छा बर्ताव किया ही नहीं, जो अपनी चमड़ी के रंग के कारण ही प्रताड़ित, अपमानित और दमित किया जाता रहा; गोरी चमड़ी की अहमन्यता से जूझने में जिसने कभी साधनों की पवित्रता आदि का विचार किया नहीं, उसका मनुष्य स्वभाव की अच्छाइयों पर विश्वास बना कैसे और 27 सालों तक टिका कैसे रहा!!...

इस आदमी ने जैसे झकझोर कर जगाया था मुझे!... यह आदमी जब रोबेन द्वीप की जेल के भीतर पहुंचाया गया था तब उस पर वसंत उतरा हुआ था... लंबा कद, गठा हुआ कसरती बदन, मजबूत मुक्का और लंबी टांगों के बल पर तेज चलती काया! इस अश्वेत नेता के नाम से डरते थे लोग!!

और जब 27 सालों की लंबी, शारीरिक श्रम से टूटती एकाकी जेल काट कर यह आदमी बाहर आया तब तक वसंत जा चुका था, लंबा कद कुछ झुक कर चलने लगा था, तुर्शी की जगह पूरे व्यक्तित्व में सनसनाहट भरी उत्कंठा दौड़ने लगी थी और सुबह की चमकीली धूप-सी खेलती अपनत्व भरी मुस्कान जैसे उनका पूरा चेहरा चुनती थी। गांधी की बात छोड़ दें हम तो इस सदी में क्षमा की शक्ति का ऐसा आराधक मंडेला के सिवा दूसरा कोई मिलेगा नहीं। एक ऐसे मुल्क में, जहां रंगभेद को बनाए रखना ही एकमात्र नागरिक गतिविधि हो, किसी अश्वेत नाराज युवा का जीवन कैसा रहा होगा, इसकी कल्पना करनी हो तो हम मंडेला की जीवनी ‘आजादी की ओर एक लंबा सफर’ पढ़ें।

हम बड़ी आसानी से किसी को भी गांधी कह लेते हैं ताकि इस विशेषण में हमारा अपना बौनापन छिप जाए। मंडेला गांधी नहीं थे, गांधी की दिशा के यात्री थे। ऐसा मानने से उनकी महानता याकि एक इंसान के रूप में उनकी विराटता इंच भर भी कम नहीं होती है। हमारी परंपरा में तो यह गहराई रही है न कि जो हमसे कहती है कि तीर्थ पर न जा सके तो दुख नहीं, तीरथ कर लौटे किसी इंसान का दर्शन करना भी पुण्य-लाभ देता है।

यह इंसान को प्रतिष्ठित करने की कला है। इसलिए गांधी से अपनी तुलना पर मंडेला ने कहा, “गांधी से मेरी तुलना उचित नहीं है। हममें से कोई भी नहीं है कि जिसमें उन जैसा एकाग्र समर्पण और विनम्रता हो। उन्होंने हमें सिखाया कि अगर असत पर सत की जीत होनी है तो यह जरूरी है कि हम कारावासों को भुगतने के लिए तैयार रहें... यह इंसान हर तरह की कमजोरियों से ऊपर उठा था, मैं बहुतेरी कमजोरियों से घिरा आदमी हूं!” और जितनी-जितनी बार हम यह सब पढ़ते हैं उतनी-उतनी बार यह आदमी हमें गांधी के करीब जाता दिखाई दता है।

इस दौर में, जब लोग राजघाट की तरफ जाते भी डरते है और साल के दो दिन भी बमुश्किल रस्म अदाएगी कर पाते हैं, हम एक ऐसे आदमी के साथ जिए कि जो हर रोज गांधी की दिशा में चलने की कोशिश में लगा रहा और फिर भी कभी इसका गुमान नहीं किया।
 
यही गांधी की विरासत है जिसे कभी कोई जयप्रकाश कभी कोई मार्टिन लूथर, कभी कोई मंडेला संभालता है और हम अपनी नजरों में कुछ बड़े हो जाते हैं। मुझे बहुत खुश हो रही है कि जोहानीसबर्ग की सड़कों पर रोते-कलपते लोगों की भीड़ नहीं है। शोक है, जिसने आनंद की पोशाक पहन रखी है। हमारे बीच एक इतना बड़ा आदमी आया कि जिसे नापने के सारे पैमाने खोटे और छोटे पड़ गए, इससे ज्यादा आनंद की बात क्या हो सकती है? हम याद रखें कि मंडेला ने कहा था, '' हम हमेशा याद रखें कि सही काम करने का वक्त हमेशा पका ही रहता है।

मदीबा, हम भरे मन और कृतज्ञ दिल से आपको विदा देते हैं। हम जानते हैं कि आपके आराम करने का वक्त आ गया है।
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