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बैंकों के विलय से सुधरेगी अर्थव्यवस्था की सेहत

जयंतीलाल भंडारी Updated Tue, 10 Sep 2019 04:08 AM IST
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केनरा बैंक
केनरा बैंक - फोटो : PTI
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हाल ही में वैश्विक वित्तीय शोध संगठन नोमूरा ने कहा है कि सरकारी बैंकों का विलय अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए एक सकारात्मक पहल है। बैंकों के नए विलय से भविष्य में आर्थिक वृद्धि एवं लाभप्रदता का परिदृश्य दिखाई देगा। गौरतलब है कि विगत 30 अगस्त को नरेंद्र मोदी सरकार ने 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर चार बड़े बैंक बनाए जाने का फैसला लिया है। सरकार चालू वित्त वर्ष के दौरान 70,000 करोड़ रुपये के पुनर्पूंजीकरण (रिकैपिटलाइजेशन) में से करीब 55,250 करोड़ रुपये की पूंजी इन्हीं बैंकों में डालेगी। ऐसे में अब सरकारी क्षेत्र के बैंकों की संख्या 18 से घटकर 12 रह जाएगी, जो वर्ष 2017 में 27 थी।
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निश्चित रूप से बैंकों का एकीकरण एक अच्छा कदम है, जो उद्योग-कारोबार, अर्थव्यवस्था और आम आदमी सबके लिए लाभप्रद होगा। इससे बैंकों की बैलेंसशीट सुधारेगी, बैंकों की परिचालन लागत घटेगी। पूंजी उपलब्धता से बैंक ग्राहकों को सस्ती दरों पर कर्ज मुहैया करा सकेंगे। मजबूत बैंकों से धोखाधड़ी के गंभीर मामलों को रोका जा सकेगा, साथ ही फंसा कर्ज (एनपीए) भी घटेगा। बैंकों के विलय के साथ ही बैंकों के लिए नए परिचालन सुधार भी दिखाई देंगे।
निस्संदेह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय के साथ दिवालिया संहिता पर असर यह होगा कि विलय वाले बैंकों के फैसले लेने का रुख भी एकीकृत हो जाएगा और यह कई लेनदारों के फैसले के संदर्भ में काफी लाभकारी होगा। कई लेनदारों के होने से मौजूदा स्वरूप में अक्सर समाधान प्रक्रिया अटक जाती है, क्योंकि छोटे बैंक बहुमत की राय से सहमति नहीं जताते। ऐसे मामलों में अब समाधान प्रक्रिया आसान हो जाएगी।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1991 में बैंकिंग सुधारों पर एमएल नरसिम्हन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन हुआ था। उस समिति ने देश में तीन-चार अंतरराष्ट्रीय स्तर के बैंक और दस बड़े राष्ट्रीय बैंकों की सिफारिश की थी। उस समिति की रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में छोटे बैंकों को बड़े बैंक में मिलाने का फाॅर्मूला केंद्र सरकार पहले भी अपना चुकी है। निश्चित रूप से छोटे और कमजोर बैंकों के साथ मजबूत बैंकों का एकीकरण देश की जरूरत है। सरकारी बैंकों की मजबूती बेहद जरूरी है, क्योंकि सरकार की जनहित की योजनाएं सरकारी बैंकों पर आधारित हैं। विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था करने और उन्हें बांटने की जिम्मेदारी सरकारी बैंकों को सौंपी गई है। सरकारी बैंकों द्वारा एक ओर मुद्रा लोन, एजुकेशन लोन और किसान क्रेडिट कार्ड के जरिये बड़े पैमाने पर कर्ज बांटा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बैंकरों को लगातार पुराने ऋण की वसूली भी करनी पड़ रही है। ऐसे में भारत की नई जन हितैषी बैंकिंग जिम्मेदारी छोटे-छोटे बैंकों या निजी क्षेत्र के बैंकों से संभव नहीं है। ऐसी जिम्मेदारी मजबूत सरकारी बैंक के द्वारा ही निभाई जा सकती है।

निस्संदेह 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर चार मजबूत बैंक बनाने का निर्णय बैंकिंग व्यवस्था के लिए लाभप्रद होगा। इन बैंकों में 55,250 करोड़ रुपये के नए पूंजीकरण से सभी प्रकार के छोटे-बड़े उद्योग-कारोबार के साथ-साथ आम आदमी भी लाभान्वित होगा। साथ ही सरकारी  बैंक मजबूत बनकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करते हुए अर्थव्यवस्था को गतिशील रख सकेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि सरकारी बैंकों के विलय से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता बढ़ेगी, ग्राहक सेवा बेहतर होगी तथा बैंकों की नए राज्यों एवं क्षेत्रों में पहुंच बढ़ेगी। बैंकों में नई तकनीकी विशेषज्ञता आ सकेगी और बैंक कर्मियों में वेतन असमानता दूर होगी तथा डूबत ऋण नहीं बढ़ेंगे।
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