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मणिपुर का भविष्य तय करेंगे नगा

subir bhowmikसुबीर भौमिक Updated Mon, 20 Feb 2017 07:16 PM IST
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सुबीर भौमिक
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हाल ही में एक अंग्रेजी वेबसाइट और सी वोटर के चुनावी सर्वेक्षणों में मणिपुर में त्रिशंकु विधानसभा की आशंका जताई गई है। इसी सर्वे में मणिपुर में भाजपा के वोटों में 2.1 फीसदी से 32.1 फीसदी का भारी इजाफा दिखाया गया है, तो तीन के बार के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस के वोट में गिरावट दिखाते हुए संभावना जताई गई है कि यह 42.4 फीसदी से गिरकर 31.3 फीसदी रह सकता है। सर्वे यह भी कहता है कि 60 सदस्यीय विधानसभा में छोटी पार्टियां और निर्दलीय 18 सीटें जीत सकते हैं। यदि वाकई ऐसा होता है, तो राज्य में चुनाव के बाद, भारी जोड़तोड़ होना तय है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के प्रबंधक बहुमत पाने के लिए छोटे दलों और निर्दलीयों को रिझाने की कोशिश कर सकते हैं।
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मगर सबसे बड़ी टीस यह है कि सरकार किसी की भी बने, मणिपुर को लंबी आर्थिक नाकेबंदी ने बुरी स्थिति में ला दिया है। कांग्रेस सरकार के नए पहाड़ी जिलों के गठन के फैसले के बाद युनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने आर्थिक नाकेबंदी शुरू की थी। यूएनसी मानती है कि सरकार के इस कदम से राज्य में नगा लोगों के कब्जे वाली भूमि और उनके अधिकार कम हो जाएंगे। यूएनसी के प्रदर्शन के कारण मणिपुर को शेष भारत से जोड़ने वाले हाईवे पर वाहनों की आवाजाही ठप हो गई। केंद्र ने पिछले महीने गतिरोध तोड़ने के लिए हस्तक्षेप किया था, मगर वह नाकाम रहा।

पिछले वर्ष असम विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी कामयाबी के बाद से भाजपा पूर्वोत्तर में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है और उसकी नजर कांग्रेस शासित मणिपुर, मेघालय और मिजोरम जैसे राज्यों पर है। कांग्रेस सरकार के पतन और उसके अधिकांश विधायकों के भाजपा में चले जाने के बाद से पार्टी अरुणाचल प्रदेश में सरकार चला ही रही है और नगालैंड में सत्तारूढ़ गठबंधन का भी वह हिस्सा है।

इस चुनाव में मतदाताओं के समक्ष भ्रष्टाचार और अलगाववादी गुटों की हिंसा प्रमुख मुद्दे हैं। सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद इबोबी सिंह मुख्यमंत्री के रूप में मतदाताओं की पहली पसंद के रूप में दिखते हैं। दूसरी ओर भाजपा किसी स्थानीय नेता को मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने में नाकाम रही, जैसा कि उसने असम में सर्बानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया था।

राज्य में प्रभावशाली मैती समुदाय इबोबी सरकार को भ्रष्ट मानने के साथ ही यह भी मानता है कि वह आर्थिक नाकेबंदी खत्म करने में नाकाम रही है; मगर वह भाजपा के नगालैंड पीपुल्स फ्रंट और भूमिगत एनएससीएन से रिश्तों को लेकर भी आश्वस्त नहीं है, जिनके साथ केंद्र ने दो वर्ष पहले फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे।

इबोबी सिंह नगाओं में अलोकप्रिय हैं, मगर उन्हें मैती समुदाय के हितरक्षक की तरह देखा जाता है, जबकि कुकी, जो मैती सुमदाय की तरह नगाओं के होमलैंड का विरोध कर रहे हैं, उन्हें किसी भाजपा नेता की तुलना में अधिक स्वीकार्य मानते हैं। वास्तव में नगा शांति वार्ता को लेकर केंद्र के रवैये से नाराज होकर भाजपा के एक स्थानीय बड़े नेता खुमुकचाम जॉयकिशन पार्टी से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हो गए। जॉयकिशन भाजपा के विधायक थे, जिन्होंने एक स्थानीय सिविल सोसाइटी ग्रुप के अल्टीमेटम के बाद इस्तीफा दे दिया था। इस ग्रुप ने केंद्र सरकार और नगा विद्रोही गुट एनके एनएससीएन के साथ हुए समझौते के ब्योरों का खुलासा न करने पर बहिष्कार का एलान किया था। जॉयकिशन उन दो भाजपा विधायकों में से एक थे, जिन्होंने मणिपुर विधानसभा में भाजपा का खाता खोला था, लेकिन उनका इस्तीफा मैती समुदाय के रुख में आए बदलाव को रेखांकित करता है। लोगों के रुख में आए बदलाव से पता चलता है कि केंद्र सरकार ने हड़बड़ी में यह समझौता तैयार किया था। ऐसे में भाजपा की यह राजनीतिक जरूरत थी कि उसे समय रहते लोगों के मन में व्याप्त आशंकाओं को दूर करना चाहिए था। असल में मणिपुर में राज्य की क्षेत्रीय अखंडता एक बड़ा मुद्दा है, जबकि एनएससीएन (आईएम) लंबे समय से ग्रेटर नगालैंड की मांग कर रहा है, जिसमें मणिपुर का नगाबहुल इलाका भी शामिल है।

नगा शांति वार्ता से संबंधित समझौते के ब्योरे को लेकर सवाल तब उठे, जब यूएनसी ने राज्य में आर्थिक नाकेबंदी शुरू की। नगा बहुल क्षेत्रों को विभाजित कर नए जिलों के निर्माण के राज्य सरकार के कदम का विरोध करते हुए यूएनसी ने राज्य के मैदानी इलाके से गुजरने वाले दो नेशनल हाईवे पर सामान की आवाजाही रोक दी। इस क्षेत्र में मैती समुदाय के लोग रहते हैं, जिन्हें भाजपा का समर्थक माना जाता है।

इस चुनाव में कुछ सवाल उठ रहे हैं। पहला, यह कि क्या केंद्र और एनएससीएन (आईएम) ने जानबूझकर चुनाव तक समझौते के ब्योरे को उजागर नहीं किया है? भाजपा का मणिपुर में एनपीएफ के साथ रिश्ता क्या है; इस क्षेत्रीय दल ने नगालैंड में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई है और मणिपुर में उसे मैती तथा कुकी समुदाय की पहचान की राजनीति के बरक्स राजनीतिक ताकत के रूप में देखा जाता है? क्या भाजपा का मणिपुर में एनपीएफ के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन न करना सिर्फ एक रणनीति है या फिर यह मैती और कुकी समुदाय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का नतीजा है? क्या भाजपा चुनाव के बाद जरूरत पड़ने पर एनपीएफ के साथ मिलकर मणिपुर में सरकार बनाएगी? यदि ऐसा होता है, तो फिर दूसरे जातीय समूहों का कैसे खयाल रखा जाएगा, जबकि एनपीएफ तो ग्रेटर नगालैंड का समर्थक है? इबोबी सिंह नगाओं में अलोकप्रिय हैं, पर अनेक लोग उन्हें मैती और कुकी समुदाय के हितैषी मानते हैं। भाजपा किसी मजबूत स्थानीय नेता के अभाव के कारण सत्ता विरोधी रुझान से उपजे कांग्रेसी मतों की अकेली दावेदार नहीं है, क्योंकि वहां इरोम शर्मिला जैसे कई दूसरे स्थानीय नेता भी मैदान में हैं। अलबत्ता भाजपा के पक्ष में छोटे राज्यों की यह अवधारणा है कि सुरक्षा और विकास के लिहाज से उसी पार्टी को वोट देना हितकर होता है, जिसकी केंद्र में सरकार हो।
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