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गणतंत्र का चौथा संकट

Ramchandra Guhaरामचंद्र गुहा Updated Sun, 26 Jan 2020 03:48 AM IST
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india gate
india gate - फोटो : PTI
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अनेक पश्चिमी पर्यवेक्षकों के अनुमान के विपरीत भारतीय गणराज्य एकजुट बना हुआ है। हालांकि सात दशकों में से उसने 1960, 70 और 80 के दशकों में तीन गंभीर संकटों का सामना किया। आज वह चौथे संकट का सामना कर रहा है।
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जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है कि यदि भारत 1947 में कोई स्टार्ट अप होता तो, सर्वाधिक जोखिम उठाने वाला भी कोई उद्यमी पूंजीपति इसमें निवेश नहीं करता। किसी और नए राष्ट्र का जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में नहीं हुआ। देश का विभाजन ही अपने आप में भयावह था, जिसमें बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से विस्थापित हुए।

स्वतंत्रता मिलने के दो महीने बाद पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठिये भेजे, जिसकी वजह से युद्ध छिड़ गया। इसके बाद जनवरी, 1948 में एक हिंदू कट्टरपंथी ने राष्ट्रपिता की हत्या कर दी।

धार्मिक दक्षिणपंथ के इस हमले के बाद राजनीतिक वामपंथियों ने तब हमला कर दिया, जब महात्मा गांधी के निधन के महज छह महीने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने रूसी आकाओं के आदेश पर काम करते हुए भारतीय राज्य के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू कर दिया। यह सब खाद्य सामग्री के संकट, विदेशी मुद्रा की कमी और एक बड़ी तथा रणनीतिक रूप से अहम रियासत हैदराबाद द्वारा भारतीय संघ में जुड़ने से इनकार करने की पृष्ठभूमि में हुआ।

इन सबसे आखिर नवजात भारत कैसे निपटा? वह कई टुकड़ों में बिखर क्यों नहीं गया, जैसा कि अनेक पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने दावा किया था? इसका जवाब उस समय के देश के असाधारण नेतृत्व में निहित है, जिसमें सरकार के भीतर आंबेडकर, नेहरू और पटेल जैसे नेता थे।

नागरिक समाज में कमलादेवी चट्टोपाध्याय, मृदुला साराभाई और अनीस किदवई थे और इनके साथ ही प्रतिभाशाली तथा बहुत शानदार तरीके से ध्यान केंद्रित करने वाले सरकारी अधिकारियों का एक समूह भी था। भारतीयों की इस विलक्षण पीढ़ी ने देश को राजनीतिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से एकजुट रखा और और इस एकता को एक दस्तावेज के जरिये वैधता प्रदान की, जिसे हम भारत का संविधान कहते हैं।
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इन वर्षों में पैदा हुआ संकट

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