छह साल का हासिल

Ramchandra Guhaरामचंद्र गुहा Updated Sun, 14 Jun 2020 02:27 AM IST
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pm modi - फोटो : social media

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कांग्रेस की भ्रष्टाचार और मिलीभगत वाली सत्ता से परेशान होकर जिन लोगों ने मोदी में एक गतिशील आर्थिक सुधारक, यानी भारतीय देंग श्याओपिंग देखा था, वे अब मायूस हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि उन्होंने विभाजनकारी विचारधारा नहीं छोड़ी। 
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पिछले हफ्ते प्रतिष्ठित अमेरिकी रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की रेटिंग कम कर उसे बीएए 3 कर दिया, जो कि न्यूनतम स्तर पर है। इस तरह यह एजेंसी स्टैंडर्ड ऐंड पुअर तथा फिच के साथ खड़ी हो गई, जिन्होंने पहले ही भारत को निचले पायदान पर रखा था। अपने निर्णय के बारे में मूडीज ने कहा, 'आज की यह कार्रवाई कोरोना वायरस महामारी के संदर्भ में है, लेकिन यह महामारी के प्रभाव से संचालित नहीं है। इसके बजाय महामारी ने भारत की क्रेडिट प्रोफाइल में इस झटके के पहले से मौजूद और निर्मित हो रही कमजोरियों को बढ़ाया है, और जिसने पिछले वर्ष नकारात्मक नजरिया बनाने को प्रेरित किया था।'
शर्मिंदगी की बात है कि यह नकारात्मक फैसला तब आया, जब सत्तारूढ़ पार्टी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की छठी वर्षगांठ मना रही थी। इस बीच, दिल्ली के दो वरिष्ठ स्तंभकारों ने उनके कार्यकाल का गंभीरता से आकलन किया। इन दोनों को कभी उम्मीद थी कि मोदी एक आर्थिक सुधारक साबित होंगे; और दोनों मायूस थे, क्योंकि वह इसके उलट साबित हुए। 
इंडियन एक्सप्रेस में लिखने वाली तवलीन सिंह को महसूस हुआ कि ये नाकामियां अरुण जेटली की असमय मौत की वजह से आई हैं, क्योंकि इसके बाद जैसा कि वह दावा करती हैं, 'अचानक सरकार की प्राथमिकताओं और छवि में बदलाव आ गया।'

द प्रिंट के लेख में शेखर गुप्ता ने मोदी को सलाह देने वाले आईएएस अधिकारियों पर दोष मढ़ा; वह उन्हें सतर्क और जोखिम से बचने वाले नजर आए, जो कि पूर्व प्रधानमंत्रियों नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी को सलाह देने वाले नौकरशाहों की उत्कृष्ट टीम जैसे नहीं हैं।

मेरा अपना विश्लेषण एकदम अलग है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने मायूस किया, इसलिए नहीं कि उनके सलाहकार खराब थे या फिर इसलिए कि कुछ अच्छे सलाहकारों का अपेक्षाकृत जल्द निधन हो गया, बल्कि उनकी खुद की कमजोरियों और नाकामियों के कारण।

विशेष रूप से तीन गुण हैं, जिनसे यह समझने में मदद मिल सकती है, कि दो शानदार चुनावी जनादेश हासिल करने के बावजूद नरेंद्र मोदी आर्थिक मोर्चे पर सफलता के लिए वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाए जैसा कि उनके समर्थकों को कभी लगता था। 

पहला गुण है, विशेषज्ञों और विशेषज्ञता पर संदेह। खुद के दम पर बने शख्स के तौर पर, जो अपनी बुद्धिमत्ता, अपने प्रयास और इच्छाशक्ति के दम पर शीर्ष पर पहुंचा हो, मोदी प्रतिष्ठित संस्थानों से औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने वालों को संदेह से देखते हैं। उनका यह बयान कि वह 'हार्वर्ड के बजाय हार्ड वर्क को पसंद करते हैं', उनकी इसी सोच का प्रमाण है। 

सच यह है कि इनके अंतरसंबंध हैं; यदि अभिजीत बनर्जी हार्वर्ड से पीएचडी हासिल करने के बाद कड़ा परिश्रम नहीं करते, तो उन्हें कभी अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलता। सुशासन के लिए केंद्रित ऊर्जा और विशेषज्ञ ज्ञान दोनों की जरूरत होती है। 

नोटबंदी, आपदा, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को कई साल पीछे धकेल दिया, से बचा जा सकता था, बशर्ते प्रधानमंत्री ने शिकागो से शिक्षित भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर की पेशेवर सलाह सुनी होती। हाल ही में देखें, तो कोविड-19 की महामारी का कुछ कम गंभीर असर होता, यदि प्रधानमंत्री ने दिखावे और नाटकीयता के प्रति अपने झुकाव के बजाय अपनी नीतियां देश के शीर्ष महामारी विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर बनाई होतीं।

दूसरा गुण, जिसका संबंध पहले से है, वह है 'पर्सनॉलिटी कल्ट' जैसा कि प्रधानमंत्री ने अपने इर्द-गिर्द बना रखा है। प्रधानमंत्री के साथ काम कर चुके एक टेक्नोक्रेट ने मुझे बताया था कि सारे सलाहकारों को एक नियम का पालन करना होता है और वह है, 'पूर्ण चापलूसी, कोई श्रेय नहीं।' 

प्रधानमंत्री का 2019 का चुनावी नारा, 'मोदी है तो मुमकिन है', सब कुछ कह देता है। सिर्फ मोदी ही आतंकवाद को हराएंगे, मोदी और केवल मोदी ही पाकिस्तान को नीचा दिखाएंगे (और अब चीन को भी), मोदी ही भ्रष्टाचार को खत्म करेंगे, मोदी भारत को पक्के तौर पर विश्व गुरु बनाएंगे, यह सत्तारूढ़ दल और सरकार के बीच सर्वव्यापी सोच की तरह है। 

लेकिन भारत जैसे विशाल और जटिल देश को एक व्यक्ति की इच्छा के बल पर प्रभावी ढंग से और अच्छी तरह से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है-हालांकि, वह व्यक्ति दूरदर्शी और मेहनती हो सकता है।

वह जिस भी आत्मविश्वास और शक्ति के साथ काम करते हों, प्रधानमंत्री के व्यवहार से लगता है कि वह अपने भीतर कुछ हद तक असुरक्षित व्यक्ति हैं। इसका प्रमाण न सिर्फ अच्छा काम करने पर सार्वजनिक रूप से अपने मंत्रियों और सलाहकारों को सराहने की उनकी अनिच्छा में दिखता है, बल्कि वह जिस तरह के लोगों पर भरोसा करते हैं, उससे भी पता चलता है। 

उनके आसपास और केंद्र सरकार की प्रभावशाली जगहों पर गुजरात कैडर के अधिकारियों का जमावड़ा इसका एक संकेत है। दूसरा, कुछ शानदार आईएएस अधिकारियों को सिर्फ इसलिए किनारे लगाने की उनकी प्रवृत्ति, क्योंकि वे कभी कांग्रेस सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रहे थे। यहां तक कि आईएएएस के शीर्ष पदों के भीतर भी नेता के प्रति वफादारी, न कि किसी अधिकारी की विद्वता मोदी सरकार में अहमियत रखती है।

2013-14 में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए अपने अभियान की शुरुआत की थी, तब ऐसे अनेक भारतीयों ने भी उत्साह से उनका समर्थन किया था, जिनका अन्यथा भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्व की विचारधारा की ओर झुकाव नहीं था।

कांग्रेस की भ्रष्टाचार और मिलीभगत वाली सत्ता से परेशान होकर उन्होंने मोदी में एक गतिशील आर्थिक सुधारक, यानी भारतीय देंग श्याओपिंग देखा था, जो कि उद्यमशीलता के जोश से भरी ताकतों को खुला छोड़ देंगे। वे उनकी ऊर्जा, स्व निर्मित व्यक्ति होने और बेशक उनकी वक्तृत्व कला से प्रभावित थे। और उन्होंने उनके इस दावे पर यकीन किया कि उन्होंने आरएसएस के अपने अतीत को पीछे छोड़ दिया है।

यह दुखद है कि अच्छी मंशा रखने वाले इन भारतीयों ने नरेंद्र मोदी को संदेह का लाभ देकर चूक की। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के निराश करने का तीसरा कारण है उनका दिल से विभाजनकारी संघी बने रहना। अपने सार्वजनिक बयानों में वह सावधानी बरतते हैं कि वह सांप्रदायिक न लगें- हालांकि उनकी जुबान फिसल सकती है, जैसा कि उन्होंने कहा था कि वह नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों को उनके कपड़ों से पहचान सकते हैं।

इस संबंध में उनकी चुप्पियों ने बहुत कुछ कहा है। उनकी तब की चुप्पी, जब उनके सांसदों और यहां तक कि एक कैबिनेट मंत्री ने सार्वजनिक रूप से निर्दोष मुस्लिमों की लिंचिंग करने वालों का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था, उनकी तब की चुप्पी, जब गृह मंत्री मुस्लिमों को 'दीमक' बता रहे थे, उनकी तब की चुप्पी, जब भाजपा का आईटी सेल लगातार तब्लीगी जमात की घटना का सांप्रदायिकरण कर रहा था, और इन सबसे ऊपर भेदभाव करने वाले नागरिकता संशोधन अधिनियम का मुखरता से समर्थन- यह सब यही दिखाता है कि वह हिंदुत्व के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत के प्रति समर्पित हैं कि यह अनिवार्यतया एक हिंदू राष्ट्र है और भारतीय मुसलमानों को मातृभूमि के प्रति वफादारी साबित करनी होगी, अन्यथा उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा।

जब नरेंद्र मोदी की पार्टी और उनकी सरकार की ऊर्जा मुस्लिमों को उनकी जगह बताने पर खर्च हो रही है, यह शायद ही आश्चर्य की बात है कि अर्थव्यवस्था कोविड-19 के पहले से बदहाल है, हमारे मीडिया को डराया और धमकाया गया, हमारे सार्वजनिक संस्थानों के साथ समझौते किए गए और सामाजिक शांति नाजुक स्थिति में पहुंच गई। ध्रुवीकरण पर आधारित राजनीति कभी भी किसी देश की प्रगति के लिए अनुकूल नहीं हो सकती।

मई, 2014 में नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिन का जो वादा किया था, वह उनके प्रधानमंत्री बनने के छह वर्ष बाद भी भ्रांति है, इसलिए जवाबदेही खुद नरेंद्र मोदी पर आकर टिक जाती है। न तो एक विश्वस्त सहयोगी की मौत के कारण, न ही उनके कुछ करीबी अधिकारियों की अक्षमताओं के कारण, बल्कि उनकी आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति, विशेषज्ञों पर उनके संदेह, दूसरों के साथ श्रेय साझा करने के प्रति उनकी अनिच्छा और युवावस्था में अपनाई गई विभाजनकारी विचारधारा को न छोड़ पाने की उनकी खुद की अक्षमता, ये सब नरेंद्र मोदी के ऐसे गुण हैं, जो बताते हैं कि क्यों इतिहास उनके नौसिखुआ और विश्वस्त समर्थक जैसा मानते हैं या उम्मीद करते हैं, उससे अधिक निर्ममता से आकलन करेगा।

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