विज्ञापन

अज्ञान का अंधेरा फैलाने वाले शिक्षक

Umesh Chaturvediउमेश चतुर्वेदी Updated Fri, 06 Dec 2019 01:56 AM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर
ख़बर सुनें
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की एक अध्यापिका द्वारा अंग्रेजी न पढ़ पाने का वीडियो वायरल होने के बाद राज्य की सरकारी शिक्षा सवालों के घेरे में है। जब अध्यापक अपना विषय ही न पढ़ा पाएं, तो शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठने ही चाहिए। लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि आखिर किन वजहों से ऐसे अध्यापकों को पक्की नौकरियां मिल गईं, जिन्हें खुद पढ़ना तक नहीं आता। नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था इतनी खोखली कैसे हो गई कि ज्ञान देने वाले की जगह अज्ञानता का अंधेरा फैलाने वाले अध्यापकों की बन आई? यही वजह है कि साधन संपन्न लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल नहीं भेजते हैं। वहां ऐसे ही छात्र पढ़ने जाते हैं, जो निजी विद्यालयों की महंगी फीस का बोझ नहीं उठा पाते।
विज्ञापन
उत्तर प्रदेश ही नहीं, लगभग पूरे हिंदी भाषी राज्यों की प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की सरकारी शिक्षा व्यवस्था का यही हाल है। दुर्भाग्यवश इन इलाकों की निजी स्तर की उच्च शिक्षा भी सिर्फ डिग्री हासिल करने की रस्म बनकर रह गई है।

उत्तर प्रदेश में तो कई विद्यालयों में नियुक्त अध्यापकों और अध्यापिकाओं ने अपने बदले किसी बेरोजगार को कुछ हजार रुपये महीने पर पढ़ाने के लिए काम पर रख छोड़ा है। इसके लिए वे कुछ रुपये विद्यालय के सब डिप्टी इंस्पेक्टर और ग्राम प्रधान को दे देते हैं। कुछ जिलों में स्कूलों से व्हाट्सऐप के जरिये सेल्फी से हाजिरी लगाने की व्यवस्था प्रशासन ने इसीलिए की थी कि सही अध्यापक अपनी हाजिरी साबित कर सकें। लेकिन मीडिया ने इस सेल्फी व्यवस्था पर भी सवाल उठा दिया। इन पंक्तियों के लेखक के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसमें बीएड डिग्रीधारी अध्यापक की नियुक्ति उत्तर प्रदेश के किसी दूरदराज के स्कूल में थी, लेकिन वह बिना स्कूल गए मजे में वेतन उठा रहा था। क्योंकि उसने शिक्षा विभाग की मिलीभगत से अपने बदले एक अध्यापक तैनात कर रखा था और खुद दिल्ली में पीएचडी कर रहा था।

उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को बर्बादी के इस आलम तक पहुंचाने में अतीत की उन सरकारों का ज्यादा हाथ रहा है, जिन्हें इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों को आवाज दी। उसी का दुष्परिणाम उन्नाव की घटना के तौर पर सामने आ रहा है। समाजवादी सरकारों के दौरान जिस तरह उत्तर प्रदेश की परीक्षाओं में नकल हुई, उसने राज्य की शिक्षा व्यवस्था को बेपटरी कर दिया। बाद में आए शिक्षा मित्र योजना ने हालात और भी बदतर किए। ग्राम प्रधानों ने अपने चहेते अयोग्य लोगों को कभी वोट के लालच में तो कभी पैसे के दम पर नियुक्त कर दिया। ऐसा बिहार में भी हुआ। ऐसी योजनाएं लागू करते वक्त वे राजनेता भूल गए कि उनके फैसले से उन्हें फौरी राजनीतिक फायदा तो मिल सकता है, लेकिन उनके राज्य की एक पूरी पीढ़ी अज्ञानता की अंधेरी खोह में डूबने को मजबूर होगी।

सॉफ्टवेयर और तकनीक से जुड़े कुछ प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों को छोड़ दें तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था में जातिवाद, राजनीतिक खेमेबंदी और बदइंतजामी खूब है। यहां चहेते समुदायों, वोट बैंक के फायदे के नाम पर शिक्षा व्यवस्था का भी इस्तेमाल होता रहा है। हिंदीभाषी इलाकों में यह रोग ज्यादा है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में माकूल बदलाव सुझाने और भारतीय समाज को ज्ञान आधारित समाज बनाने की दिशा में विचार के लिए व्यापक सोच वाले शिक्षा आयोग का गठन होना चाहिए, जो इस विषय पर सम्यक रूप से विचार करके अपनी रिपोर्ट दे सके। तभी शिक्षा व्यवस्था का भला हो सकेगा।
विज्ञापन

Recommended

आईआईटी से कम नहीं एलपीयू, जानिए कैसे
LPU

आईआईटी से कम नहीं एलपीयू, जानिए कैसे

ढाई साल बाद शनि बदलेंगे अपनी राशि , कुदृष्टि से बचने के लिए शनि शिंगणापुर मंदिर में कराएं तेल अभिषेक
Astrology Services

ढाई साल बाद शनि बदलेंगे अपनी राशि , कुदृष्टि से बचने के लिए शनि शिंगणापुर मंदिर में कराएं तेल अभिषेक

विज्ञापन
अमर उजाला की खबरों को फेसबुक पर पाने के लिए लाइक करें

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Most Read

Blog

शाहीन बाग आंदोलन: सहमतियों-असहमतियों के बीच सड़कों पर तैयार होता समय का दस्तावेज

शाहीन बाग आंदोलन: सहमतियों-असहमतियों के बीच सड़कों पर तैयार होता समय का दस्तावेज...

27 जनवरी 2020

विज्ञापन

पतला हुआ दुनिया का सबसे मोटा बच्चा, 4 साल में घटाया 110 किलो वजन

इंडोनेशिया के रहने वाले आर्या परमाना ने महज चार साल में अपना वजन 110 किलोग्राम कम कर लिया है। वह दुनिया के सबसे मोटे बच्चे के तौर पर जाने जाते हैं। साल 2016 में आर्या का वजन 193 किलो था। तब उनकी उम्र 10 साल थी। अब उनका वजन घटकर 83 किलो हो गया है।

27 जनवरी 2020

आज का मुद्दा
View more polls

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Election
  • Downloads

Follow Us