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हारे घोड़ों पर दांव लगाने की भूल

Narayana Krishnamurtiनारायण कृष्णमूर्ति Updated Mon, 27 Aug 2018 06:30 PM IST
बैंकों का एनपीए
बैंकों का एनपीए
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पिछले कुछ वर्षों से बैंकिंग क्षेत्र में एनपीए यानी गैर निष्पादित परिसंपत्तियों के बारे में न केवल काफी चर्चा हो रही है, बल्कि यह भी कहा जा रहा है कि जल्दी से जल्दी इस मसले का समाधान कर लेना चाहिए। एनपीए या बैड लोन दरअसल ऐसा कर्ज है, जिसे नब्बे दिन या उससे अधिक की अवधि में चुकाया न गया हो। 31 मार्च, 2018  तक सार्वजनिक बैंकों का बैड लोन 8, 95,601 करोड़ था, जो बैंकों के कुल बैड लोन का 86.5 प्रतिशत था। इस संदर्भ में सरकार यानी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने लगातार यह कहा है कि पुनर्पूंजीकरण के जरिये बैंकों को चलाया जाएगा।
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संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार ने यह कहा कि 2017-18 में उसने राष्ट्रीयकृत बैंकों में 68,729 करोड़ रुपये निवेश किए हैं। जो लोग नहीं जानते, उन्हें बताना जरूरी है कि सरकार के पास सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंक हैं, और राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 19 है; भारतीय स्टेट बैंक और आईडीबीआई बैंक ऐसे दो बैंक हैं, जिनमें सरकार ने क्रमशः 8,800 करोड़ और 7,881 करोड़ रुपये निवेश किए। आज आईडीबीआई बैंक को उस एलआईसी ऑफ इंडिया (भारतीय जीवन बीमा निगम) ने खरीद लिया है, जिसका स्वामित्व भी सरकार के पास है, और उसके पास जो पैसा है, वह देश के नागरिकों का ही है।

बीमारी की जड़

जान-बूझकर दिवालिया होने और बैंक से धोखाधड़ी करने की खबरें आज बेहद बढ़ गई हैं। इसे भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में बैड लोन बढ़ने के प्राथमिक कारण के रूप में देखा जाता है। अलबत्ता बैड लोन की मुख्य वजह आर्थिक वृद्धि की अधिक उम्मीद है, जिस कारण बैंक निरंतर और उदारता से कर्ज बांटते हैं। लेकिन जब आर्थिक वृद्धि की उम्मीद टूट जाती है, और बड़ी-बड़ी विकास परियोजनाओं का काम रुक जाता है, तब कर्ज लेने वाले बैंकों को कर्ज चुका नहीं पाते।

बैंकों में एनपीए बढ़ने से कर्ज देने की व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बैड लोन के तहत बड़ी मात्रा में पैसा फंस जाने के मामलों ने बैंकों को अधिक चौकस बना दिया है। नतीजतन आम तौर पर पूरी अर्थव्यवस्था और खासकर उद्योगों के लिए कर्ज हासिल करने का स्रोत सूख गया है, जिससे आर्थिक पुनरुद्धार का काम पहले से जटिल हो गया है। आज कर्ज चाहने वाले कॉरपोरेट्स बैंकों में जाने के बजाय वैकल्पिक स्रोतों को वरीयता देते हैं। उतनी ही चिंतनीय सच्चाई यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इस तरह काम करते हैं कि उनमें कर्ज देते हुए उसके खतरों या कॉरपोरेट्स की साख का आकलन करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

इसे समझने के लिए ढांचागत क्षेत्र, इस्पात, दूरसंचार और उड्डयन क्षेत्र की ओर नजर दौड़ाना काफी होगा। आर्थिक बेहतरी के दौर में ये सभी क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहे थे, और अपने विस्तार कार्यक्रमों के लिए इन्होंने भारी मात्रा में कर्ज लिया। लेकिन मंदी ने इन्हें अपनी चपेट में ले लिया। हालांकि इन कर्जों के एनपीए बन जाने की और भी वजहें थीं। मसलन, पूंजी पर्याप्तता, बैंक का आकार, एनपीए का इतिहास और वित्तीय संपत्तियों पर रिटर्न की संभावना जैसे सूक्ष्म संकेतकों पर गौर न करना भी बैड लोन के बढ़ते चले जाने का कारण है।

यूको बैंक का ही उदाहरण लीजिए। इसका कुल बैड लोन 30,550 करोड़ रुपये है। 2017-18 में सरकार ने इस बैंक में 6,507 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश किया। यूको बैंक का कर्ज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कुल कर्ज के दो फीसदी से भी कम था। लेकिन पुनर्पूंजीकरण के बाद यूको बैंक का कर्ज बढ़कर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कुल कर्ज का  7.6 प्रतिशत हो गया। साफ है कि बैंकों के पुनर्पूंजीकरण का यह तरीका वैज्ञानिक तरीका नहीं है। इसके अलावा सबसे बड़ी खामी यह है कि एनपीए से ग्रस्त सभी 19 राष्ट्रीयकृत बैंकों के समाधान का अलग-अलग तरीका निकाला जाता है।

कदम उठाने का समय

सरकार के लिए यह स्वर्णिम अवसर है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपना स्वामित्व मजबूत करे। इसका तरीका वही है, जैसा उसने 2015 में भारतीय स्टेट बैंक और उसके सहायक बैंकों में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए किया था। कुछ छोटे बैंकों में पुनर्पूंजीकरण जैसे उपाय के बजाय यह तरीका ज्यादा कारगर होगा। सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंक एक ही काम में हैं, हां, उनकी भौगोलिक अवस्थिति और उनके कारोबार में फर्क है। सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों का एक में विलय कर देने से न केवल उनकी अनेक शाखाओं और ऑपरेशन में कमी आएगी, बल्कि इससे कार्यक्षमता भी बढ़ेगी।

यह सोचना बेकार है कि विलय से नौकरियों में कमी आएगी। इसके बजाय इसके सकारात्मक प्रभावों को देखना चाहिए-पारदर्शिता और नवाचार की संस्कृति वाला एक विशाल सरकारी बैंक भविष्य में बैंकिंग के क्षेत्र में कुशल प्रबंधन की गारंटी होगा। इस तरह का फैसला लेने पर पुनर्पूंजीकरण जैसा कदम भी काफी ठोक-बजाकर उठाया जाएगा। इससे एक सामान्य कर्ज नीति भी लागू होगी, जिसका सभी बैंक पालन करेंगे और जिसके तहत कर्ज देते हुए जोखिमों का भी आकलन किया जाएगा।

जब तक सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों का एक बैंक में विलय नहीं करती, जिसमें उसका मालिकाना हिस्सा कम हो, तब तक एनपीए के बोझ से दबे इन बैंकों का आकर्षण कम ही रहेगा। सामान्य ज्ञान यही कहता है कि हारे हुए घोड़े पर दांव लगाने के बजाय अपना घाटा कम करना बेहतर है। यह एक बेहतर विकल्प हो सकता है कि सामाजिक क्षेत्र के कर्ज और कॉरपोरेट कर्ज को अलग-अलग करते हुए गैर वित्तीय संस्थानों के जरिये कर्ज देने की व्यवस्था हो, बजाय इसके कि सरकार सभी क्षेत्रों में हाथ लगाए और स्थिति ऐसी बन जाए कि उसे नियंत्रित करना कठिन हो। 

एक दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के सभी 21 बैंकों को एक तरीके से चलाने के बजाय उन्हें अलग-अलग तरीके से संचालित करे।  
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