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भरोसे से ही बनेगी बात

surendar kumarसुरेंद्र कुमार Updated Tue, 28 Jan 2020 02:35 AM IST
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सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन - फोटो : a
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एक महीने से ज्यादा समय से देश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, धरने और पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें देखने को मिल रही हैं। अक्सर ये प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसके कारण जान-माल और संपत्ति का भारी नुकसान भी हुआ है। ये आंदोलनकारी किसी खास क्षेत्र या धर्म या जाति या उम्र वर्ग के नहीं हैं और न ही वे एक भाषा बोलते हैं। उनमें से अधिकांश सीएए का विरोध करने का दावा करते हैं और सीएए, एनपीआर और एनआरसी के वास्तविक कार्यान्वयन एवं अंतर्संबंध के बारे में चिंतित हैं। दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली के शाहीन बाग और लखनऊ के घंटाघर में कई हफ्ते से भारी संख्या में महिलाएं भयंकर ठंड की उपेक्षा करते हुए धरने पर बैठी हैं।
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जेएनयू और जामिया के परिसरों में अशांति ने विश्वविद्यालय प्रशासन के कुशासन, पुलिस की संदिग्ध भूमिका और उनके आकाओं के संदेहास्पद एजेंडे के चलते जनता की राय को तेजी से विभाजित कर दिया है। तथ्य यह है कि अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र, जो जेएनयू के छात्रों के बयानों के राजनीतिक निहितार्थों के कारण वहां के छात्रों के साथ आंखें नहीं मिलाते, भी खुलेआम उनके समर्थन में आ गए हैं, जो छात्र समुदाय की एकजुटता के बारे में बताता है, जिससे कई मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद बड़े पैमाने पर उनके लिए सहानुभूति का प्रसार हुआ है।

ऐसे में, सत्ता में बैठे लोगों के लिए सलाह यही होगी कि वे चल रहे प्रदर्शनों को खारिज न करें, कहीं ऐसा न हो कि वे राष्ट्रीय संकट में रूपांतरित हो जाएं। निश्चित रूप से इन प्रदर्शनों को समझदारी, सहयोग और सामंजस्य की भावना के साथ गैर-पारंपरिक ढंग से और बिना भेदभाव के देखा जाना चाहिए। जामिया और जेएनयू के हालिया घटनाक्रमों की निष्पक्ष और समग्र जांच के लिए उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में दिल्ली से बाहर के तीन सेवानिवृत्त कुलपतियों की एक कमेटी के गठन की घोषणा का क्या हुआ?

पूरा समाज इतना विभाजित, ध्रुवीकृत और अविश्वास से भरा हुआ लगता है कि कहीं होने वाली सामान्य बातचीत भी तुरंत 'उनके खिलाफ हम' की कहानी में बदल जाती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष के समर्थक अपनी-अपनी बात को पूर्ण सत्य और दूसरे की बात को निराधार बताते हैं। अफसोस कि विश्वविद्यालय के अधिकारी और पुलिस इतने पक्षपाती हैं कि कोई उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं है।

हम इतने कुटिल क्यों हो गए हैं कि बेहद स्पष्ट बात पर सवाल उठाया जाता है? हिंसा हिंसा है, इसकी चौतरफा निंदा क्यों नहीं होनी चाहिए और अपराधियों को न्याय के समक्ष क्यों नहीं लाया जाना चाहिए, चाहे उनकी राजनीतिक संबद्धता जो भी हो? जामिया में बिना अनुमति के पुलिस का प्रवेश और छात्रों के कमरे में आंसू गैस का इस्तेमाल अक्षम्य था। इसे माफ नहीं किया जा सकता। सत्ताधारी दल और उसके प्रतिद्वंद्वियों के बीच हिंसा की हर घटना को छद्म संघर्ष के रूप में क्यों देखा जाता है? सरकार को न केवल पवित्र होना चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए। जब हम लोगों से पारदर्शी होने का आग्रह करते हैं, तब सत्ता प्रतिष्ठान को सबसे पहले उदाहरण स्थापित करना चाहिए। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और अन्य जगहों पर कई मामलों में पुलिस ने पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की है।

केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि कई शिक्षाविद, विद्वान, लोकसेवक, सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि और मीडिया भी उन लोगों के पक्ष में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं, जिनका वे समर्थन करना चाहते हैं। हर तथ्य को अलग-अलग तरह से पेश किया जाता है। हम पोस्ट ट्रूथ के जमाने में रह रहे हैं। क्या सच परिवर्तनीय है? किसका सच? मेरा? आपका? हम चर्चा या बहस से क्यों भागते हैं? क्या हम दिल में असुरक्षित नहीं हैं? हम जो कुछ भी कर और कह रहे हैं, अगर वह सही है, तो हमारे पास अपने तर्कों के बल पर अपने आलोचकों को चुप कराने का साहस क्यों नहीं होना चाहिए?

लेफ्ट (वाम) इतना गंदा शब्द क्यों होना चाहिए? दुनिया भर में भारत अकेला ऐसा देश है, जहां आजादी के बाद से ही वामपंथी राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेती रही हैं, और यहां तक कि इन्होंने चुनाव जीतकर सरकार भी बनाई है। जेएनयू या किसी अन्य विश्वविद्यालय में छात्रों को सिर्फ इसलिए क्यों खतरा बताना चाहिए कि वे वामपंथी विचारों से प्रभावित हैं? क्या यह असांविधानिक है? क्यों एक उत्कृष्ट विश्वविद्यालय को, जिसने एक नोबेल पुरस्कार विजेता, दो वित्त मंत्री, एक विदेश मंत्री और प्रो. राजमोहन जैसे कई प्रतिष्ठित शिक्षाविद दिए, सिर्फ इसलिए नुकसान पहुंचाना चाहिए कि वहां कुछ छात्रों ने संभवतः राष्ट्रविरोधी नारे लगाए होंगे? ऐसा जिसने किया है, उनकी पहचान करें और देश के कानून के मुताबिक पारदर्शी तरीके से उन पर मुकदमा चलाएं और उन्हें उपलब्ध हर कानूनी सहायता का लाभ लेने दें, लेकिन पूरे विश्वविद्यालय को तो बर्बाद मत करें!

छात्र आंदोलन कोई नई बात नहीं है। 1967 में जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश सहित 17 राज्यों में चुनाव हार गई थी, तब विश्वविद्यालय उबल रहे थे। अपने गृह नगर इलाहाबाद में, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को बोलने नहीं दिया गया था, उन्हें सुरक्षाकर्मियों द्वारा पिछले दरवाजे से बाहर ले जाया गया। फिर भी विश्वविद्यालय के छात्रसंघ की उच्च प्रतिष्ठा बनी रही और अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, मीनू मसानी, राम मनोहर लोहिया जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने इसके कार्यक्रम में भाषण देने को अपना सम्मान समझा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने दो प्रधानमंत्री, कई केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उत्कृष्ट लोकसेवक राष्ट्र को दिए। क्यों? क्योंकि इसके शिक्षकों और छात्रों ने सभी मौजूदा और समकालीन मुद्दों पर गंभीर चर्चा और बहस में हिस्सा लिया। बौद्धिक बहस की लौ जलते रहने देना चाहिए। असहमतिपूर्ण आवाजों को दबाना नहीं चाहिए। लोकतंत्र के लिए वे जरूरी हैं। उन्हें अपने तर्कों से ही आप चुप करा सकते हैं। यही सही भारतीय तरीका है।
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