यह आपकी राजनीति का दौर है!

पत्रलेखा चटर्जी Updated Sat, 14 Dec 2013 09:05 PM IST
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this is the age of your politics!
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जिस वक्त मैं यह कॉलम लिख रही हूं, दिल्ली में सिर्फ एक ही चर्चा है कि आखिर आम आदमी पार्टी (आप) का अगला कदम क्या होगा? कांग्रेस की तरफ से बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा के बाद क्या 'आप' राजधानी में सरकार बनाने की हिम्मत जुटा पाएगी या नहीं।
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वैसे 'आप' शुरू से कहती आई है कि वह दिल्ली में तभी सरकार बनाएगी जब उसे बहुमत प्राप्त होगा। लेकिन नतीजों के बाद राजधानी में उठापटक बरकरार है। एक महीने पहले तक आप को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। दिल्ली में स्थापित दोनों पार्टियां यानी भाजपा और कांग्रेस, भ्रष्टाचार विरोधी इस पार्टी को खारिज कर रही थीं। कहा जा रहा था कि आप के नेता वास्तविकता से परे और हद दर्जे तक पाखंडी हैं।
नवंबर के आखिर तक 15 साल से दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित भी केजरीवाल को खारिज करते हुए अप्रासंगिक बताती रहीं। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में 'आप' की शानदार जीत और अरविंद केजरीवाल द्वारा शीला दीक्षित को हराने के बाद सब कुछ बदल गया। 'आप' का कमजोर चुनाव चिह्न झाड़ू अचानक बेहद ताकतवर नजर आने लगा। अब कांग्रेस और भाजपा दोनों दिल्ली में 'आप' को सरकार बनाने की सलाह दे रहे हैं। पिछले शुक्रवार को एक राष्ट्रीय टीवी चैनल ने इस पर बहस की क्या 'आप' के नेता अरविंद केजरीवाल राजनीतिक वर्ग में द इंडियन ऑफ द ईयर हैं?
आने वाले दिनों में 'आप' को गुलदस्तों के साथ-साथ पत्थरों का भी सामना करना पड़ेगा। वैसे यह तो वक्त ही बताएगा कि क्या 'आप' अपने वायदों को पूरा कर पाएगी और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहेगी? कौन जानता है कि क्या संभव है?

वैसे केजरीवाल के उभार के बीच बड़े संदेश के गुम हो जाने और पार्टी के हर कदम की जबरदस्त मीडिया कवरेज के अपने खतरे भी हैं।

'आप' की जीत किसी राजनीतिक दल की जीत नहीं है बल्कि यह उस आम जन की विजय है जिसमें यह कहने की हिम्मत आ गई है कि हर बात की एक हद होती है।
 
जैसा कि केजरीवाल ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा, 'आप' महत्वपूर्ण नहीं है। आम आदमी महत्वपूर्ण है।' आप की शानदार जीत मौजूदा भारतीय राजनीति में एक बदलाव का क्षण है। यह एक अलग तरह का चुनाव था, जिसमें नई और अनुभवहीन पार्टी ने दूसरी अन्य पार्टियों की तरह धन बल और जाति व धर्म की राजनीति किए बगैर शानदार कामयाबी हासिल की।
 
'आप' की जीत भारत में शहरी वर्ग की जागरूकता का संकेत है। यह सच है कि जो कुछ दिल्ली में हुआ जरूरी नहीं है कि दूसरे शहरों में भी वैसा ही हो। स्थापित पार्टियों के खिलाफ शहरी इलाकों में असंतोष और मोहभंग की स्थिति सिर्फ दिल्ली की बात नहीं है। अगर केजरीवाल और 'आप' आने वाले दिनों में नाकाम साबित होती है, तो यह आम इनसान के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।

अब तक, माना जा रहा है कि 'आप' शहरी इलाकों में ही लोगों को लुभाने में कामयाब रहेगी। लेकिन अन्य पार्टियां इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं कि देश में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश की 31.2 फीसदी आबादी शहरों और कस्बों में निवास कर रही है, जबकि 2001 में यह आंकड़ा 27.8 फीसदी  और 1991 में 25.5 फीसदी था। नागरिक समूह शहरी इलाकों में पहले से ही अहम भूमिका निभा रहे हैं। दक्षिण दिल्ली में हम 'सिटिजन्स एलायंस' का अभ्युदय देख सकते हैं।

इसकी शुरुआत मॉल को रोको अभियान के साथ हुई थी, जिसकी वजह से ट्रैफिक व्यवस्था बाधित होती और यह एक स्कूल के बगल में खुलने जा रहा था। महीनों तक सिटिजन्स एलायंस के सदस्य संबंधित सरकारी विभागों और उच्च स्तर के प्रशासनिक विभागों के चक्कर काटते रहे। यहां पर उनके अभियान में कुछ बाधाएं डाली गईं।

इसके बाद वे इस मुद्दे को दिल्ली उच्च न्यायालय लेकर गए, जहां यह मामला चल रहा है। यह गठबंधन समर्पण और प्रतिबद्धता से बढ़कर था। इसके नेता मीडिया के जानकार थे। इससे संबंधित कई आलेख बड़े समाचार पत्रों में छपे। इसके अलावा फेसबुक पर भी अभियान चला। एक मॉल के खिलाफ शहरी मध्य वर्ग की तरफ से यह शायद भारत का पहला संगठित अभियान है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान इस गठबंधन ने वहां के स्थानीय लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से अभियान चलाया। शासन की नाकामी के चलते देश के कई शहरों में नागरिक समाज तेजी से उभर रहा है। उनका उद्देश्य है, स्वतंत्र तरीके से निगरानी करना और समाज से जुड़े मुद्दों को पूरी ताकत के साथ उठाना, चाहे कोई सत्ता में हो।

देश में दशकों से बहस हो रही है कि स्वैच्छिक आंदोलन करने वालों को राजनीति में आना चाहिए या नहीं। कई बार यह बहस बेहद चरम पर पहुंच जाती है और समूह टूट जाते हैं। इसी बहस के कारण अन्ना हजारे की अगुवाई वाला भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी टूटा। वैसे इस तरह की बहस चलती रहनी चाहिए। हमें हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर आने वाले वक्त में वैकल्पिक राजनीति के पटल पर एक से ज्यादा खिलाड़ी ताल ठोंकते नजर आएं।  शहरी लोगों के लिए अच्छी खबर यह है कि उदासीनता की दीवारें टूट रही हैं।
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