उखड़ते पेड़, उजड़ते लोग

महेश परिमल, व्यंग्यकार Updated Sat, 27 Jun 2020 12:41 AM IST
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धीमे किंतु सधे कदमों से बारिश ने अपनी आमद की सूचना दे ही दी। लोगों को तपिश से राहत मिली। उमस अभी बरकरार है। वह इतनी जल्दी पीछा भी नहीं छोड़ेगी। बिल्कुल कोरोना की तरह। कोरोना को हमने मेहमान माना था। सोचा, कुछ दिन रहकर चला जाएगा। पर यह गया नहीं, अब शहर से गांवों तक पहुंच गया है।
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गांव उसे रास आने लगा है। इधर बारिश का पहला कदम क्या पड़ा, कई शहरों के पेड़ धराशायी हो गए। कोई 100 बरस पुराना, तो कोई 70 बरस पुराना। तेज हवाओं ने उन मजबूत पेड़ों को जमीन सूंघा दी। जिनकी जड़ें जमीन पर हों, वे जमीन पर ही गिर जाएं, इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है।
आज इंसान की भी यही हालत है। वह हवा में ही उड़ रहा था। उसकी नजर में गरीब तो मरने के लिए ही होते हैं। इस सोच में रहकर वह यही भूल गया कि उसकी जड़ें भी जमीन पर हैं। आखिरकार कोरोना ने उसे बता दिया कि सब कुछ यहीं रह जाना है। जो इस मुगालते में थे कि उनके बिना ऑफिस का काम एक मिनट भी नहीं चल सकता, वे आज हाशिये पर आकर अपने ऑफिस को दूर से ही देख रहे हैं।
इधर शहर-गांवों में पेड़ उखड़ रहे हैं। उधर दंभी इंसान उजड़ रहा है। आखिर क्या है यह उखड़ना और उजड़ना? दोनों में ही जीवन का विराम है। दोनों में ही जड़ों से दूर होने की बात है। पेड़ इसलिए उखड़ रहे हैं कि उनके आसपास का हिस्सा कंकरीट का होने लगा है। उन्हें पोषक तत्व नहीं मिल रहे।

शहरी जमीन में वैसे भी पोषक तत्व होते कहां हैं? सिमटती जड़ें ये बता रही हैं कि इंसान अपने संस्कार से दूर होकर पेड़ों के आसपास  वायवीय ताना-बाना बुनने लगा है। इसलिए पेड़ों का सिंचन नहीं हो पा रहा। जब पेड़ों के ये हाल हैं, तो फिर इंसान के सिंचन का आधार क्या होगा? प्रकृति का दोहन करना कोई उससे सीखे। वह प्राणवायु खरीदने को तो तैयार है, पर एक पेड़ की सुरक्षा का वचन नहीं दे सकता।

अब पेड़ उखड़ रहे हैं, तो लोग उजड़ेंगे ही। पेड़ हमारे पूर्वजों की निशानी ही हैं। उन्हें हम पूर्वजों का पराक्रम भी कह सकते हैं। हमारा पराक्रम यह है कि हमने बेतहाशा पेड़ों की कटाई तो की है, पर उस स्थान पर नए पौधे को रोपने की जहमत नहीं उठाई। विकास की जब भी बात होती है, तो पेड़ों को हटाने की बात उससे पहले हो जाती है।

यह धारणा बिल्कुल ही बेबुनियाद है कि विकास के रास्ते पर पेड़ अवरोध हैं। ऐसा केवल वे लोग ही सोचते हैं, जो एसी-कूलर की हवा में पले-बढ़े हैं। उनका लालन-पालन पेड़ों की हवाओं ने नहीं, बल्कि वातानुकूलित संयंत्रों ने किया है। पेड़ निरपेक्ष भाव से अपना काम करते रहते हैं, बिना किसी शोर-शराबे के प्रचार-प्रसार से दूर होकर।

अपनी बेशुमार दौलत देकर भी कोई इंसान एक पेड़ द्वारा दी जाने वाली ऑक्सीजन की कीमत अदा नहीं कर सकता। दुख तो तब होता है, जब अपने जीवन में एक ठूंठ भी न बोनेवाला इंसान मरने पर चार टन लकड़ी खा जाता है।

वास्तव में पेड़ नहीं, इंसान ही उखड़ रहा है। अपने उजड़े चमन को संवारने के लिए वह पेड़ों को निशाना बना रहा है। इंसान के भीतर का रेगिस्तान अब पूरी तरह से बाहर आ गया है। पेड़ नहीं बच पाए, इसलिए चट्टान अपना स्वरूप खोने लगी। वह धीरे-धीरे सिमटने लगी। उसका यह सिमटना रेत के रूप में होने लगा।

उसके इस संकुचन के रूप में बाहर आई रेत को हम अपने भवन निर्माण में इस्तेमाल करने लगे। भवन मजबूत हुआ, पर हम कमजोर हो गए। पक्के घरों में रहने वाले कमजोर लोग यह नहीं सोच पाते कि पेड़ों को काटकर हम पक्षियों का नुकसान कर रहे हैं। उन्हें उनके आब-ओ-दाने से महरूम कर रहे हैं।

उनका घरौंदा तोड़ रहे हैं। शहरों में कई पेड़ ऐसे हैं, जो अब हांफ रहे हैं। प्राणवायु देने वाले को अब प्राणवायु की आवश्यकता है। वे भीतर से टूट रहे हैं, छीज रहे हैं, उनका तन-मन झुलस रहा है। वे जीना चाहते हैं, पर उनके सीने पर कंकरीट का जंगल उग आया है।

उनके पांवों से पसीना और चेहरे से खून निकलने लगा है। वे पेड़ कुछ कहना चाहते हैं इस मानव जाति से। कौन है, जो सुनेगा उनकी गुहार? कहीं ये गुहार चीत्कार न बन जाए, इसलिए हमें ही चेतना होगा। हमें ही सुननी होगी उन अनसुनी चीखों को, जो हमारे आसपास गूंज रही हैं।
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