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विचारों के पत्थर, पत्थरों के हाट

sachin yadavसचिन यादव Updated Mon, 23 Dec 2013 01:52 PM IST
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आडवाणी जी को यह निगलते हुए तकलीफ हो रही है कि मोदी की वजह से भाजपा की दुकान चल निकली है।
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मणिशंकर अय्यर ने फरमाया है कि मनमोहन सिंह को लीडरी से हटाओ तो कांग्रेस का बेड़ा पार हो। अन्ना हजारे का अनशन अब रालेगण से शुरू है और जीते हुए केजरीवाल पर वी.के. सिंह खीज रहे हैं। सलमान खुर्शीद सोनिया को देश की मां बता रहे हैं। वैचारिक पत्थरों का हाट लगा हुआ है।
‘क्या सुंदर दृश्य है!’ कवि ने कहा, ‘मैंने आडवाणीजी जैसा सेक्युलर नहीं देखा। और, अय्यरजी ने सौ बात की एक बात कही है। मनमोहन सिंह के उदारवाद ने देश के गरीबों का जीना मुहाल कर दिया है। वी.के. सिंह भी ठीक ही हैं, केजरीवाल ने तो अन्ना की सवारी करके अपना काम कर लिया। अब तय है कि सोनिया-राहुल ही देश बचा सकते हैं।’
मैंने कहा, ‘अन्ना को दिल्ली कौन लाया था?’

उन्होंने कहा, ‘उससे क्या फर्क पड़ता है?’
‘मनमोहन क्या अपनी मर्जी से मंत्री बना सकते हैं, सरकार चलाते हैं या खुद तय करते हैं कि राहुल भैया कौन से कागज कहां फाड़ें?’
‘यह पूछना बेकार की बात है।’ उन्होंने वैचारिक हाट से एक मोटा पत्थर उठाया।

‘जब सलमान खुर्शीद ने कहा कि सोनियाजी पूरे देश की मां हैं, तो आपने अपनी ‘मां’ वाली कविता उन्हें समर्पित करने के लिए क्या विचार किया?’

कवि ने घूर कर देखा। कवि के कविता संग्रह में मां पर सुंदर कविताएं थीं। पर कहते हैं, उनकी मां वृद्धाश्रम चली गईं ताकि कविताओं के पीछे खड़े व्यक्ति के प्रहारों से बच सकें। यह उनकी दुखती-रग थी। ठीक वैसे जैसे कांग्रेस को कहो कि जब जीत का मजा गांधी के खाते में तो हार का ठीकरा किसी और माथे पर क्यों, तो वह राष्ट्रगीत गाने लगती है।
‘आप सोचते हैं, मैंने मां पर कविताएं आत्मा से नहीं सिर्फ कला-कौशल से लिखी हैं?’

‘नहीं, मैंने तो इतना कहा कि मां की कविता अापने सलमान खुर्शीद के सद्विचारों के अनुरूप सोनिया जी को समर्पित करने का विचार किया या नहीं?’

वे मौन हो गए। वैचारिक पत्थरों के हाट में, कई पत्थर भारी दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी सिफत होती है कि पानी में तैरते हैं। कुछ चमक कर और कुछ ताबीज में रख कर बांधे जाने लायक होते हैं। अंगूठियों में भी ये पत्थर लगते हैं और बाजीगरों के हाथों बिकते हैं। वे बाजीगर दिख रहे थे और क्रांतिधर्मी भी!

कवि ज्योतिषी भी थे। विचार की अंगूठियां बेचने के विकट धंधे में। बोले, ‘सोनिया-राहुल तो समझदार हैं, ईमानदार हैं, मंडली ने नाव में छेद कर दिया है। मैं देख रहा हूं कि इन्हें चांदी का चंद्रमा धारण करके, अगले चुनाव में उतारना चाहिए।’

‘चांदी का चंद्रमा राहुल पहनें या मंडली?’
‘जो राहुल पहनें, वही मंडली पहनेगी।’
‘फिर अगर कांग्रेस जीत गई, तो मंडली का प्रताप होगा या राहुल का? या फिर चंद्रमा का?’
‘जाहिर है, राहुल का।’
‘और हार गई तो?’
‘मंडली के ग्रहों का!’
‘और चंद्रमा का क्या?’
‘उसके लिए गहरे में जाना पड़ेगा।’

मैंने कवि को आसन दिया। धूप-बत्ती लगाई और पंचांग हाथ में देकर कहा, 'मंडली के ग्रह चेक कर लीजिए। ताकि उस हिसाब से राहुल जी साथ वालों को चुनें। चंद्रमा भी ठीक रहे और गहरे में भी न जाना पड़े। देश की कांग्रेस का सवाल है।'

उन्होंने पंचांग पर तीन कविता संग्रह रखे। तीनों के कवर पर क्रांतिकारी पेंटिंग थीं। तीनों पर हंसिए जैसा चांद बना था। तीनों की पृष्ठभूमि में कुछ चांदी-सी फैली हुई थी।

‘क्या आप नहीं देख रहे कि मैंने सर्वहारा के लिए इन कविताओं में कितना सुंदर स्वप्न देखा है।’

‘बिल्कुल! आपके आखिरी कविता संग्रह के स्वप्निल विमोचन के वक्त मैं मौजूद था। जिन बिल्डर महोदय ने उस दिन का भोज दिया था, वे आजकल फरारी में चल रहे हैं।’

‘आप का मुझे डराने का यह तरीका पिट गया है। मैंने कविता लिख दी। किसी ने भोज दे दिया। मैं अमेरिका की आजादी भोगकर, वहां की लैब में सीखकर, यदि भारत में बम बना डालूं तो इससे अमेरिका क्रांतिकारी थोड़े ही कहलाएगा।’

मुझे लगा, वे विषय को फिर से अमेरिका, साम्राज्यवाद, सर्वहारा, विकल्प तथा सेकुलर बनाम कॉरपोरेट के इलाके में ले जाना चाहते हैं। उन्हें देश की मां का सलमान खुर्शीद-विचार इतना उद्वेलित नहीं कर रहा, जितना कविता का वैचारिक पत्थर! वे एक ही पत्थर को गुलेल में फेंकने लायक विचार भी बताना चाहते हैं और अंगूठी में जड़कर पहनने की तरकीब का सौदा भी करना चाहते हैं।

मैंने निवेदन किया, ‘आप गुलेल, विचार और पत्थरों के व्यवसाय में तो नहीं दिखाई देते थे। क्या कांग्रेस की गति से आपकी रणनीति बदल गई है?’

‘मैं रणनीति कभी नहीं बदलता। हाथों और गुलेलों के बीच जो पत्थर होते हैं, उन्हें सप्लाई करता हूं। विचार के पत्थरों के हाट में, अपनी दुकान फिक्स है। या यों कहिए कि हर दुकान पर अपनी ही सप्लाई है, बस दुकान का नाम और नंबर अलग है।’

इसके बाद उन्होंने पत्थरों की किस्मों, उनमें निकलने वाली किरणों, उनसे लगने वाली चोटों तथा चोटों के लिए उपयुक्त मरहम तक पर लंबा प्रवचन किया।

प्रवचन का निष्कर्ष था - दस जनपथ नश्वर है। विचारों के पत्थरों का हाट सदैव मुनाफे में रहता है। मां को कविताएं समर्पित करनी चाहिए। और, कविताओं के बाद असली मां को वृद्धाश्रम भेज देना चाहिए।

अगले लोकसभा चुनाव में कवि ‘कॉरपोरेट कम्युनिज्म और मां का सिद्धांत’ विषय पर किताब लिखकर गद्य के क्षेत्र में हंगामा मचाने जा रहे हैं।

विमोचन का भोज देने वाला नतीजों के हिसाब से तय होगा।
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