‘अमित शाह बनाम केजरीवाल मॉडल’ से बहुत बड़ी है कोरोना की लड़ाई, सिसोदिया ने गृहमंत्री से दखल देने की अपील की

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 24 Jun 2020 04:01 PM IST
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Home Minister Amit Shah and Delhi CM Arvind Kejriwal
Home Minister Amit Shah and Delhi CM Arvind Kejriwal - फोटो : PTI (File)

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सार

  • केंद्र की व्यवस्था के अनुसार, हर कोरोना मरीज को सेंटर पर जाकर टेस्ट कराने की अनिवार्यता
  • डॉक्टर तय करेंगे कि मरीज होम आइसोलेशन में रहेगा या क्वारंटीन सेंटर में             
  • दिल्ली सरकार का पक्ष, इस तरीके से सेंटरों पर लग रही भारीभीड़, सबके ले जाना अव्यावहारिक
  • दिल्ली ने गृहमंत्री अमित शाह को बुधवार को पत्र लिखकर इस व्यवस्था को बदलने की मांग की  

विस्तार

मनीष सिसोदिया ने अमित शाह को पत्र लिखकर दिल्ली में वर्तमान कोरोना जांच व्यवस्था को बदलने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि वर्तमान व्यवस्था से मरीजों को कोरोना सेंटरों तक ले जाने और जांच कराने से भारी अव्यवस्था पैदा हो रही है, यह अव्यावहारिक है, इसलिए वे इस मामले में तुरंत दखल देकर इस व्यवस्था को बदलने में मदद करें।

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सिसोदिया ने कहा कि यह समय अहम की लड़ाई का नहीं है। अमित शाह मॉडल बनाम अरविंद केजरीवाल मॉडल की लड़ाई में उलझे बिना उस व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए जो लोगों के हित में हो क्योंकि यह कोरोना से यह लड़ाई सबसे ऊपर है।

क्या था दिल्ली सरकार का मॉडल

शुरुआत में दिल्ली के किसी भी व्यक्ति के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर दिल्ली सरकार की एक मेडिकल टीम उसके घर पर जांच करने के लिए जाती थी। डॉक्टरों की जांच के बाद मरीज की स्थिति तय की जाती थी।
अगर व्यक्ति के पास होम आइसोलेशन में बिल्कुल अलग रहने की उचित व्यवस्था है और मरीज कम गंभीर है, तो उसे होम आइसोलेशन में रखा जाता था।

लेकिन अगर मरीज की स्थिति गंभीर प्रकृति की होती थी, तो उसे अस्पताल या क्वारंटीन सेंटरों को भेज दिया जाता था।

अब बन गई यह व्यवस्था

दिल्ली मॉडल को इंकार करते हुए उपराज्यपाल ने सभी मरीजों को न्यूनतम पांच दिन संस्थागत क्वारंटीन सेंटरों में रखने की व्यवस्था बनाई। लेकिन दिल्ली सरकार ने इस तरह कोरोना बेड्स की बेहद कमी होने की सोच के आधार पर विरोध किया।

इसके बाद अमित शाह के निर्देश पर इस व्यवस्था को रद्द कर दिया गया।

लेकिन इसके बाद नई व्यवस्था यह बनी कि अब हर कोरोना पॉजिटिव मरीज को कोरोना सेंटरों पर जाना अनिवार्य कर दिया गया। वहां जांच के बाद डॉक्टरों की टीम मरीज में बीमारी की गंभीरता को तय कर रही है।

कम गंभीर लक्षण पाए जाने के बाद अगर मरीज के घर पर न्यूनतम दो कमरे का मकान और अलग टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध है, तो उसे होम आइसोलेशन में रहने की सलाह दी जा रही है।

लेकिन जिन मरीजों में कोरोना संक्रमण गंभीर स्थिति में है या जिनके पास घर पर अलग रहने की उचित व्यवस्था नहीं है, उन्हें जरूरत के अनुसार क्वारंटीन सेंटर या अस्पताल में भेजा जा रहा है।

इस व्यवस्था पर आपत्ति क्यों?

दरअसल, दिल्ली में इस समय तीन से चार हजार मरीज रोज सामने आ रहे हैं। जबकि दिल्ली सरकार के पास इस समय केवल 465 एम्बूलेंस हैं। इस तरह हर एम्बूलेंस को औसतन सात से आठ मरीज को उसके घर से सेंटर तक लाना, टेस्टिंग कराना और फिर उन्हें घर छोड़ना पड़ रहा है।

सेंटरों पर जांच में भी देरी हो रही है, जिसके कारण वहां भीड़ बढ़ रही है और अनावश्यक ढंग से संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है।

व्यावहारिक रूप से सबको लाना-ले जाना संभव नहीं हो पा रहा है। कई जगहों पर मरीजों को बसों के जरिये लाया, ले जाया जा रहा है। मरीजों को होम आइसोलेशन में रखने के मुद्दे पर भी विवाद है।

सिसोदिया का आरोप

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि इसके पहले भी सभी मरीजों को पांच दिन अनिवार्य तौर पर संस्थागत क्वारंटीन करने का निर्णय लिया गया था।

अमित शाह की दखल के बाद इस व्यवस्था को वापस लिया गया। उसी तर्ज पर अब इस नई व्यवस्था को भी वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि इससे अव्यवस्था उत्पन्न हो रही है।

सिसोदिया का आरोप है कि इस मामले को सुलझाने के लिए वे दो दिन से राज्य आपदा नियंत्रण विभाग की मीटिंग बुलाये जाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी हर अपील के बाद अब तक मीटिंग नहीं बुलाई गई।

इसके बाद उन्होंने एलजी को पत्र लिखा, लेकिन उसका भी कोई जवाब नहीं आया। अब उन्होंने पत्र लिखकर अमित शाह से इस मामले में दखल देने की मांग की है।

विशेषज्ञ ने कहा

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारी डॉक्टर एसके पोद्दार ने कहा कि कोरोना संक्रमण की स्थिति, इसकी गंभीरता और उपलब्ध संसाधन को देखते हुए दिल्ली सरकार का निर्णय बिलकुल सही है।

अगर सबको संस्थागत क्वारंटीन किया जाता है, तो मामले बढ़ने पर सबको बेड देना असंभव हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इसकी आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि लक्षणहीन मरीजों या माइल्ड कैटेगरी के मरीजों को इसकी आवश्यकता भी नहीं है।

 

 
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