मंजिलें और भी हैंः कंधे की चोट भी मेडल जीतने से नहीं रोक सकी

शरत गायकवाड Updated Tue, 22 Oct 2019 05:07 AM IST
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शरत गायकवाड
शरत गायकवाड - फोटो : Amar Ujala

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मैं जन्म से एक हाथ से दिव्यांग हूं। इसके बावजूद मैंने कक्षा चार से ही तैराकी सीखना शुरू कर दिया। मैं बंगलूरू का रहने वाला हूं। मेरे स्कूल मेंतैराकी प्रशिक्षण को अनिवार्य कर दिया गया था। स्कूल के दिनों में जब मैंने तैराकी की कक्षाओं में जाना शुरू किया, तो मेरे माता-पिता मेरी दिव्यांगता को लेकर आशंकित थे। लेकिन प्रिंसिपल द्वारा लगातार आश्वासन दिए जाने के बाद, उन्होंने अनुमति दी दिव्यांग होने की वजह से किसी को नहीं लगता था कि मैं खेल में अपना करियर बनाऊंगा।
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वर्ष 2003 में, मैं स्कूल की एक प्रतियोगिता में भाग ले रहा था। उसी दौरान ट्रेनर जॉन क्रिस्टोफर ने मुझे तैराकी करते हुए देखा। प्रतियोगिता खत्म होने के बाद वह मुझसे मिले और तैराकी में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया। हालांकि मुझे तब तक पता नहीं था कि मैं कैसे कर पाऊंगा। पर मैंने अपनी तरफ से हमेशा अच्छा करने की कोशिश की, जिससे मेरे माता-पिता और शिक्षकों ने इसे जारी रखने के लिए मुझे प्रोत्साहित किया।
इसके बाद मैंने जॉन से तैराकी की एडवांस्ड कक्षाओं में प्रशिक्षण लेना शुरू किया और तैराकी की कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। कई प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीतने के बाद जब मैंने हाई स्कूल में दाखिला लिया, तो वहां मुझे फीस में रियायत दी गई और प्रशिक्षण के लिए कक्षाओं में छूट भी। तैराकी में करियर के तौर पर मेरे प्रेरणास्रोत ऑस्ट्रेलियाई तैराक इयान थोर्प हैं, जिन्होंने पांच ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते हैं। स्कूल के दिनों से ही मैं सकारात्मक रहता था। मैंने कभी अपनी शारीरिक अक्षमता को अपने सपनों के रास्ते में नहीं आने दिया। एक बच्चे के रूप में, मैंने प्रशिक्षण के दौरान शारीरिक, मानसिक रूप से कई परेशानियों का सामना किया। लेकिन नियमित अभ्यास करने पर, उन कठिनाइयों को पार कर लिया।
मुझे अपनी दिव्यांगता से कोई समस्या नहीं है। वर्ष, 2014 में दक्षिण कोरिया के इंचियोन में एशियाई पैरा-गेम्स के दौरान कंधे की चोट के कारण मुझे लगा कि अब खेल छोड़कर रिटायर हो जाना चाहिए। लेकिन शुक्र है कि उसी दौरान राहुल द्रविड़ के साथ एक उत्साहजनक और लंबी बातचीत हुई। उनके प्रोत्साहन ने मुझे नया जोश दिया। इसके बाद मैंने अपना खेल जारी रखा और उस प्रतियोगिता में मैंने छह पदक जीते। इससे पहले पीटी उषा ने एशियाई खेलों, 1986 में पांच पदक जीते थे। बाद में भी ई-मेल के माध्यम से उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया।

अब मैं एक गैर-लाभकारी संगठन, ब्लोफिन फाउंडेशन के साथ मिलकर काम कर रहा हूं। इस फाउंडेशन के माध्यम से हम विशेषत: दिव्यांग बच्चों, जो खेलकूद के लिए उत्सुक हैं, के बीच पैरा खेलों को अपनाने और उसमें करियर के अवसरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अब हर सुबह और शाम, मैं दक्षिण बंगलूरू के एक प्रशिक्षण केंद्र पर बच्चों को तैराकी का प्रशिक्षण देता हूं। मुझे स्विमिंग पूल में छोटे बच्चों के साथ खेलना अच्छा लगता है। मैं अपने जीवन को अपनी तरह से जीने के लिए हमेशा स्वतंत्र रहा हूं।

मैंने कभी यह नहीं सोचा कि मैं अपनी शारीरिक सीमाओं के कारण अपने दम पर कुछ नहीं कर सकता। मैं हमेशा अपने छात्रों को यह बताता हूं कि चाहे आप दौड़ में जीतें या हारें, केवल एक चीज मायने रखती है, वह यह है कि आपने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया या नहीं। यदि आपने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है, तो अगली बार और बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करें। इसके अलावा, मानसिक रूप से मजबूत और किसी भी परिस्थिति में शांत रहना चाहिए।

(अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित पैरा-खिलाड़ी के विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
 
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