Web Series Review: रुस्तम के नजदीक भी नहीं फटक पाई वेब सीरीज द वर्डिक्ट

एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 29 Sep 2019 02:52 PM IST
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the verdict state vs nanavati - फोटो : social media

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डिजिटल रिव्यू: द वर्डिक्ट: स्टेट वर्सेस नानावती (वेब सीरीज)
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सृजक: एकता कपूर
कलाकार: मानव कौल, सुमीत व्यास, कुबरा सैत, एली अवराम, अंगद बेदी, सौरभ शुक्ला, स्वानंद किरकिरे, मकरंद देशपांडे आदि।
ओटीटी: जी5
रेटिंग: **


भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 1959 ऐसा साल बना जिसने देश को एक ऐसा विवादित केस दिया जिसकी चर्चा आज तक की जाती है। इस केस का नाम है नानावती बनाम महाराष्ट्र सरकार। इस केस में आए फैसले ने पूरे देश को अंचभित कर दिया था। इस केस के बाद भारतीय न्यायपालिका से जूरी सिस्टम को खत्म कर दिया गया था।

इस केस को अब तक कई बार स्क्रीन पर दिखाया जा चुका है। अक्षय कुमार की फिल्म रुस्तम भी इसी पर आधारित थी जिसे दर्शकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। अब इस केस पर आल्ट बालाजी और जी 5 एक नई वेब सीरीज लेकर आए हैं, नाम है द वर्डिक्ट-स्टेट वर्सेस नानावती।

वेब सीरीज द वर्डिक्ट-स्टेट वर्सेस नानावती की कहानी भी असल केस से काफी नजदीक रखी गई है। पूरी कहानी एक पारसी नौसेना अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमती है। रक्षा मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सभी उसकी काबिलियत से वाकिफ हैं हालांकि निजी जिंदगी में वह मात खा जाता है। एक दिन जब वह अचानक घर पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी किसी दूसरे व्यक्ति से प्यार करने लगी है। नानावती को यह बात रास नहीं आती है। वह सीधे अपनी पत्नी के प्रेमी के घर पहुंचता है और उसकी हत्या कर देता है। इस हत्या के बाद वह छुपता नहीं है बल्कि समर्पण कर देता है।

पहली नजर में देखने से सभी को यह एक ओपन एंड शट केस लगता है लेकिन धीरे-धीरे नानावती के समर्थन में सेना, मीडिया और सरकार से लेकर आम लोग तक आ जाते हैं जिसके बाद केस रोचक मोड़ ले लेता है। वेब सीरीज द वर्डिक्ट-स्टेट वर्सेस नानावती की सबसे कमजोर कड़ी है इसकी पटकथा और 10 एपीसोड तक फैली इसकी कहानी। सीरीज पहले एपीसोड में अपनी लचर पटकथा के चलते ही औंधे मुंह गिर जाती है। दर्शकों को अगर नानावती केस के बारे में पता नहीं है तो ये वेब सीरीज उसके नजरिए को ध्यान में नहीं रखती है। संवाद औसत हैं और इनकी अदायगी भी साधारण।

अदाकारी देखकर लगता है कि इसके कलाकार बस एक और वेब सीरीज निपटा देने भर के मूड में हैं। निर्देशक भी कहीं से सीन को जमाने की कोशिश करने की कोशिश में नहीं दिखते। मानव कौल, सुमीत व्यास, कुबरा सैत की गिनती दमदार किरदारों में होती है। पर ये तीनों यहां बेरंग हैं। सौरभ शुक्ला ने जरूर अपने किरदार में जान डाल दी है लेकिन यही बाद स्वानंद किरकिरे और मकरंद देशपांडे के बारे में नहीं कही जा सकती।

द वर्डिक्ट-स्टेट वर्सेस नानावती सीरीज तकनीक के मामले में भी कमजोर है। 60 के दशक के महाराष्ट्र को दिखाने का काम बहुत ही साधारण है और जो कई बार खटकता भी है। बैकग्राउंड म्यूजिक खास प्रभाव नहीं डाल पाया है। शुरू से ही द वर्डिक्ट की तुलना अक्षय कुमार की फिल्म रुस्तम से की जा रही है और इस रेस में वर्डिक्ट काफी पीछे छूट चुकी है।
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