'फायरब्रांड' बदलते भारतीय समाज का आईना है: उषा जाधव

Shashank Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: Mishra Mishra
Updated Fri, 08 Mar 2019 01:02 AM IST
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ऊषा जाधव
ऊषा जाधव - फोटो : social media

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अभिनय का सर्वोच्च सम्मान राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल करने वाली अभिनेत्री उषा जाधव की नई फिल्म 'फायरब्रांड' इन दिनों नेटफ्लिक्स की ट्रेंडिंग फिल्म है। अपनी स्पैनिश फिल्म पूरी कर हाल ही में भारत लौटीं उषा से एक खास मुलाकात।
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक पहले 'फायरब्रांड' की रिलीज क्या किसी प्लानिंग के तहत की गई, क्योंकि फिल्म दलित, शोषित महिलाओं की आत्मनिर्भरता का एक बड़ा संदेश देती है?

फिल्म 'फायरब्रांड' बदलते भारतीय समाज का आईना है। इस फिल्म के जरिए समझा जा सकता है कि लड़कियों की सोच समाज में कितनी बदल चुकी है। नए भारत की लड़कियां अपने साथ हुए किसी अत्याचार के बोझ के तले जीवन भर दबी नहीं रहतीं। लड़कियां अब जीवन भर सुबकती नहीं हैं। वह समाज में अपनी जगह बनाती हैं और अत्याचार झेल रही दूसरी लड़कियों की मदद के लिए आगे आती हैं। फायरब्रांड की सुनंदा भी नए भारत की नई सोच की लड़की है। 

फिल्म में एक जगह सुनंदा का किरदार खुद को अछूत बताता है, आपने भी एक दलित परिवार से होने के बावजूद सिनेमा में बड़ा मुकाम पाया है, कितना संघर्ष भरा रहा एक दलित युवती का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभिनय में सम्मान पाना?
मेरा बचपन और मेरी अभिनय यात्रा बहुत संघर्षों से भरी रही है। लेकिन, मैंने कभी खुद के दलित होने या अपने संघर्ष को अपना टॉकिंग प्वाइंट नहीं बनाया। मुंबई में हर रोज दर्जनों लड़कियां फिल्मों में किस्मत आजमाने आती हैं। मैं भी उनमें से ही एक रही। लेकिन, मैंने सिर्फ काम पाने का ही संघर्ष नहीं किया, मैंने खुद को मजबूत बनाने और कैमरे के सामने मजबूत स्त्री के किरदारों को निभाने का संघर्ष अपने आप से भी किया। अगर अरुणा ताई जैसी निर्देशक फायरब्रांड की कहानी लिखते समय मेरे बारे में सोचती हैं, तो यही मेरी असली जीत है।

अरुणा राजे इतने सारे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुकी हैं और फायरब्रांड की पटकथा लिखने से पहले उन्होंने आपको फोन करके इस कहानी के लिए आपकी रजामंदी चाही, ऐसा क्यों?
क्यों का तो कुछ नहीं कह सकती लेकिन हां, फायरब्रांड का जब पहला विचार उनके मन में आया तो उन्होंने मुझे फोन किया कि वह ऐसी एक कहानी पर फिल्म बनाना चाहती हैं। मैं कुछ इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स में व्यस्त थी उन दिनों। लेकिन, ये कहानी सुनकर मुझे लगा कि इस तरह की कहानियां ही महिलाओं का सिंबल हैं। मैंने कहानी का कॉन्सेप्ट सुनने के बाद हां की और इसके बाद अरुणा ताई ने ये पूरी फिल्म लिखी। 

प्रियंका चोपड़ा आपकी इस नई फिल्म की प्रोड्यूसर हैं। उन्होंने शायद एक महिला होने के नाते इस कहानी का मर्म समझा। मेनस्ट्रीम में ऐसी फिल्में न बनने की क्या वजह हो सकती है?
भारत का कमर्शियल सिनेमा बदल रहा है। मुख्य धारा और समानांतर सिनेमा का फर्क तो खत्म हो ही चुका है। उरी जैसी फिल्म आज से 20 साल पहले रिलीज होती तो लोग इसे अर्ध सत्य जैसी फिल्मों की तरह समानांतर सिनेमा की कैटेगरी में डाल देते। लेकिन, दर्शक अब बड़े सितारे नहीं बड़ी कहानियां मांग रहे हैं। प्रियंका चोपड़ा दुनिया घूम रही हैं। उनको समझ आता है कि विश्व स्तर पर भी ऐसी ही फिल्मों के दर्शक बढ़ रहे हैं। अभी मैं अमेरिका में किसी से बात कर रही थी तो पता चला कि वहां लोग ग्रुप बनाकर घरों में ये फिल्म देख रहे हैं और इस पर चर्चाएं आयोजित कर रहे हैं तो ये भारतीय सिनेमा के लिए एक नए भविष्य की शुरूआत है। 
 

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