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Shikara Review: विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशकीय कौशल की कमजोर कड़ी बनी शिकारा

पंकज शुक्ल, मुंबई Updated Fri, 07 Feb 2020 07:45 PM IST
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Shikara
Shikara - फोटो : social media
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रामानंद सागर के सौतेले भाई विधु विनोद चोपड़ा को इस बात की दाद देनी चाहिए कि वह मुंबई में बसने के बरसों बाद भी कश्मीरियत को नहीं भूले। श्रीनगर में जन्मे विधु ने बतौर निर्देशक अपनी दूसरी फिल्म खामोश भी कश्मीर की वादियों में ही बनाई थी। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान होने वाले कत्ल दर कत्ल की उस कहानी से ही विधु के निर्देशकीय कौशल का दुनिया को अंदाजा हुआ। और, फिर परिंदा की रिलीज के बाद विधु को जो ओहदा हिंदी सिनेमा में मिला, उससे तमाम बड़े निर्देशक अब भी रश्क करते हैं। विधु फिर घाटियों में लौटे हैं। फिर से उन्होंने कश्मीर पर फिल्म बनाई है। और, फिर से उनकी फिल्म की रिलीज गिनती भर के सिनेमाघरों में सिमट कर रह गई है।
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शिकारी की कहानी के किरदार शिव और शांति एक फिल्म की शूटिंग के दौरान करीब आते हैं। फिल्म का निर्देशक एक ठेठ कश्मीरी जोड़ा चाहता है। ये दोनों खुद को इसके लिए प्रस्तुत करते हैं। एक की लेखनी में दम है। दूसरी की सेवा में। दोनों शूटिंग से भागते हैं। शादी करते हैं। अपना घर भी बसाते हैं। फिर, घाटी में नरसंहार होता है। जम्मू के शरणार्थी कैंप में बरसों तक गुजर बसर के दौरान भी दोनों का अपनी मिट्टी से जुड़ाव बना रहता है। सपना एक ही है कि वहां की आबो हवा में फिर से खुलकर सांस ले सकें।

शिव संहार के देवता हैं। शांति सब चाहते हैं। इसके लिए कोशिश कोई नहीं करना चाहता। विधु सिनेमा में अपनी बातें इशारों में कहने में माहिर हैं। वह जज्बात के उस्ताद हैं। बस, दो साल पहले शुरू हुई इस फिल्म की कास्टिंग में वह चूक गए। जो बात वह मिशन कश्मीर में ऋतिक रोशन और संजय दत्त जैसे नामी सितारों को लेकर ठीक से बयां नहीं कर पाए वही बात इस बार वह नए चेहरों के जरिए कहना चाहते रहे होंगे। नए कलाकारों के कंधों पर विधु ने भारी बोझ डाला। जिम्मेदारी का ये दबाव दोनों के चेहरों पर दिखता भी रहता है। शादी वाले दृश्य में दोनों के चेहरे पर निर्लिप्तता दिखती है। कहानी की जरूरत के हिसाब से भाव लाना विधु की प्राथमिकता रही होगी, लेकिन ये भाव दर्शकों के मन में अलग रस के हैं और विधु के मन में इन रसों का खाका शायद अलग रंगों से बना होगा। निर्देशक और दर्शक के बीच का पुल यहीं टूटता है।

विधु की फिल्म के इस पुल की दूसरी कमजोरी है फिल्म का इतिहास बताने के चक्कर में प्रेम कहानी की पीड़ा को सही तरीके से परदे पर पेश न कर पाना। हजारों लोगों का अपने घर से दर बदर हो जाना आसान नहीं रहा होगा। विधु के बिंब इस बार फिल्म में कमजोर पड़े हैं। बछड़े को बचाकर वह मौजूदा सियासी संकेतों पर अपना हस्तक्षेप तो दिखाना चाहते हैं लेकिन अमेरिका का राष्ट्रपति जिस दौर में खुद भारत की चुनाव प्रचार प्रणाली की नकल कर रहा हो, उस समय में एक कश्मीरी का उन्हें पत्र लिखने का अर्थ आम दर्शक को समझ नहीं आता। अमेरिका कश्मीर में दखल देना भी चाहे तो मौजूदा भौगालिक आर्थिक समीकरण उसे ऐसा करने नहीं देंगे।

एक निर्देशक के तौर पर विधु विनोद चोपड़ा ने अपनी मुगले आजम फिल्म परिंदा में ही बना दी थी। खामोश, परिंदा और 1942 ए लव स्टोरी, बस इन तीन फिल्मों जितना ही उनका निर्देशकीय सफरनामा है। नई हीरोइन नेहा (शबाना रजा, अब मनोज बाजपेयी की पत्नी) को लेकर बनाई गई फिल्म करीब से उनका निर्देशन कौतुक चुकना शुरू हुआ और एकलव्य व शिकारा तक आते आते ये तिलिस्म बिखर चुका है।

फिल्म का गीत संगीत कश्मीरी है और हिंदी पट्टी में बहुत ज्यादा प्रचारित प्रसारित भी नहीं है, लिहाजा फिल्म को इससे कोई खास मदद मिलती नहीं है। हां, रंगराजन की सिनेमैटोग्राफी विश्व सिनेमा के टक्कर की है। विधु ने फिल्म के संपादन में अपना नाम भी दिया है सो फिल्म की ढीली पड़ती चाल भी उनके खाते में ही लिखी जाएगी। विधु विनोद चोपड़ा हिंदी सिनेमा के भीतर का निर्देशक रह रहकर हिलोरें तो लेता है, लेकिन इन लहरों के लिए उन्हें एक दमदार शिकारा चाहिए जो उनके निर्देशकीय कौशल को परिंदा वाली लय में लौटा सके। अमर उजाला मूवी रिव्यू में फिल्म शिकारा को मिलते हैं दो स्टार।

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