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कैंसर का पता लगने के बाद पढ़े-लिखे भी झाड़ फूंक में गंवा रहे जान, कैसे दूर होगा ये अंधविश्वास?

सोमदत्त शर्मा, करनाल Updated Wed, 19 Feb 2020 01:37 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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माना जाता है कि कैंसर का पता चलने के बाद गरीब या फिर कम पढ़े लिखे लोग देसी दवाइयां या फिर झाड़ फूंक का सहारा लेते हैं, लेकिन हकीकत इसके उलट है। पीजीआईएमएस रोहतक में कैंसर विभाग में पोस्ट ग्रेजुएट कर रहे डॉ. कपिल वत्स की ओर से किए गए शोध में पाया गया है कि ज्यादा पढ़े लिखे और अच्छी इनकम वाले लोग ही कैंसर का पता लगने के बाद इलाज बीच में छोड़कर देसी जुगाड़ में लग जाते हैं। गलती का अहसास उन्हें तब होता है जब समय निकल चुका होता है।
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कल्पना चावला मेडिकल कालेज में हुई सर्जन आफ इंडिया के राज्य स्तरीय अधिवेशन में यह शोध पेश किया गया। डॉ. कपिल ने बताया कि उन्होंने यह शोध एक साल में पूरा किया है। कुल 215 मरीजों को इसमें शामिल किया गया है। इनमें से 116 लोगों ने कैंसर का पता लगते ही देसी दवाइयां लेनी शुरू कर दी, जबकि 99 लोगों ने एलोपैथी से इलाज जारी रखा। खास बात ये है कि अब एक साल के बाद आराम नहीं मिलने पर 97 लोगों ने देसी दवाइयां छोड़ दी और दोबारा से इलाज के लिए पीजीआई पहुंचे।
लेकिन अब उनकी स्थिति खराब हो चुकी है, क्योंकि जब उन्हें पता चला तो कैंसर प्रथम स्टेज पर था, लेकिन अब उनकी स्टेज बढ़ चुकी है। वहीं, केवल 19 लोग ऐसे हैं, जो आज भी अन्य दवाइयां ले रहे हैं। डॉ. कपिल ने यह शोध पीजीआईएमएस रोहतक के कैंसर सर्जन प्रोफेसर डॉ. आरके कड़वासरा व एआर बंसल के नेतृत्व में किया है।
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