चीनी इंटेलिजेंस एजेंसी भारत में करती रही जासूसी, किसी की नजर में क्यों नहीं आ सके 'सीआईएस' के जासूस?

जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली Updated Sat, 17 Oct 2020 09:07 PM IST
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चीन की खुफिया एजेंसी चाइनीज इंटेलिजेंस सर्विसेज (सीआईएस) ने भारत में लंबे समय से जाल बिछा रखा था। यह एजेंसी इस तरीके से सूचनाएं एकत्रित करती रही कि मामला किसी की नजर में ही नहीं आया। हालांकि, दो साल पहले कुछ भनक लगी थी कि यह एजेंसी सैन्य ठिकानों में सोशल मीडिया या दूसरे किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से घुसपैठ कर रही है। इसका मकसद छिपा रहे, इसके लिए सीआईएस ने विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की टीम तैयार की थी। अपने टारगेट तक पहुंचने के लिए एजेंसी ने विभिन्न सोशल मीडिया के माध्यमों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का भरपूर इस्तेमाल किया।
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गोपनीय सूचना का डेटा बैंक तैयार :
एजेंसी ने विशेषज्ञों की मदद से गोपनीय सूचना का डेटा बैंक तैयार किया। इसमें सैन्य प्रतिष्ठानों के अलावा कई दूसरे मंत्रालय और विभाग शामिल हैं। विभागों की टेंडर प्रक्रिया, सोशल मीडिया प्लेटफार्म, आयात-निर्यात सेल, निर्माण कार्य, शिक्षा और मोबाइल तकनीक सहित कई तरह के दूसरे कारोबारों में सीआईएस ने अपने विशेषज्ञ जासूस नियुक्त कर रखे थे।
केंद्र सरकार में रेवेन्यू इंटेलिजेंस का कामकाज देख रहे एक अधिकारी ने बताया कि सीआईएस ने बहुत ही छिपे अंदाज में अपनी मुहिम को आगे बढ़ाया था। उसके विशेषज्ञ कई विद्याओं में पारंगत हैं। चीन ने आयात निर्यात विंग में ही अनेक विशेषज्ञ तैनात किए जाते हैं। उनका काम गोपनीय सूचनाएं एकत्रित करना है। किसी को उन पर शक भी नहीं होता क्योंकि वे सार्वजनिक विभाग के अधिकारी या विशेषज्ञ के तौर पर काम करते हैं। इनमें कंसलटेंट की भी अच्छी खासी संख्या रहती है। भारत के अनेक सरकारी विभागों में घुसपैठ का जो प्रयास हुआ है, वहां ये सलाहकार ही सक्रिय रहे हैं। 

रक्षा डील में विशेषज्ञ बन मौजूद रहते हैं चीनी जासूस : 
बिजनेस कार्ड देकर संबंध बनाना और उसके बाद ई-मेल के जरिए संपर्क करना, ये सब इनकी शुरुआत का हिस्सा होता है। कई बार यह भी देखने को मिला कि रक्षा क्षेत्र में किसी कंपनी के साथ कोई करार होना है, तो वहां चीन के लोग उस कंपनी के विशेषज्ञ बनकर मौजूद रहे। ऐसे में कोई ऐतराज भी नहीं कर सकता। संबंधित कंपनी कह सकती है कि ये तो हमारे कर्मचारी हैं, पार्टनर हैं या बिजनेस डील के लिए नियुक्त किए गए तकनीकी सलाहकार हैं। अधिकारी बताते हैं कि जब एक बार ये विशेषज्ञ किसी के साथ घुल मिल जाते हैं, तो वे उसे जॉब भी ऑफर करते हैं।

भारत-चीन के बीच जब से सीमा विवाद शुरू हुआ है। उसके बाद से इन जासूसों की कई तरह की गतिविधियों पर लगाम लग गई है। ये विशेषज्ञ, चीनी एप और उपकरणों के जरिए आसानी से अपने मकसद की ओर बढ़ जाते थे। अब सेना, केंद्रीय अर्धसैनिक बल और दूसरे सरकारी विभागों में चीनी एप पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। सरकार के आहृवान पर आम लोगों ने भी अपने मोबाइल फोन से चीनी एप डिलीट कर दिए हैं। कंपनियों को टेंडर नहीं मिल रहे और इसके चलते वे बैठकों या सरकारी विभागों में नहीं जा पा रहे हैं। 

चीनी खुफिया एजेंसी परेशान : 
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की मिलिट्री इंटेलिजेंस 'एमआई' भी इन दिनों परेशान हैं।देश के बाहर काम करने वाली एजेंसियों को दिशा—निर्देश देना या उनमें तालमेल बैठाना, ये जिम्मेदारी मिलिट्री इंटेलिजेंस के पास रहती है। सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ पब्लिक सिक्योरिटी) और यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट जैसी इंटेलिजेंस इकाई भी एमआई के दायरे में काम करती है। 
चीन के जासूसों पर लग रही लगाम : 
केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, ये सही है कि चीन ने गोपनीय सूचनाएं एकत्रित करने के लिए विशेषज्ञों का जाल बिछा रखा है। हालांकि, अब इन पर नियंत्रण भी लग रहा है। एप बैन होने के बाद इनके विशेषज्ञ परेशान हो गए हैं। इसी तरह से सरकारी विभागों के लिए जो गाइडलाइन जारी की गई थी, उससे चीनी इंटेलिजेंस एजेंसी नजदीक नहीं आ पा रही है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और साइबर के मामले में भी अब भारत उसे आसानी से पैर नहीं जमाने देगा।
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