कुरुक्षेत्र: कोरोना वायरस के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी का ब्रह्मास्त्र बन सकता है पीएम केयर्स फंड

विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 02 Apr 2020 05:09 PM IST
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PM cares Fund
PM cares Fund - फोटो : Amar Ujala
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सार

  • एक अलग कोष के गठन पर उठ रहे हैं सवाल
  • प्रधानमंत्री राहतकोष में हैं 3800 करोड़ रुपये
कोरोना संक्रमण के खिलाफ देश की लड़ाई को सफल बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस पीएम केयर्स (प्राइम मिनिस्टर्स सिटीजन असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशन) फंड के नाम से नए ट्रस्ट का गठन किया है, उसे देश के उद्योग जगत, फिल्म जगत और पूरे देश ने आम तौर पर हाथो हाथ लिया है। देखते-देखते उसमें आर्थिक योगदान देने वालों की होड़ लग गई।

विस्तार

सरकार ने ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित करने के लिए एक अध्यादेश के जरिए पीएम केयर्स में दिए जाने वाले अंशदान पर आयकर अधिनियम की धारा 35सी के तहत शत प्रतिशत कर छूट देने की सुविधा भी दे दी है। यह सुविधा प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष (पीएमएनआरएफ) के दानदाताओं को है। इस ट्रस्ट में प्रधानमंत्री ,रक्षा मंत्री ,गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री शामिल हैं।
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जिस तरह इस नए कोष में आर्थिक योगदान देने के लिए बड़ी संख्या में उद्योग जगत, फिल्म जगत, खेल जगत और आम लोग आ रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सरकार के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने में पीएम केयर्स कोष एक ब्रह्मास्त्र साबित हो सकता है।  
लेकिन दूसरी तरफ इस नए कोष के गठन को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर और इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने मुखर होकर सवाल उठाया है कि जब पहले से ही प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष है तो फिर नया कोष पीएम केयर्स फंड बनाने की क्या जरूरत है। शशि थरूर ने अपने ट्वीट में कहा है कि प्रधानमंत्री को एक नया धर्मादा कोष जिसके नियम तक अस्पष्ट हैं, बनाने की बजाय क्यों नहीं पीएमएनआरएफ का ही नाम बदल कर पीएम केयर्स कर देना चाहिए था।
कांग्रेस प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने भी इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब पीएमएनआरएफ मे 3800 करोड़ रुपए बिना खर्च किए हुए हैं, तो पहले उन्हें उपयोग में लाया जाना चाहिए न कि नया कोष बनाकर लोगों से योगदान मांगा जाए।

लेकिन दूसरी तरफ इन सवालों के जवाब में सरकार की तरफ से दिए गए बयान में इन नए कोष के गठन के औचित्य को सही ठहराते हुए कहा गया है कि संकटकालीन अवस्था में चाहे वह प्राकृतिक हो या कोई और एक बेहद त्वरित और सामूहिक कार्यवाही की जरूरत होती है, जिससे पीड़ितों के कष्टों का निवारण हो सके, नुकसान की भरपाई हो सके और राहत कार्यों को तेज किया जा सके। बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय को सभी क्षेत्रों से सरकार को आर्थिक योगदान देने के लिए लगातार अनुरोध मिल रहे हैं जिससे सरकार इस आपात संकट से निबट सके।

भाजपा नेताओं का भी कहना है कि कोरोना संक्रमण जैसी विश्व महामारी के खिलाफ जंग में कोई आर्थिक संकट न आए इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह पहल की है। यह कोष सिर्फ कोरोना संक्रमण के खिलाफ जारी लड़ाई में आर्थिक संसाधन जुटाकर उसे जीतने के लिए है जबकि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष हर तरह की आपदा के लिए है। उसके धन का उपयोग छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी आपदा के लिए किया जाता है लेकिन पीएम केयर्स सिर्फ और सिर्फ कोरोना से लड़ने के लिए है।

इसके धन का उपयोग किसी अन्य तरह की आपदा में नहीं होगा, सारा धन कोरोना से लड़ने में खर्च किया जाएगा। भाजपा सांसद एवं प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का कहना है कि कांग्रेस को इस राष्ट्रीय संकट के समय राजनीति न करके कोरोना के खिलाफ लड़ाई में देश का साथ देना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता विराग गुप्ता भी कहते हैं कि कोविड-19 इतना गंभीर राष्ट्रीय संकट है कि इससे निबटने के लिए सरकार को विशेष प्रयास करने की जरूरत है और संभवतः इसी के मद्देनजर सरकार ने पीएम केयर्स कोष बनाया है।

एक पूर्व कैबिनेट सचिव ने नाम न छापने की शर्त के साथ अमर उजाला से कहा कि संभव है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी निजी लोकप्रियता को कोरोना के विरुद्ध राष्ट्रीय युद्ध में एक सशक्त हथियार की तरह इस्तेमाल करने के लिए यह कदम उठाया होगा।



क्योंकि लोगों में मोदी की निजी लोकप्रियता और अपील है कि लोग उनके एक आह्वान पर एक समय पूरे देश में एक साथ थाली और ताली बजाते हैं तो उनकी अपील पर लोग खुले मन से यथासंभव आर्थिक अंशदान करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

इसलिए मुमकिन है कि प्रधानमंत्री ने अपना पर्सनल टच और पुश देने के लिए पीएम केयर्स कोष का गठन किया, जबकि पीएमएनआरएफ बहुत पुराना कोष है, उसमें मोदी का निजी टच या पुश नहीं है।

उक्त पूर्व नौकरशाह के मुताबिक इसमें कुछ भी गलत नहीं है और एक बड़ी लड़ाई के लिए प्रधानमंत्री अगर खुद आगे आकर कोई पहल करते हैं, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। यही वजह है कि पीएम केयर्स में आर्थिक अंशदान के लिए रिलायंस, टाटा, अडानी, आईटीसी, हिंदु्स्तान यूनीलीवर, हीरो साइकिल, वेदांता समूह, बजाज, शिरडी ट्रस्ट, बीसीसीआई, सीआरपीएफ, सन फार्मा, ओला जैसे अनेक उद्योग एवं व्यापार समूह, अक्षय कुमार, प्रभाष, चिरंजीवी, राम चरण, महेश बाबू जैसे अनेक सितारे, सचिन तेंदुलकर, सुरेश रैना आदि खिलाड़ी और सामाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक क्षेत्रों के अनेक लोगों ने खुशी खुशी सामने आकर अपनी अपनी क्षमता के मुताबिक खुलकर अंशदान देने की घोषणा की है। गठन के महज कुछ ही दिनों में इस कोष में अरबों रुपए की धनराशि जमा हो गई है और यह सिलसिला जारी है।

वहीं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल चुके भारत सरकार के एक पूर्व सचिव का कहना है कि पीएमएनआरएफ के होते हुए किसी भी नए तरह के कोष के गठन की कोई आवश्यकता नहीं थी।जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी लोकप्रियता को कोरोना विरोधी अभियान से जोड़कर उसे पुश देने का सवाल है तो यह काम पीएमएनआरएफ के लिए भी अपील करके हो सकता था।

उक्त पूर्व अधिकारी के अनुसार पीएमएनआरएफ के अलावा दो अन्य कोष राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (एनडीआरएफ) और राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) हैं जिनका उपयोग भी किसी भी आपदा से लड़ने के लिए किया जाता है।

लेकिन इनमें पैसा कर से जुटाए गए राजस्व से आता है जबकि पीएमएनआरएफ में व्यक्तियों और संस्थाओं के योगदान से आता है। पीएम केयर्स में भी योगदान का ही पैसा आएगा। इसलिए इसमें और पीएमएनआरएफ में कोई फर्क नहीं है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण गठन में अहम भूमिका निभा चुके एक अन्य पूर्व नौकरशाह का कहना है कि पीएमएनआरएफ, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ के अलावा गृह मंत्रालय स्वास्थ्य मंत्रालय के भी अपने कोष हैं। इसके अलावा हर राज्य में मुख्यमंत्री राहत कोष है। इ

सके बाद अब एक नए कोष का गठन सवाल जरूर खड़े करता है, लेकिन हमें प्रधानमंत्री मोदी के इरादों पर शक न जाहिर करके इस संकट की घड़ी में उनके इस कदम का स्वागत करना चाहिए। हो सकता है कि यह कोष जो एक ट्रस्ट के रूप में गठित किया गया है, पुराने कोषों की तुलना में दान दाताओं को ज्यादा आकर्षित कर सके।

दूसरे, इस कोष का गठन क्योंकि कोरोना से लड़ने के लिए किया गया है इसलिए दानदाता को यह निश्चिंतता रहेगी कि उसका दिया हुआ पैसा कोरोना से ही लड़ने में लगेगा, जबकि दूसरे कोषों में यह गारंटी नहीं रहती कि है दानदाता के योगदान का उपयोग किसी एक आपदा में किया जाएगा।

उक्त पूर्व केंद्रीय सचिव का कहना है कि हर आपदा के वक्त सरकार को आर्थिक सहयोग देने वाले चाहते हैं कि उनके अंशदान का उपयोग उसी आपदा से लड़ने और राहत देने में हो, जबकि पीएमएनआरएफ सभी तरह की आपदाओं से लड़ने और राहत के लिए है।

उसके धन का उपयोग किसी भी राज्य में इलाके विशेष में आई आपदा या व्यक्तिगत स्तर पर भी किसी की मदद करने के लिए किया जा सकता है, जबकि पीएम केयर्स का पैसा सिर्फ कोरोना से लड़ने में खर्च होगा। इसलिए इस समय जब दानदाता कोरोना के खिलाफ लड़ाई में आर्थिक सहयोग देना चाहते हैं तो पीएम केयर्स उनके लिए सबसे बेहतर विकल्प है।

भारत सरकार के एक अन्य पूर्व सचिव ने भी पीएम केयर्स के गठन के औचित्य पर अपनी राय देते हुए कहा कि पीएमएनआरएफ के खर्चों का सीएजी ऑडिट होता है और उसका हिसाब किताब संसद में रखा जाता है और संसद से उसकी स्वीकृति लेनी होती है। जबकि पीएम केयर्स एक ट्रस्ट है जिसका सीएजी ऑडिट नहीं होगा और उसके हिसाब किताब को संसद में रखने की कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं होगी।

इसलिए इस कोष का सरकार कोरोना से लड़ने के लिए होने वाली जरूरी खरीद और अन्य आवश्यकताओं के लिए बिना किसी कानूनी और नियमों की जटिलता के उपयोग कर सकेगी। इसके गठन की यह भी एक वजह हो सकती है।

मजाकिया अंदाज में इस पूर्व नौकरशाह ने राजनीतिक टिप्पणी की कि पीएमएनआरएफ का गठन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में हुआ था जबकि पीएम केयर्स का गठन मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में हुआ है।

बीच में इतने प्रधानमंत्री हुए जिनमें लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे यादगार प्रधानमंत्री भी हुए लेकिन उनके कार्यकाल में कोई नया कोष नहीं बना। भविष्य में पीएमएनआरएफ के साथ नेहरू तो पीएम केयर्स के साथ मोदी का नाम जुड़ा रहेगा।
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