कोरोना संकट के बीच अमेरिका के धौंस जमाने वाले तेवर, फिर याद आया 1965 का वो दौर  

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 07 Apr 2020 08:15 PM IST
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भारत-अमेरिका (फाइल फोटो)
भारत-अमेरिका (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
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पिछले कुछ सालों में भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में बहुत मजबूती आई है। लेकिन अमेरिका के रवैये ने हर बार संशय पैदा किया है। बेशक मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत से दोस्ती की अकसर दुहाई देते रहे हों, लेकिन उनके बयानों और तेवरों ने भारत को सशंकित ही किया है। वैश्विक कोरोना संकट के बीच एक बार फिर ट्रंप ने कुछ ऐसा किया है जिसे जानकर हर भारतीय हैरान है। 
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ट्रंप ने दी भारत को चेतावनी
ट्रंप ने साफ तौर पर धमकी दे डाली है कि अगर भारत  हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा की आपूर्ति नहीं करता है तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। भारत ने कुछ दिनों पहले ही  हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा के निर्यात पर बैन लगाया था क्योंकि कोरोना वायरस के इलाज में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। ट्रंप ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि मैंने प्रधानमंत्री मोदी से रविवार सुबह इस मुद्दे पर बात की थी। अगर वे दवा की आपूर्ति की अनुमति देंगे तो हम उनके इस कदम की सराहना करेंगे। अगर वे सहयोग नहीं भी करते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन वे हमसे भी इसी तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद रखे।
ट्रंप ने कहा कि भारत कई वर्षों से अमेरिकी व्यापार नियमों का फायदा उठा रहा है, और ऐसे में अगर नई दिल्ली हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात को रोकता है, तो उन्हें हैरानी होगी। बता दें कि भारत ने पिछले महीने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज के लिए ट्रंप इस दवा की जोरदार वकालत कर रहे हैं।  

अमेरिका के धौंस जमाने वाले ये तेवर नए नहीं हैं। इससे पहले भी मुश्किल समय में वह भारत को उम्मीदों को झटका दे चुका है। बात करें 60 के दशक की तो उस वक्त भी अमेरिका का रवैया बेहद अन्यायपूर्ण था। अकाल के बीच अमेरिका ने भारत की आधी-अधूरी मदद की। साल 1965 में पाकिस्तान के साथ जब भारत का युद्ध हुआ था तो देश अमेरिका की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा था, लेकिन उसने जो किया उसकी कहीं मिसाल नहीं मिलती।   
 
क्या है वो किस्सा

1962 के भारत-चीन युद्ध से देश आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था। 1964 में भारत कई चुनौतियों से जूझ रहा था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का देहांत हो चुका था और लाल बहादुर शास्त्री ने देश की कमान संभाली ही थी। देश खाने के संकट से जूझ रहा था और अकाल की नौबत आ गई थी। तब भारत ने अमेरिका से अनाज की मदद मांगी थी। लेकिन उसने भारत को दोयम दर्जे का लाल गेहूं भेजा। अमेरिका के इसी धोखे के बाद भारत में हरित क्रान्ति की नींव पड़ी थी।

अमेरिका की बेरुखी के बीच 1965 में मानसून भी कमजोर रहा। इसी संकट के बीच 5 अगस्त 1965 को 30 हजार पाकिस्तानी सैनिक एलओसी पार करके कश्मीर में घुस आए। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को इसका मुंहतोड़ जवाब दिया। 6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई थी। पाकिस्तान के 90 टैंक ध्वस्त कर दिए गए।

इसी दौर की बात है जब देश अमेरिका की पीएल-480 स्कीम के तहत हासिल लाल गेहूं खाने को बाध्य था। अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने प्रधानमंत्री शास्त्री को धमकी दी कि अगर युद्ध नहीं रुका तो गेहूं का निर्यात बंद कर दिया जाएगा। शास्त्रीजी ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि बंद कर दीजिए। उन्होंने अमेरिका से गेहूं लेने से भी साफ इनकार कर दिया। 

यहीं से उनके प्रसिद्ध नारे ने भी जन्म लिया था। अक्टूबर 1965 में दशहरे के दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में शास्त्रीजी ने पहली बार जय जवान-जय किसान का नारा दिया था। उन्होंने लोगों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने को कहा और खुद भी व्रत रखना शुरू कर दिया था।  

आज अमेरिका भारत से लगा रहा गुहार, दे रहा धमकी 

कोरोना वायरस से अमेरिका की हालत इस समय सबसे बुरी है। यहां 3 लाख 11 हजार से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और 8000 से अधिक लोग दम तोड़ चुके हैं। जैसे स्वाइन फ्लू की महामारी के दौरान टैमीफ्लू काफी कारगर रही थी, उसी तरह हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना वायरस के कई मामलों से निपटने में बहुत कारगर सिद्ध हो रही है। यही वजह है कि अमेरिका को भारत के आगे गुहार लगानी पड़ रही है साथ ही धमकी देने से भी वह गुरेज नहीं कर रहा। 
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