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दिल्ली में साल के 334 दिनों में से महज 18 दिन ही रहती है हवा की गुणवत्ता संतोषजनक

शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 13 Nov 2019 05:44 PM IST
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दिल्ली वायु प्रदूषण
दिल्ली वायु प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला
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सार

  • कानों में तेल डालकर सो रही हैं सरकारें और जनता
  • यही हाल रहा तो पांच साल बाद होगी भयावह स्थिति
  • प्रदूषण को रोकने के लिए साल भर करना होगा प्रयास
  • अभी नहीं चेते तो जाड़ा, गर्मी, बरसात तीनों मौसम होंगे प्रभावित

विस्तार

हवा का मिजाज बदलते ही दिल्ली की आबो-हवा फिर खराब हो गई है। सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट के सीनियर प्रोग्राम मैनेजर विवेक चट्टोपाध्याय का कहना है कि जिस तरीके से दिल्ली, केंद्र सरकार, आस-पास के राज्यों की सरकार और जनता चल रही है, यही हाल रहा तो पांच साल बाद बड़े भयावह नतीजे सामने आएंगे। राजधानी दिल्ली में न केवल तरह-तरह की बीमारियां बढ़ेंगी, बल्कि जाड़ों के अलावा गर्मी, बरसात के मौसम पर भी इसका दुष्प्रभाव बढ़ेगा। विवेक का कहना है कि अध्ययन में साल के 334 दिन में से केवल 18 दिन ही दिल्ली की हवा की गुणवत्ता ठीक या संतोषजनक पाई गई है।

प्रदूषण को लेकर लापरवाह हैं दिल्ली-एनसीआर के लोग

विवेक का कहना है कि अक्तूबर, नवंबर के महीने से लेकर जनवरी तक प्रदूषण की स्थिति काफी खतरनाक हो जाती है। सरकार और क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियां भी इसी समय चेतती हैं। सीएसई के अनुसार दिल्ली और एनसीआर के नागरिक तो प्रदूषण को लेकर करीब-करीब लापरवाह रहते हैं। इस बार भी प्रतिबंध के बावजूद लोगों ने दीपावली पर खूब पटाखे जलाए। सीएसई के सीनियर प्रोग्राम मैनेजर का कहना है कि दिल्ली में हवा की गुणवत्ता खराब करने में सॉलिड वेस्ट का 25 फीसदी योगदान है। इसे जलाने से उठने वाला धुआं प्रदूषण को तेजी से बढ़ाता है।
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दूसरे नंबर पर निर्माण कार्य हैं, जो यह नौ से दस फीसदी तक वायु प्रूषण का कारक है। 70-80 फीसदी प्रदूषण का कारण सालिड वेस्ट, ईधन तेल समेत कारक हैं। इसमें 20 फीसदी कारण दिल्ली, एनसीआर के बाहर का क्षेत्र और 80 फीसदी के लिए दिल्ली-एनसीआर जिम्मेदार है। विवेक चट्टोपाध्याय का कहना है कि पराली भी जिम्मेदार है। इसका धुआं जब दिल्ली की तरफ होता है तो स्थिति खतरनाक हो जाती है। क्योंकि अन्य कारकों से पैदा होने वाला प्रदूषण तेजी से बढ़ जाता है।

हर जगह ढिलाई का आलम

सीएसई (सेंटर फॉर एनवायरमेंट) के सीनियर अधिकारी का कहना है कि लाख चेतावनी के बाद भी प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी एजेंसियां केवल 33 फीसदी तक ही सतर्कता दिखा पा रही हैं। ट्रैफिक पुलिस का जाम पर नियंत्रण हो या डीटीसी के बसों की संख्या बढ़ाने का मामला, मेट्रो ट्रेन जैसे सार्वजनिक वाहन की फ्रीक्वेंसी बढ़ाने की बात हो या फिर पार्किंग चार्ज बढ़ाने के मामले, ढिलाई की स्थिति बनी हुई है। विवेक चट्टोपाध्याय का कहना है कि हर साल हमें वायु गुणवत्ता के प्रदूषण की स्थिति खराब हो जाने के बाद चिंता सताती है। हम कह सकते हैं कि वायु गुणवत्ता को दुरुस्त करने के लिए केवल दिखावे वाले प्रयास हो रहे हैं।

ऑड-ईवन से थोड़ा असर पड़ रहा है

सीएसई का कहना है कि दिल्ली सरकार की ऑड-ईवन योजना से बहुत थोड़ा असर पड़ रहा है। यह असर एक से पांच फीसदी तक देखा जा रहा है। चट्टोपाध्याय का कहना है कि कुछ दिन तक इस तरह की प्रक्रिया अपनाने से हवा की गुणवत्ता में कोई बड़ा सुधार वैसे भी आने की संभावना कम है। इसके लिए जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकार लंबे समय की योजना बनाकर ध्यान दे। साथ ही आमजनों में जागरुकता भी बढ़ाई जाए।

कैसे मिले निजात?

  • डीटीसी बसों की संख्या बढ़ाई जाए, लोगों के निजी वाहन सड़क पर कम उतरें।
  • सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के अगले चरण को बढ़ावा मिले, मेट्रो ट्रेन परिचालन की साल भर फ्रीक्वेंसी बढ़ाई जाए।
  • लकड़ी, गोबर के कंडे जलाकर खाने बनाने की प्रथा पर सालभर की रोक लगे, वैकल्पिक ईधन पर चलने वाली गाड़ियों की संख्या बढ़े। निर्माण कार्य निगरानी में और उपायों के साथ हों।
  • जनता की भागेदारी और जागरुकता के प्रयासों पर विशेष पहल की जाए।
  • लंबे समय की योजना बनाकर वायु गुणवत्ता सुधारने पर काम हो। उपकरणों और मशीनों का सहारा लिया जाए। वेस्ट मैनेजमेंट पर विशेष ध्यान दिया जाए।
 
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