हार से और मुश्किल हुईं कांग्रेस की राहें, ज्यादातर राज्यों में तीसरे नंबर की पार्टी बनी

अनूप वाजपेयी, नई दिल्ली Updated Wed, 12 Feb 2020 06:21 AM IST
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congress party - फोटो : PTI

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सार

  • राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के लिए चुनौती बने क्षेत्रीय दल
  • कांग्रेस के सिर्फ तीन प्रत्याशी बचा सके जमानत

विस्तार

दिल्ली पर 15 साल अबाध राज करने वाली कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय दलों से मुकाबला कर पाना मुश्किल हो रहा है। दिल्ली की हार ने उसकी संभावनाएं और धूमिल कर दी हैं। कांग्रेस के इतिहास में सबसे बुरा नतीजा दिल्ली का है, जहां उसके मात्र तीन उम्मीदवार ही जमानत बचा सके। 
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यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असम की तरह अब दिल्ली में भी वह तीसरे नंबर पर आ गई है।
आठ महीने पहले लोकसभा चुनाव में 22 प्रतिशत मत पाकर दूसरे नंबर पर आई पार्टी इस बार चार प्रतिशत वोट ही पा सकी है। यहां आप क्षेत्रीय दल की भूमिका में उभरी है और धीरे-धीरे कांग्रेस का वोट बैंक हड़प लिया है। जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों की ताकत बढ़ी है, वहां से कांग्रेस पूरी तरह उखड़ चुकी है। कांग्रेस तीस साल बाद भी यूपी में अपना संगठनात्मक ढांचा मजबूत नहीं कर सकी है। उसे चौथे नंबर से ऊपर आने की चुनौती है।  बिहार में भी कांग्रेस को वापसी के लिए बी टीम बनकर अपनी राह तलाशनी पड़ रही है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बना लेने का सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को हुआ। यहां कांग्रेस वामदलों की बी टीम है और तीसरे नंबर के राजनीतिक दल से ऊपर नहीं आ पा रही है। ओडिशा में बीजू जनता दल के लगातार बेहतर प्रदर्शन के चलते कांग्रेस लंबे समय से तीसरे नंबर की पार्टी बनी है।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की राजनीति में भी क्षेत्रीय दलों के प्रभाव ने कांग्रेस को अलग-थलग कर रखा है। इन राज्यों में भाजपा सीधे तौर पर क्षेत्रीय दलों से टक्कर लेती दिखती है, लेकिन जो राज्य कभी कांग्रेस के थे, वहां तीसरे-चौथे पायदान पर ही भिड़ती दिखती है।

चोपड़ा का इस्तीफा
दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी नेतृत्व को इस्तीफा सौंप दिया है।

अब बिहार और पश्चिम बंगाल ने खड़े किए सवाल
इस साल बिहार और अगले साल की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं। दोनों ही राज्यों से उखड़ चुकी कांग्रेस की सियासी हैसियत इतनी नहीं बची है कि अकेले दम पर अपनी जड़ मजबूत कर सके। झारखंड में गठबंधन की सफलता और जीत के बाद कांग्रेस को लगता था कि बिहार में उसकी भूमिका बढ़ेगी। दिल्ली के नतीजों के बाद आरजेडी खुद को आगे रखकर कांग्रेस को बी टीम की तरह ही लेकर चलेगी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले से ही कांग्रेस से दूरी बनाकर चल रही हैं। कांग्रेस की ओर से बुलाई गई विपक्ष की बैठक में भी शामिल नहीं हुई थीं। ममता कतई नहीं चाहती हैं कि कांग्रेस राज्य में मजबूत हो। ममता भाजपा से सीधे भिड़ंत चाहती हैं। यही कारण है कि कांग्रेस को मजबूरन राज्य में वामदलों के साथ तालमेल कर चुनाव लड़ना होगा।
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खत्म नहीं हुई कांग्रेस

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